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सपनों की उड़ान भरनी है, लेकिन डर, लोभ और आलस ज़ंजीर बन गए हैं? तो जानिए उपाय

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Geeta Updesh Saar: हर व्यक्ति अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता है…सफलता, सम्मान और पहचान पाने की इच्छा हर इंसान के भीतर होती है। हम सब सोचते हैं कि हमारे पास भी वो सब कुछ हो जो एक कामयाब इंसान के पास होता है। लेकिन जैसे ही हमारी आत्मा हमसे कहती है कि इसके लिए कठिन परिश्रम करना होगा, त्याग करना होगा, तब हम अक्सर उस सोच से खुद ही पीछे हट जाते हैं।

हमारा मन सोचता है  “काश मैं भी सफल होता”, लेकिन कर्म के रास्ते पर कदम रखने से पहले ही हम हार मान लेते हैं। यही सबसे बड़ी समस्या है…और इसी का समाधान भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद गीता में दिया है।

महाभारत के युद्ध में अर्जुन की लड़ाई अपने परिजनों से थी…लेकिन आज की पीढ़ी की लड़ाई अपने डर, आलस, मोह, लोभ और नकारात्मक सोच से है। आज हमारी लड़ाई बाहरी नहीं, बल्कि अंदरूनी है। हम चाहते हैं कि सफल हों, लेकिन प्रयास से पहले ही थक जाते हैं। हमारी इच्छाएं तो ऊँची होती हैं…लेकिन मन की दुर्बलता हमें रोक लेती है।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था ….”डर छोड़, खड़ा हो जा”
महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन ने अपने शस्त्र छोड़ दिए और युद्ध से पीछे हटने लगे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें भगवद गीता के दूसरे अध्याय के तीसरे श्लोक में चेताया….

“क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ, नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप॥”

अर्थ:
हे अर्जुन! यह कायरता तुझ पर शोभा नहीं देती। यह तुच्छ हृदय दुर्बलता त्याग दे और युद्ध के लिए उठ खड़ा हो।

यह उपदेश सिर्फ अर्जुन के लिए नहीं हमारे लिए भी है आज जब हम अपने ही विचारों से हार मान जाते हैं…गीता का यही श्लोक हमें फिर से खड़ा होने की प्रेरणा देता है। अगर हम सफलता चाहते हैं…तो डर, आलस, मोह और लोभ को त्याग कर कर्म के रास्ते पर बढ़ना होगा।

अगर आप भी जीवन में बार-बार पीछे हट जाते हैं…अगर सोचते हैं लेकिन कर नहीं पाते….तो गीता का यह उपदेश पढ़िए, समझिए और इसे अपने जीवन में उतारिए। सफलता उन्हीं को मिलती है जो खुद से लड़ना सीख जाते हैं।

 

 

 

#BhagavadGitaLifeLessons #SelfDisciplineandInnerStrength #OvercomingMentalWeakness

 

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