Uttarakhand
उत्तराखंड की पारंपरिक पोशाक : संस्कृति और विरासत का प्रतीक…
उत्तराखंड की पारंपरिक पोशाक (Uttarakhand Traditional Dress) : विविधता, संस्कृति और इतिहास
उत्तराखंड, जिसे ‘देवभूमि’ या देवताओं की भूमि के रूप में जाना जाता है, न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता, बर्फ से ढकी चोटियों और पवित्र नदियों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए भी पूरी दुनिया में जाना जाता है। इस पावन भूमि की संस्कृति की सबसे खूबसूरत झलक यहाँ के लोगों के रहन-सहन और उनके पहनावे में देखने को मिलती है। उत्तराखंड की पारंपरिक पोशाक केवल शरीर ढकने का साधन नहीं है, बल्कि यह यहाँ के गौरवशाली इतिहास, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और परंपराओं का जीवंत प्रतीक है।
उत्तराखंड मुख्य रूप से दो प्रमुख क्षेत्रों में बंटा हुआ है – गढ़वाल और कुमाऊं। इसके अलावा यहाँ कई जनजातीय क्षेत्र भी हैं, जिनमें जौनसारी समुदाय प्रमुख है। इन सभी क्षेत्रों की अपनी अलग बोलियां, मान्यताएं और सबसे बढ़कर अपनी अनूठी पोशाकें हैं। इस लेख में हम उत्तराखंड के गढ़वाली, कुमाऊंनी और जनजातीय समुदायों के पारंपरिक पहनावे, आभूषणों और उनके महत्व पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
Table of Contents
उत्तराखंड की पारंपरिक पोशाक का भौगोलिक और सांस्कृतिक महत्व
किसी भी क्षेत्र की वेशभूषा वहाँ की जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों से गहराई से प्रभावित होती है। उत्तराखंड एक पहाड़ी और बर्फीला क्षेत्र है, इसलिए यहाँ की पारंपरिक पोशाक इस तरह से तैयार की गई है जो लोगों को कड़कड़ाती ठंड से बचा सके और साथ ही दुर्गम रास्तों पर चलने और कठिन शारीरिक श्रम करने में सहज हो।
कुमाऊं और गढ़वाल दोनों ही क्षेत्रों में सदियों से अपनी संस्कृति और पहनावे को सहेज कर रखा गया है। आधुनिकता के इस दौर में भी त्योहारों, शादियों और धार्मिक अनुष्ठानों के अवसर पर लोग अपनी पारंपरिक पोशाक को बेहद गर्व के साथ पहनते हैं।
गढ़वाल क्षेत्र में महिलाओं की पारंपरिक पोशाक (Garhwali Uttarakhand Traditional Dress For Women)
गढ़वाल क्षेत्र की महिलाओं का पहनावा सादगी और शालीनता का अद्भुत उदाहरण है। यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ बहुत कठिन हैं, जिसके कारण यहाँ का पहनावा व्यावहारिक और आरामदायक बनाया गया है।
१. साड़ी पहनने की अनूठी शैली (घाती धोती)
गढ़वाली महिलाएं जो साड़ी पहनती हैं, उसे बांधने का तरीका देश के अन्य हिस्सों से काफी अलग होता है। सामान्यतः भारत में साड़ी का पल्लू आगे से पीछे या पीछे से आगे कंधे पर डाला जाता है, लेकिन गढ़वाल में इसे ‘घाती’ या ‘घाती धोती’ शैली में बांधा जाता है। इसमें साड़ी के पल्लू को पीछे से लाकर आगे की तरफ दोनों कंधों पर बांधा या फंसाया जाता है। यह शैली महिलाओं को पहाड़ों पर चढ़ने-उतरने और खेतों में काम करने के दौरान काफी आसानी प्रदान करती है।
२. आंगरा या आंगड़ी (Angra or Angdi)
साड़ी या ब्लाउज के ऊपर पहने जाने वाले एक पारंपरिक ऊपरी वस्त्र को ‘आंगरा’ या ‘आंगड़ी’ कहा जाता है। यह एक प्रकार का फुल-स्लीव (पूरी आस्तीन का) कुर्ता या जैकेट होता है, जो पहाड़ी हवाओं और कड़ाके की ठंड से महिलाओं के शरीर को गर्म रखने के लिए पहना जाता है।
३. कमरबंद (Kamarbandh)
