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रोमांस का खतरनाक खेल: जानिए क्यों बढ़ रहे हैं युवा प्रेमी-प्रेमिकाओं के बीच खतरनाक रुझान !

Girls crossing all limits during romance: अब वो दिन गए जब कॉलेज के लड़के सालों लग जाते थे किसी लड़की से बात करने में। आजकल, स्कूल और कॉलेजों में एक नया और खतरनाक किस्म का रोमांस बढ़ता जा रहा है। अब लड़के नहीं, बल्कि लड़कियां पहल करने लगी हैं और अपने स्कूल के दिनों से ही संबंध बनाने के लिए सीमा से आगे बढ़ने लगी हैं। पहले प्यार और रोमांस का मतलब केवल एक-दूसरे के साथ समय बिताने और भावनाओं को साझा करने तक ही सीमित था, लेकिन अब डिजिटल युग में यह सब कुछ बदल चुका है।
आजकल के टीनएज रोमांस में कोई बंधन नहीं है कि एक से प्यार करना है या कई लोगों के साथ शारीरिक संबंध बनाना है। पहले यह सब अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में देखा जाता था, लेकिन अब इंटरनेट के ज़रिए यह ट्रेंड हर देश और हर युवा तक पहुंचने लगा है।
रिपोर्ट में खुलासा:
न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में कम उम्र की लड़कियां आक्रामक रूप से यौन संबंध बनाने लगी हैं। हाई स्कूल और कॉलेजों में किए गए शोध में यह पाया गया है कि अब लड़कियां अपने पार्टनर का गला दबाने में आनंद लेती हैं। खासतौर पर 12 से 17 साल के बीच की उम्र के युवाओं में यह ट्रेंड तेज़ी से बढ़ रहा है। एक हालिया सर्वे में पाया गया कि दो तिहाई लड़कियां अपने पार्टनर का गला दबाती हैं, जबकि इनमें से एक चौथाई ने यह कदम पहली बार उठाया।
डॉ. हारबेनिक, जो यौन व्यवहार पर रिसर्च करती हैं, कहती हैं कि इस तरह की गतिविधियां अत्यंत खतरनाक हो सकती हैं। इंटीमेसी के दौरान गला दबाने से ब्रेन में ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे स्ट्रोक का खतरा हो सकता है। यह भी देखा गया है कि पिछले कुछ सालों में, 2020 से इस प्रकार के खतरनाक ट्रेंड की शुरुआत हुई है।
कैसे पोर्नोग्राफी का असर बढ़ा:
डॉ. हारबेनिक ने बताया कि एक मुख्य कारण यह है कि आजकल पोर्नोग्राफी का इस्तेमाल सामान्य हो गया है। मुफ्त में उपलब्ध होने के कारण अब मोबाइल पर यह किसी भी उम्र के बच्चों के लिए सुलभ है। टीनएजर्स इसे देख कर वास्तविक जीवन में इसे अपनाने की कोशिश करते हैं। यौन शिक्षा का डिफॉल्ट स्रोत अब मोबाइल बन चुका है, और टीनएज युवा पोर्न के बर्ताव को सामान्य मानने लगे हैं, भले ही वह व्यवहार वास्तविक नहीं होता।
क्यों हो रहा है यह बदलाव?
डॉ. हारबेनिक के अनुसार, जब कोई चीज़ डरावनी या अजीब लगती है, तो लोग उसकी ओर आकर्षित होते हैं। यही कारण है कि पोर्नोग्राफी में दिखाए गए व्यवहार, जैसे गला दबाने या अन्य खतरनाक यौन क्रियाएँ, टीनएजर्स में आकर्षण पैदा करती हैं। पहले ये बातें युवा सिर्फ पोर्न या फिक्शनल मीडिया में ही देखते थे, लेकिन अब यह वास्तविक जीवन में भी देखने को मिल रहा है।
टीनएज रोमांस में बदलाव केवल शारीरिक संबंधों तक ही सीमित नहीं है। यह एक सांस्कृतिक बदलाव का हिस्सा है, जो डिजिटल युग और पोर्नोग्राफी के असर से हुआ है। ऐसे खतरनाक ट्रेंड्स से बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए अभिभावकों, शिक्षकों और समाज को मिलकर प्रयास करना होगा, ताकि वे इन खतरनाक रास्तों से बच सकें और स्वस्थ संबंधों की ओर बढ़ सकें।
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10 Jan 2026 : विश्व हिंदी दिवस आज , जानें संपूर्ण इतिहास और रोचक तथ्य…

10 Jan 2026 : विश्व हिंदी दिवस (World Hindi Day)
आज 10 jan 2026 है, और पूरी दुनिया ‘विश्व हिंदी दिवस’ (World Hindi Day) के उल्लास में डूबी है। फिजी के तटों से लेकर मॉरीशस की गलियों तक और अमेरिका के सिलिकॉन वैली से लेकर संयुक्त राष्ट्र के गलियारों तक, आज हिंदी की गूंज सुनाई दे रही है। हिंदी अब केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है; यह एक वैश्विक भाषा बन चुकी है।
इस विस्तृत लेख में हम विश्व हिंदी दिवस(World Hindi Day) के गहरे इतिहास, इसके महत्व, और 10 जनवरी की तारीख के पीछे के विशेष कारणों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
Table of Contents
विश्व हिंदी दिवस क्या है? (What is World Hindi Day?)
