उन्होंने अपराध के साहित्य पर बोलते हुए कहा कि अन्य साहित्य लोग दिल से पढ़ते हैं। जबकि, अपराध के साहित्य को पढ़ने के लिए दिमाग का अधिक प्रयोग होता है। कहानियों और पुलिस की कार्यप्रणाली को समझने के लिए पाठक को अधिक मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन, जब यह साहित्य खुद पुलिस कर्मी लिखता है तो बेहद आसानी होती है।
सत्रों पर विशेषज्ञों ने रखी अपनी राय
इस सत्र में उनके साथ आरके गोस्वामी वक्ता और साहेल माथुर संचालक के रूप में उपस्थित रहे। इससे पहले अंतिम दिन की शुरुआत सत्र जासूसी थ्रीलर के साथ हुई। इसमें सिद्धार्थ माहेश्वरी ने कहा कि जासूसी उपन्यास लिखना रोमांचकारी और कठिन कार्य है। कुख्यात चंदन तस्कर विरप्पन के खिलाफ चले ऑपरेशन ककून पर पूर्व आईपीएस के विजय कुमार ने पूर्व डीजीपी आलोक बी लाल और डीवी गुरू प्रसाद के साथ चर्चा की।
उन्होंने कहा कि विरप्पन जंगल में शिकार करता था। उसका यह क्षेत्र दो राज्यों कर्नाटक और तमिलनाडु का था। उस वक्त चले ऑपरेशन ककून को बेहतर ढंग से चलाने में दोनों राज्यों ने समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया। आईपीएस नवनीत सिकेरा के मुजफ्फरनगर के कार्यकाल पर बनी वेबसीरिज भौकाल पर भी एक सत्र में चर्चा की गई। इसमें एडीजी नवनीत सिकेरा और सीरिज के निर्माता हर्मन बावेजा व लेखक जयशीला बंसल शामिल रहे। इस दौरान निर्माता और लेखक ने कहा कि सीरिज को पुलिस के नियमों को ध्यान में रखकर बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। इसके अलावा कई सत्रों पर विशेषज्ञों ने अपनी राय रखी।