खेतों में काम करते समय या जंगलों से घास और लकड़ियां लाते समय साड़ी ढीली न हो और कमर को अतिरिक्त सहारा मिले, इसके लिए गढ़वाली महिलाएं कमर पर एक कपड़ा बांधती हैं, जिसे कमरबंद कहा जाता है। कुछ विशेष अवसरों पर चाँदी की बनी सुंदर कमरबंद (तगड़ी) भी पहनी जाती है।
४. ढांटू या हेडस्कार्फ (Dhantu)
पहाड़ों में धूप, धूल और ठंडी हवाओं से सिर को बचाने के लिए और काम करते समय बाल आगे न आएं, इसके लिए महिलाएं सिर पर एक स्कार्फ बांधती हैं जिसे ‘ढांटू’ कहा जाता है। यह ग्रामीण गढ़वाल में महिलाओं की पहचान का एक अनिवार्य हिस्सा है।

५. विशाल गढ़वाली नथ (Garhwali Nath)
गढ़वाली सुहागिन महिलाओं के सिंगार में नथ का स्थान सर्वोपरि है। गढ़वाल की नथ आकार में काफी बड़ी और भारी होती है। इस पर सोने और मोतियों की बेहद खूबसूरत नक्काशी की जाती है। शादी के दिन से लेकर हर शुभ अवसर पर महिलाएं इसे पहनती हैं।
कुमाऊं क्षेत्र में महिलाओं की पारंपरिक पोशाक (Kumaoni Uttarakhand Traditional Dress For Women)
कुमाऊं क्षेत्र का पहनावा गढ़वाल से काफी भिन्न है और यह अपनी विशिष्ट जीवंतता और कलात्मकता के लिए जाना जाता है।
१. घाघरा और चोली (Ghagra and Choli)
कुमाऊंनी महिलाएं पारंपरिक रूप से एक लंबा, घेरदार घाघरा पहनती हैं, जो मुख्य रूप से सूती या ऊनी कपड़े का बना होता है। इसके ऊपर वे पूरी आस्तीन का ब्लाउज (चोली) या कुर्ता पहनती हैं। सर्दियों में ठंड से बचने के लिए इसके नीचे वे ऊनी कपड़े भी पहनती हैं।
२. रंगवाली पिछौड़ा (Pichora) – कुमाऊं की पहचान
कुमाऊंनी उत्तराखंड पारंपरिक पोशाक में सबसे महत्वपूर्ण और विश्व प्रसिद्ध वस्त्र है ‘पिछौड़ा’ (Pichora)। यह गहरे पीले या केसरिया रंग का एक विशेष दुपट्टा या ओढ़नी होती है, जिस पर लाल या मैरून रंग से पारंपरिक कलाकृतियां और मांगलिक चिह्न जैसे शंख, चक्र, स्वास्तिक, सूर्य और चंद्रमा आदि बने होते हैं।
- महत्व: पिछौड़ा कुमाऊं में सुहाग का प्रतीक माना जाता है। हर विवाहित महिला शादी, नामकरण, जनेऊ और त्योहारों जैसे सभी मांगलिक अवसरों पर इसे अनिवार्य रूप से पहनती है।
३. चरेऊ (Chareu)
कुमाऊं में विवाहित महिलाएं गले में काले मोतियों और सोने के दानों से बनी एक माला पहनती हैं, जिसे ‘चरेऊ’ कहा जाता है। यह उत्तर भारत के मंगलसूत्र के समान ही सुहाग का प्रतीक माना जाता है।
उत्तराखंड में पुरुषों की पारंपरिक पोशाक (Uttarakhand Traditional Dress Male)
उत्तराखंड के पुरुषों का पहनावा उनकी सादगी, गरिमा और पहाड़ी जीवन की कठिन परिस्थितियों के अनुकूल होता है। गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों में पुरुषों के पहनावे में काफी समानताएं देखने को मिलती हैं।
१. कुर्ता और पायजामा (Kurta and Pyjama)
दैनिक जीवन में उत्तराखंड के पुरुष सूती या खादी का कुर्ता और पायजामा पहनते हैं। ऊंचे और पथरीले पहाड़ों पर आसानी से चलने-फिरने के लिए पायजामा ढीला या चूड़ीदार होता है।
२. धोती (Dhoti)
धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और शादियों के अवसर पर पुरुष धोती पहनना पसंद करते हैं।
- गढ़वाल में: गढ़वाली दूल्हा अपनी शादी में पीले रंग की धोती पहनना शुभ मानता है।
- कुमाऊं में: कुमाऊंनी परंपरा में पूजा और शादी के समय पुरुष मुख्य रूप से सफेद या क्रीम रंग की सूती धोती पहनते हैं।
३. अंगरखा या छूबा (Angrakha or Chhuba)
विशेष पर्वों या सांस्कृतिक आयोजनों के समय पुरुष कुर्ते के ऊपर एक लंबा वस्त्र पहनते हैं जिसे ‘अंगरखा’ कहा जाता है। यह सीने के पास से डोरी से बंधा होता है। यह पुरुषों को एक बेहद शालीन और पारंपरिक रूप देता है।