विश्व हिंदी दिवस प्रतिवर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य हिंदी भाषा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देना, वैश्विक मंच पर इसे एक सशक्त पहचान दिलाना और दुनिया भर के हिंदी प्रेमियों को एक सूत्र में बांधना है।
जहाँ राष्ट्रीय हिंदी दिवस (14 सितंबर) भारत की आंतरिक राजभाषा के रूप में हिंदी के सम्मान पर केंद्रित है, वहीं विश्व हिंदी दिवस का फलक अंतरराष्ट्रीय है। इस दिन विदेशों में स्थित भारतीय दूतावास विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं, जिसमें गैर-हिंदी भाषियों को इस भाषा की सुंदरता और गहराई से परिचित कराया जाता है।
इतिहास: 10 जनवरी की तारीख ही क्यों?
विश्व हिंदी दिवस मनाए जाने के पीछे एक बहुत ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है।
1. प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन (1975)
10 जनवरी 1975 को महाराष्ट्र के नागपुर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इस सम्मेलन का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था।
- उद्देश्य: हिंदी को अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में पहचान दिलाना।
- सहभागिता: इस ऐतिहासिक सम्मेलन में 30 देशों के 122 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था।
- अध्यक्षता: मॉरीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम ने इस सम्मेलन की अध्यक्षता की थी।
2. आधिकारिक घोषणा (2006)
हालाँकि पहला सम्मेलन 1975 में हुआ था, लेकिन इसे ‘दिवस’ के रूप में आधिकारिक पहचान मिलने में समय लगा। साल 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने घोषणा की कि हर साल 10 जनवरी को ‘विश्व हिंदी दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा। तब से लेकर आज तक, यह सिलसिला निरंतर जारी है।
10 Jan 2026 : विश्व हिंदी दिवस और राष्ट्रीय हिंदी दिवस में अंतर
अक्सर लोग इन दोनों तिथियों के बीच भ्रमित हो जाते हैं। इसे समझने के लिए नीचे दी गई तालिका देखें:
| विशेषता | विश्व हिंदी दिवस | राष्ट्रीय हिंदी दिवस |
| दिनांक | 10 जनवरी | 14 सितंबर |
| उद्देश्य | वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार | भारत में राजभाषा के रूप में सम्मान |
| ऐतिहासिक संदर्भ | 1975 का नागपुर सम्मेलन | 1949 में संविधान सभा द्वारा राजभाषा घोषित |
| घोषणा वर्ष | 2006 (डॉ. मनमोहन सिंह) | 1953 (पंडित नेहरू) |
विश्व हिंदी दिवस 2026 की थीम (Theme 2026)
हर साल विश्व हिंदी दिवस के लिए एक विशेष विषय (Theme) निर्धारित किया जाता है। 2026 के लिए इस वर्ष की थीम है:
“हिंदी: पारंपरिक ज्ञान से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तक”
यह थीम इस बात का प्रतीक है कि हिंदी अब केवल साहित्य और काव्य की भाषा नहीं रह गई है, बल्कि यह तकनीक और भविष्य की भाषा बन रही है। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और ओपनएआई (ChatGPT) जैसे प्लेटफॉर्म्स पर हिंदी के बढ़ते डेटा और उपयोग ने इसे डिजिटल युग की अग्रणी भाषा बना दिया है।
हिंदी का वैश्विक विस्तार: आंकड़े क्या कहते हैं?
