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देहरादून में बना राज्य का पहला आधुनिक इंटेंसिव केयर सेंटर, रेस्क्यू बच्चों को मिलेगा नया जीवन

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देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में बच्चों के भविष्य को संवारने की दिशा में एक सराहनीय और संवेदनशील कदम उठाया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की प्रेरणा और निर्देशन में जिला प्रशासन द्वारा बाल भिक्षावृत्ति और बाल मजदूरी से रेस्क्यू किए गए बच्चों के लिए एक आधुनिक इंटेंसिव केयर सेंटर की स्थापना की गई है। इस सेंटर का उद्देश्य केवल बच्चों को सड़कों और झोपड़ियों से निकालकर सुरक्षित करना ही नहीं, बल्कि उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना भी है…ताकि वे भविष्य में आत्मनिर्भर बन सकें।

इस पुनीत कार्य का नेतृत्व देहरादून के जिलाधिकारी सविन बंसल कर रहे हैं, जिनकी देखरेख में जिला प्रशासन की टीम ने बाल भिक्षावृत्ति निवारण को एक मिशन के रूप में लिया है। इस अभियान के पहले चरण में 51 बच्चों को रेस्क्यू कर विभिन्न सरकारी स्कूलों में दाखिला दिलाया जा चुका है। वहीं, दूसरे चरण में 31 और बच्चों को राजकीय प्राथमिक विद्यालय परेड ग्राउंड और साधूराम इंटर कॉलेज में प्रवेश दिलाया गया है।

मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि देहरादून में बाल भिक्षावृत्ति निवारण के लिए एक विशिष्ट और योजनाबद्ध प्रयास किया जा रहा है। अब हम इन बच्चों को ‘भिक्षा की विवशता से निकालकर शिक्षा के अधिकार’ से जोड़ने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक प्रदेश का हर बच्चा स्कूल नहीं जाने लगता, यह प्रयास लगातार जारी रहेगा।

इस कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एक अंतरविभागीय रेस्क्यू टीम गठित की गई है, जिसमें होमगार्ड, चाइल्ड हेल्पलाइन, शिक्षा विभाग, श्रम विभाग, पुलिस विभाग और कई गैर-सरकारी संस्थाएं (NGOs) सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। टीम के पास तीन रेस्क्यू वाहन भी उपलब्ध हैं, जिनके माध्यम से शहर के अलग-अलग हिस्सों से बच्चों को बचाया जा रहा है।

रेस्क्यू किए गए बच्चों को केवल स्कूल में दाखिला दिलाकर छोड़ नहीं दिया गया है, बल्कि उनके लिए साधूराम इंटर कॉलेज में लगभग 1.5 करोड़ रुपये की लागत से एक इंटेंसिव केयर सेंटर भी बनाया जा रहा है। इस सेंटर में बच्चों के लिए काउंसलिंग, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की जांच री-इंटिग्रेशन प्रोग्राम और शिक्षा की व्यवस्था की जाएगी।

जिलाधिकारी सविन बंसल ने कहा कि इन बच्चों की ज़िंदगी में बदलाव लाना केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय दायित्व भी है। हम चाहते हैं कि वे अपने पैरों पर खड़े हों, अपने सपनों को पहचानें और उन्हें पूरा कर सकें।

यह पहल केवल एक प्रोजेक्ट नहीं…बल्कि एक क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत है। यह उन तमाम बच्चों की उम्मीद है, जिनकी जिंदगी अब तक केवल फुटपाथों, झुग्गियों और चौक-चौराहों तक सीमित थी। अब उनके पास भी वो मंच है, जहां से वे अपने कल को एक नई दिशा दे सकते हैं।

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