४. पहाड़ी टोपी (Pahadi Topi) – उत्तराखंड का गौरव
उत्तराखंड की पारंपरिक पोशाक पुरुषों के लिए अधूरी है अगर वे सिर पर ‘पहाड़ी टोपी’ न पहनें। यह गहरे रंग (काले या भूरे) के मोटे कपड़े या ऊन से बनी एक गोल टोपी होती है।
- सांस्कृतिक महत्व: पहाड़ी टोपी केवल एक पहनावा नहीं बल्कि उत्तराखंडी अस्मिता और सम्मान का प्रतीक है। आज देश के बड़े-बड़े राजनेता और प्रधानमंत्री भी उत्तराखंड आगमन पर इस टोपी को धारण कर यहाँ की संस्कृति का सम्मान करते हैं।
जौनसारी जनजाति की पारंपरिक पोशाक (Jaunsari Traditional Dress)
उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र में रहने वाले जौनसारी समुदाय का पहनावा गढ़वाल और कुमाऊं दोनों से बिल्कुल अलग और बेहद आकर्षक होता है।
१. महिलाओं का पहनावा
जौनसारी महिलाएं एक विशेष प्रकार का घाघरा और कुर्ती पहनती हैं। इसके साथ ही वे सिर पर एक विशेष प्रकार का स्कार्फ बांधती हैं जिसे ‘धांतु’ ही कहा जाता है, लेकिन इसे बांधने की शैली थोड़ी अलग होती है। जौनसारी महिलाएं ऊन से बने बेहद रंग-बिरंगे और कलात्मक वस्त्र पहनना पसंद करती हैं।
२. पुरुषों का पहनावा
जौनसारी पुरुष पारंपरिक रूप से ऊनी कोट, जिसे स्थानीय भाषा में ‘झुलका’ कहा जाता है, और चूड़ीदार पायजामा पहनते हैं। उनके सिर पर एक विशेष प्रकार की ऊनी टोपी होती है जिसे ‘डिगवा’ कहा जाता है। यह टोपी सामान्य पहाड़ी टोपी से थोड़ी अलग और किनारों से मुड़ी हुई होती है।
उत्तराखंड के पारंपरिक आभूषण (Traditional Jewelry of Uttarakhand)
पोशाक के साथ-साथ उत्तराखंड के पारंपरिक आभूषण भी यहाँ की महिलाओं के श्रृंगार का एक अभिन्न अंग हैं। ये आभूषण सोने और चांदी से बने होते हैं और बेहद कलात्मक होते हैं।
१. गुलूबंद (Guloband)
यह एक प्रकार का चोकर (Choker) हार होता है जो गले से सटकर पहना जाता है। यह लाल या मैरून रंग की मखमली पट्टी पर सोने के चौकोर टुकड़ों को जड़कर बनाया जाता है। कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों की सुहागिन महिलाओं के लिए यह एक अत्यंत लोकप्रिय आभूषण है।
२. हँसुली (Hansuli or Khagwali)
यह चांदी या सोने से बना एक ठोस और भारी गोलाकार आभूषण होता है, जिसे गले में पहना जाता है। यह अपनी बनावट के कारण बेहद आकर्षक लगता है और विशेष अवसरों पर ही पहना जाता है।
३. पौंछी (Pahunchi)
पौंछी कलाई में पहने जाने वाला एक विशेष प्रकार का कंगन या ब्रेसलेट होता है। इसमें लाल रंग के कपड़े के आधार पर सोने के छोटे-छोटे दानों या मणियों को पिरोया जाता है। यह कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों में काफी लोकप्रिय है।
४. बुलाक (Bulaq)
बुलाक नाक के बीच के हिस्से (Septum) में पहने जाने वाला एक पारंपरिक आभूषण है। यह सोने का बना होता है और इस पर बेहद बारीक नक्काशी होती है। हालांकि, आधुनिक समय में इसका चलन काफी कम हो गया है और केवल बुजुर्ग महिलाओं या सुदूर ग्रामीण इलाकों में ही यह देखने को मिलता है।
५. बिछुवा और झांझर (Bichuwa and Payal)
उत्तराखंड में विवाहित महिलाओं के लिए पैरों की उंगलियों में चांदी की बिछिया (बिछुवा) और पैरों में चांदी की भारी पाजेब या झांझर पहनना बेहद जरूरी और सुहाग की निशानी माना जाता है।
आधुनिक युग में उत्तराखंड की पारंपरिक पोशाक का स्वरूप (Modern Influence on Uttarakhand Traditional Dress)