हिंदी दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। ‘एथनोलॉग’ (Ethnologue) की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 61 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते हैं।
- प्रवासी भारतीय: अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जो अपनी जड़ों से जुड़े रहने के लिए हिंदी का उपयोग करते हैं।
- फिजी और मॉरीशस: फिजी में हिंदी को आधिकारिक भाषाओं में से एक का दर्जा प्राप्त है।
- यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र: हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र (UN) ने अपने सोशल मीडिया और सूचना पोर्टलों पर हिंदी का उपयोग बढ़ा दिया है, जो एक बड़ी कूटनीतिक जीत है।
विश्व हिंदी दिवस कैसे मनाया जाता है?
दुनिया भर में इस दिन विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन होता है:
- दूतावासों में कार्यक्रम: विदेशों में स्थित भारतीय मिशन निबंध प्रतियोगिता, कविता पाठ और चर्चाएं आयोजित करते हैं।
- शैक्षणिक संस्थान: स्कूलों और विश्वविद्यालयों में वाद-विवाद प्रतियोगिताएं होती हैं।
- डिजिटल अभियान: सोशल मीडिया पर हिंदी हैशटैग्स ट्रेंड करते हैं और लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं।
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निष्कर्ष: हमारा संकल्प
विश्व हिंदी दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक संकल्प है। यह संकल्प है—हिंदी को विश्व मंच पर उसका जायज हक दिलाने का। जैसे-जैसे भारत एक वैश्विक शक्ति (Vishwa Guru) के रूप में उभर रहा है, उसकी भाषा का महत्व भी उसी अनुपात में बढ़ रहा है।
हमें गर्व होना चाहिए कि हमारी भाषा इतनी लचीली है कि वह वेदों की ऋचाओं को भी समेटे हुए है और आज के दौर में ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ के साथ भी कदम से कदम मिलाकर चल रही है।
शुभकामना संदेश:
“हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति का दर्पण है। आइए, इस विश्व हिंदी दिवस पर हम हिंदी को और अधिक समृद्ध और वैश्विक बनाने का संकल्प लें।”
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शेख हसीना को लेकर क्या होगा भारत का फैसला, भारत पर टिकी पूरे दुनिया की निगाहें

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सजा-ए-मौत का फरमान जारी होने के बाद से ही भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि चर्चाओं में है। आपको बता दें कि अंतराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ( ICT) ने सोमवार 17 नवंबर को अपदस्थ शेख हसीना को उनकी अनुपस्थिति में मानवता के विरुद्ध अपराध के लिए मौत की सजा सुना दी है।
चीन और पकिस्तानबना सकते हैं भारत पर दबाव
अंतराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण, बांग्लादेश ने उन्हें पिछले साल जुलाई-अगस्त में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन को हिंसक तरीके से कुचलने और करीब 1400 प्रदर्शनकारियों की मौत का जिम्मेदार ठहराया है। जहां एक ओर बांग्लादेश की अंतरिम सरकार द्वारा भारत को स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अगर भारत शेख हसीना को उन्हें नहीं सौंपता तो इसे शत्रुता पूर्ण व्यवहार माना जाएगा। चीन और पाकिस्तान के लिए भारत को घेरने के लिए ये अच्छा मौका हो सकता है। चीन और पकिस्तान भी इस मामले पर अप्रत्यक्ष रूप से दबाव डालने की कोशिश कर सकते हैं। पूरे विश्वभर में इस मामले को लेकर चर्चाएं तेज हैं ऐसे में सबकी निगाहें भारत पर होंगी।
भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि को लेकर चर्चाएं क्यों ?
पिछले कई महीनों से बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत में शरण लेकर रह रही हैं। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार पहले ही उनका राजनयिक पासपोर्ट रद्द कर चुकी है अब उन्हें मानवता के विरुद्ध अपराध में दोषी ठहराते हुए अंतराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने मौत की सजा का फरमान जारी कर दिया है। जिसके बाद बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने भारत सरकार को बकायदा पत्र लिख कर शेख हसीना को वापस सौंपने की मांग की है। जिसमें उनकी ओर से भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि का हवाला देकर कहा गया कि अगर भारत ऐसा नहीं करता है तो ये अत्यंत शत्रुतापूर्ण व्यवहार होगा।
क्या है भारत बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि ?
भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि वर्ष 2013 में दोनों देशों की साझा सीमाओं पर आतंकवाद से निपटने के लिए एक रणनीतिक उपाय के रूप में लागू किया गया था। जिसमें वर्ष 2016 में दोनों देशों द्वारा भगोड़ों के आदान-प्रदान के लिए संशोधन किया गया था। इस संधि के तहत कई आपराधिक पृष्टभूमि के लोगों को वापिस सौंपा गया। वर्ष 1975 में में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के मामले में दो दोषियों को फांसी की सज़ा के लिए वर्ष 2020 में बांग्लादेश को वापिस सौंपा गया। प्रतिबंधित यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के महासचिव अनूप चेतिया का प्रत्यर्पण भी भारत को सफलतापूर्वक किया गया था। इस संधि में ऐसे व्यक्तियों के प्रत्यर्पण का प्रावधान है, जिन पर ऐसे अपराधों के आरोप हैं जिनके लिए कम-से-कम एक वर्ष की सजा दी जा सकती है। प्रत्यर्पण के लिए एक मुख्य आवश्यकता दोहरी आपराधिकता का सिद्धांत है जिसका अर्थ है कि अपराध दोनों देशों में दंडनीय होना चाहिए।
क्या भारत रोक सकता है शेख हसीना की फांसी की सजा ?
पूर्व बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत में शरण लेकर रह रही हैं। जबकि उन्हें अंतराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण के द्वारा मौत की सजा का फरमान जारी किया गया है। ऐसे में सवाल ये उठता हैं कि- क्या भारत के पास कुछ ऐसी ताकतें हैं जो शेख हसीना की फांसी की सजा को रोक सकती हैं ? देखिए भारत के पास प्रत्यक्ष रूप से तो ऐसी कोई ताकत नहीं हैं जिस से भारत फांसी की सजा रोक सके। लेकिन कुछ अन्य पहलुओं की मदद से भारत शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग को अस्वीकार कर सकता है।
भारत के कौन से तर्क हो सकते हैं ख़ास
संधि के अनुच्छेद 6 के अनुसार यदि अपराध राजनीतिक प्रकृति का है तो प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है। लेकिन इसकी भी कुछ कठोर सीमाएं तय हैं इसमें हत्या, आतंकवाद से संबंधित अपराध और अपहरण जैसे कई अपराधों को राजनीतिक प्रकृति के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है। बांग्लादेश में “क्राइम्स अगेंस्ट ह्यूमैनिटी” यानि मानवता के खिलाफ अपराध, देश के युद्ध अपराध कानून के तहत परिभाषित है। लेकिन भारत आमतौर पर ऐसे अपराधों को अंतरराष्ट्रीय अदालतों के संदर्भ में देखता है, घरेलू राजनीतिक घटनाओं के संदर्भ में नहीं। इसीलिए भारत के पास यहां अपने तर्क रखने का मौका है।
क्या होगा अगर भारत प्रत्यर्पण की मांग को अस्वीकार कर दे
अगर फिर भी भारत प्रत्यर्पण की मांग को अस्वीकार कर देता है तो ऐसे में दोनों देशों के संबंधों में बहुत हद तक कड़वाहट पैदा हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार इससे दोनों देशों के कूटनीतिक ओर व्यापारिक रिश्तों गहरा असर पड़ सकता है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में सलाहकार मुहमद यूनुस ने शेख हसीना और भारत के खिलाफ “मानवता के विरुद्ध अपराध” शब्द को हथियार बनाया है। बांग्लादेश दक्षिण एशियाई देशों में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, जिसका द्विपक्षीय व्यापार वित्त वर्ष 2022-23 में 15.9 बिलियन डॉलर होने का अनुमान है। ऐसे में यह मामला भारत की विदेश नीति के लिए अग्निपरीक्षा साबित हो सकता है।
भारत किसी भी परिस्थिति में शेख हसीना को बांग्लादेश के हवाले नहीं कर सकता : डिप्लोमेट एसडी मुनी
भारत के दिग्गज डिप्लोमेट एसडी मुनी के अनुसार, भारत का मुख्य तर्क ये है कि जिस इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने ये फैसला दिया है, उसकी वैधता ही सवालों के घेरे में है। मुनी ने आगे बताया कि शेख हसीना पर हिंसा भड़काने के आरोप लगाए गए हैं, लेकिन इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किए गए। उन्होंने ये भी कहा कि जिन पुलिसकर्मियों पर प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने के आरोप हैं, उनकी पहचान पुख्ता करना मुश्किल है, क्योंकि वो कोई भी हो सकता है। इसके अलावा मुनी ने संकेत दिया कि इस पूरे प्रकरण में सेना की भी भूमिका रही थी। ऐसे हालात में, उनके मुताबिक, ये पूछना जरूरी है कि जब मामले में सेना सक्रिय हो जाए तो एक प्रधानमंत्री वास्तव में कितना नियंत्रण रख सकता है।