समय के साथ और आधुनिकता के प्रभाव के कारण उत्तराखंड के लोगों के दैनिक पहनावे में काफी बदलाव आया है। आज की युवा पीढ़ी रोजमर्रा की जिंदगी में जींस, टी-शर्ट, सूट और वेस्टर्न ड्रेसेस पहनना अधिक पसंद करती है। लेकिन इसके बावजूद उत्तराखंड की पारंपरिक पोशाक का महत्व कम नहीं हुआ है।
आजकल ‘फ्यूजन वियर’ (Fusion Wear) का चलन बढ़ गया है। युवा लड़कियां और महिलाएं आधुनिक साड़ियों और लहंगों के साथ कुमाऊंनी ‘पिछौड़ा’ पहनना पसंद करती हैं। इसी तरह, आधुनिक कुर्तों के साथ पारंपरिक आभूषणों जैसे गुलूबंद या गढ़वाली नथ को कैरी करके एक नया और ट्रेंडी लुक क्रिएट किया जाता है।
सोशल मीडिया, उत्तराखंडी लोक संगीत के एलबम्स और फिल्मों ने भी पारंपरिक पोशाक को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभाई है। प्रवासी उत्तराखंडी जो देश-विदेश के अन्य शहरों में रहते हैं, वे भी अपनी शादियों और पारिवारिक समारोहों में उत्तराखंड की पारंपरिक पोशाक को बड़े गर्व के साथ पहनते हैं ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़े रह सकें।
निष्कर्ष (Conclusion)
उत्तराखंड की पारंपरिक पोशाक (uttarakhand traditional dress) केवल वस्त्रों का एक समूह नहीं है, बल्कि यह देवभूमि की आत्मा, उसकी अनूठी संस्कृति और गौरवशाली इतिहास का प्रतिबिंब है। गढ़वाल की अनोखी ‘घाती’ साड़ी से लेकर कुमाऊं के पावन ‘पिछौड़ा’ और स्वाभिमान की प्रतीक ‘पहाड़ी टोपी’ तक, हर वस्त्र अपने आप में एक कहानी समेटे हुए है।
भौगोलिक विषमताओं और कड़ाके की ठंड के बीच विकसित हुई यह वेशभूषा आज भी उत्तराखंड के लोगों को उनकी सांस्कृतिक पहचान से जोड़े रखने का सबसे बड़ा माध्यम है। आधुनिकता के इस दौर में भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखना और नई पीढ़ी को इसके प्रति जागरूक करना बेहद जरूरी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न १: उत्तराखंड की सबसे प्रसिद्ध महिला पारंपरिक पोशाक कौन सी है? उत्तर: कुमाऊं क्षेत्र का ‘रंगवाली पिछौड़ा’ और गढ़वाल क्षेत्र की ‘घाती’ स्टाइल में पहनी जाने वाली साड़ी और बड़ी नथ उत्तराखंड की सबसे प्रसिद्ध पारंपरिक महिला पोशाक और श्रृंगार हैं।
प्रश्न २: पिछौड़ा (Pichora) क्या है और इसका क्या महत्व है? उत्तर: पिछौड़ा पीले या केसरिया रंग का एक विशेष मांगलिक दुपट्टा होता है, जिस पर लाल रंग से स्वास्तिक, शंख और सूर्य-चंद्रमा जैसे शुभ प्रतीक बने होते हैं। कुमाऊंनी संस्कृति में इसे सुहाग का प्रतीक माना जाता है और हर शुभ अवसर पर सुहागिन महिलाओं द्वारा इसे पहनना अनिवार्य होता है।
प्रश्न ३: पुरुषों के लिए उत्तराखंड की पारंपरिक पहचान क्या है? उत्तर: पुरुषों के लिए काले या गहरे रंग की ऊनी ‘पहाड़ी टोपी’ उत्तराखंड की पारंपरिक पहचान और गौरव का प्रतीक है। इसके अलावा कुर्ता-पायजामा और विशेष अवसरों पर धोती-कुर्ता पहना जाता है।
प्रश्न ४: ‘गुलूबंद’ आभूषण की क्या विशेषता है? उत्तर: गुलूबंद एक प्रकार का चोकर हार होता है जो गले से पूरी तरह सटा रहता है। यह लाल या मैरून मखमली कपड़े पर सोने के चौकोर टुकड़ों को जड़कर बनाया जाता है, जो कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों में बेहद लोकप्रिय है।
प्रश्न ५: क्या आज भी लोग उत्तराखंड की पारंपरिक पोशाक पहनते हैं? उत्तर: हाँ, हालांकि दैनिक जीवन में लोग अब आधुनिक पश्चिमी कपड़े अधिक पहनने लगे हैं, लेकिन शादियों, स्थानीय त्योहारों (जैसे हरेला, इगास, फूलदेई) और धार्मिक अनुष्ठानों के अवसर पर आज भी लोग पारंपरिक वेशभूषा और आभूषणों को बेहद चाव और गर्व के साथ धारण करते हैं।