International
नेपाल में उग्र हालात: भारतीय विदेश मंत्रालय ने नागरिकों से की नेपाल यात्रा से बचने की अपील

काठमांडू: नेपाल में इन दिनों हालात बेहद नाजुक और अशांत हो गए हैं। राजधानी काठमांडू समेत देश के कई हिस्सों में सरकार के खिलाफ उग्र विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। बीते दो दिनों से जारी यह आंदोलन अब हिंसक रूप ले चुका है। सड़कों पर हजारों की संख्या में छात्र और युवा उतर आए हैं, जो मौजूदा व्यवस्था और नेताओं के खिलाफ नाराज़गी जताते हुए आगजनी और तोड़फोड़ कर रहे हैं।
मंगलवार को नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद से देश की राजनीतिक स्थिति और ज्यादा अस्थिर हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, उनके इस्तीफे के बाद कई अन्य मंत्री भी पद छोड़ चुके हैं और कुछ नेता देश से बाहर निकलने की कोशिश में हैं। इसी बीच, प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन और कई पूर्व नेताओं के घरों में आग लगा दी।

कांतिपुर मीडिया समूह के मुख्यालय से उठता धुआं, हिंसा की भयावहता को दिखा रहा है। जानकारी के अनुसार, मंगलवार को हुए प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने मीडिया समूह की इमारत को आग के हवाले कर दिया।
सेना ने संभाला मोर्चा, कर्फ्यू जारी
देश की राजधानी काठमांडू में हालात काबू में लाने के लिए नेपाली सेना ने मोर्चा संभाल लिया है। सेना और सुरक्षाबलों को हिंसा प्रभावित इलाकों में तैनात कर दिया गया है। साथ ही, बुधवार से कर्फ्यू लागू कर दिया गया है जो अगले आदेश तक जारी रहेगा।
नेपाल सेना ने एक बयान जारी कर नागरिकों से सहयोग की अपील करते हुए कहा कि कुछ असामाजिक तत्व स्थिति का गलत फायदा उठा रहे हैं, और देश की सुरक्षा के लिए कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
भारतीय नागरिकों को वापस लाया जा रहा, एडवाइजरी भी जारी
नेपाल की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए भारत सरकार भी सतर्क हो गई है। उत्तर प्रदेश के सोनौली बॉर्डर से भारतीय नागरिकों को SSB की मदद से भारत वापस लाया जा रहा है। केवल मेडिकल या आपात स्थिति में ही नेपाली नागरिकों को भारत में प्रवेश दिया जा रहा है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने बुधवार को यात्रा परामर्श (Travel Advisory) जारी कर भारतीय नागरिकों से अपील की है कि वे नेपाल की अनावश्यक यात्रा से फिलहाल बचें। जो भारतीय नेपाल में पहले से मौजूद हैं, उन्हें घर के अंदर रहने और पूरी सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। साथ ही, काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास ने आपातकालीन संपर्क नंबर भी जारी किए हैं:
+977-980 860 2881 (WhatsApp पर उपलब्ध)
+977-981 032 6134 (WhatsApp पर उपलब्ध)
प्रदर्शनकारियों की मांग: नया संविधान, नया नेतृत्व
प्रदर्शन कर रहे युवाओं और छात्रों का कहना है कि वे नेपाल में “नई पीढ़ी का शासन” चाहते हैं। एक छात्र प्रदर्शनकारी सुभाष ने कहा कि हम भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहते हैं, हमें पुराने नेताओं से कोई उम्मीद नहीं। हम नए नियम-कानून और एक मजबूत नेतृत्व की मांग कर रहे हैं। हमने पुराने नेताओं को खदेड़ दिया, अब वक्त है एक नई शुरुआत का।
प्रदर्शनकारियों ने दावा किया है कि वे पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा और उनकी पत्नी का घर भी जला चुके हैं।
भारत सरकार की सतर्क निगाह
नेपाल के हालात पर भारत सरकार भी लगातार नजर बनाए हुए है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिमाचल और पंजाब के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण कर लौटने के बाद नेपाल की स्थिति को लेकर कैबिनेट समिति की आपात बैठक की। माना जा रहा है कि भारत, नेपाल में अपने नागरिकों की सुरक्षा और सीमावर्ती क्षेत्रों की स्थिति को लेकर सजग है।
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