Champawat
शक्तिपीठ मां पूर्णागिरि धाम में आयोजित होने वाले वार्षिक मेले का कुमाऊ आयुक्त ने किया शुभाराम्भं, 82 दिनों तक होगा आयोजित।

टनकपुर – उत्तरभारत के सुप्रसिद्ध शक्तिपीठ मां पूर्णागिरि धाम आयोजित होने वाले वार्षिक मेले का शुभारंभ माता के जयकारों के बीच कुमाऊं मंडल के आयुक्त दीपक रावत के द्वारा ठूलीगाड़ में विधि विधान से पूजा पाठ कर एवं फीता काटकर किया गया। इस बर्ष मेला 26 मार्च से 15 जून तक 82 दिनों के लिए आयोजित किया जाएगा। आयुक्त दीपक रावत ने अपनी धर्मपत्नी के साथ माता के मंदिर तक यात्रा कर माता के दर्शन किए एवं विधि विधान से पूजा पाठ संपन्न किया। इस अवसर पर उन्होंने प्रदेश व जनपद निवासियों के लिए सुख शान्ति एवं खुशहाली की मंगल कामना की।

आयुक्त रावत ने कहा कि देश के सुप्रसिद्ध माता पूर्णागिरि धाम मेले का शुभारंभ करना उनका सौभाग्य है। साथ ही उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं के लिए प्रशासन की ओर से यहां बेहतर सुविधाएं विकसित कराई गई है और आगे भी विकसित कराने का पूर्ण प्रयास किया जाएगा।

उन्होंने कहा मां पूर्णागिरि मेला उत्तर भारत का प्रसिद्ध मेला है जहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु विभिन्न स्थानों से आते हैं। उन्हें प्रत्येक सुविधा मुहैया कराना जिला प्रशासन की प्राथमिकता है। इसके अतिरिक्त आयुक्त कुमाऊं ने मेला क्षेत्र में पथ प्रकाश, सड़क, बिजली, पानी, शौचालय, पेयजल सहित विभिन्न व्यवस्थाओं का जायजा लिया साथ ही संबंधित विभागों के अधिकारियों को सभी व्यवस्थाएं दुरुस्त रखने के निर्देश दिए।
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Champawat: पड़ोसी ने बुजुर्ग की दरांती से हमला कर की हत्या, इलाके में दहशत का माहौल

सनिया गाँव में बुजुर्ग की बेरहम हत्या, आरोपी को पुलिस ने किया गिरफ्तार
मुख्य बिंदु
चंपावत (Champawat): उत्तराखंड के चंपावत जिले से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है. जहाँ मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर एक गाँव में एक बुजुर्ग की दरांती से हत्या कर दी गई है. घटना के बाद से पूरे इलाके में दहशत का माहौल है.
CHAMPAWAT में बुजुर्ग की दरांती से हत्या
जानकारी के मुताबिक, चंपावत जिले के सनिया गांव में एक बुजुर्ग पर धारदार हथियार से हमला कर उसकी हत्या कर दी गई. आरोपी की पहचान मृतक के पड़ोसी सुभाष खर्कवाल के रूप में हुई है. आरोपी मानसिक रूप से बीमार बताया जा रहा है.
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आरोपी को पुलिस ने किया गिरफ्तार
घटना की जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने हत्यारोपी को गिरफ्तार कर लिया है. पूरी घटना की खबर से क्षेत्र में दहशत का माहौल है. मृतक की पहचान 80 साल के अंबादत्त खर्कवाल पुत्र स्वर्गीय भैरव दत्त खर्कवाल निवासी के रूप में हुई है. जिनकी शनिवार को अपने ही घर में दरांती से वार कर हत्या कर दी गई है.
आरोपी मानसिक रूप से है बीमार
पुलिस ने मौके पर पहुंचकर शव को कब्जे में लेकर पंचनामा भरने की कार्रवाई की. आरोपी सुभाष खर्कवाल को तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया है, जिसे मानसिक रूप से बीमार बताया जा रहा है. लेकिन, हत्या के पीछे की असल वजह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाई है.
कोतवाली प्रभारी बीएस बिष्ट ने बताया कि
शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल चंपावत भेज दिया गया है और मामले की गहन जांच जारी है. दूसरी ओर, इस घटना से गांव के लोग दहशत में हैं और उन्होंने पुलिस से सुरक्षा बढ़ाने की मांग की है.
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लोहाघाट में देवदार के जंगलों पर मंडरा रहा खतरा, प्रशासन ने अपनाया सख्त रुख, जानिए विस्तार से…
Champawat News: लोहाघाट के देवदारों पर संकट, प्रशासन और वन विभाग ने कड़ा रुख अपनाया
मुख्य बिंदु
Champawat News: चंपावत जिले के लोहाघाट क्षेत्र, जो अपनी घनी देवदार (Deodar cedar) की पहाड़ियों और हरे-भरे जंगलों के लिए जाना जाता है। आज गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहा है। बीते कुछ वर्षों में नगर में लगातार बढ़ते कंक्रीट के जंगल, अतिक्रमण और अवैध कटान ने इन दुर्लभ वृक्षों को संकट में डाल दिया है। हाल ही में नगर क्षेत्र में देवदार के सूखते पेड़ों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद जिला प्रशासन और वन विभाग सक्रिय हो गया है।
जिलाधिकारी मनीष कुमार के निर्देश पर लोहाघाट वन विभाग ने जहां देवदार (Deodar cedar) के सूखते पेड़ों का उपचार शुरू किया है। साथ ही अज्ञात लोगों के खिलाफ वन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
Champawat Deodar Cedar Trees देवदारों की स्थिति गंभीर
लोहाघाट (Lohaghat) नगर पालिका क्षेत्र में देवदारों की दुर्लभ और ऐतिहासिक प्रजाति पर संकट लगातार बढ़ रहा है। नगर क्षेत्र में रसायन डालकर पेड़ों को सुखाने की घटनाओं के सामने आने के बाद प्रशासन और वन विभाग ने कड़ा रुख अपनाया। ये मामला सोशल मीडिया पर वायरल होते ही प्रशासन के संज्ञान में आया।
मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए वन विभाग ने कार्रवाई शुरू की। उप प्रभागीय वन अधिकारी सुनील कुमार के नेतृत्व में टीम ने लगभग एक दर्जन से अधिक देवदार के हरे पेड़ों में गार्डनिंग और विशेष ट्रीटमेंट किया, ताकि उन्हें पूरी तरह से सूखने से बचाया जा सके। साथ ही, वन संरक्षण अधिनियम के तहत अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।
प्रशासनिक जटिलताएं और जिम्मेदारी का बंटवारा
Lohaghat में देवदारों की सुरक्षा को लेकर कई सालों से प्रशासनिक उलझन चली आ रही है। ज्यादातर भूमि नजूल श्रेणी की है, जिसका निरीक्षण राजस्व विभाग करता रहा है। वहीं, पेड़ों की सुरक्षा का जिम्मा नगर पालिका और वन विभाग के बीच स्पष्ट रूप से तय नहीं हो पाया। अब जिलाधिकारी ने जनवरी-फरवरी में एरिया वाइज विभागीय जिम्मेदारी तय करने की बात कही थी। लेकिन जमीन पर ये व्यवस्था व्यावहारिक रूप से कठिन मानी जा रही है।
वरिष्ठ पत्रकार गणेश पांडे (Journalist Ganesh Pandey) के मुताबिक, बीते दशकों में नगर क्षेत्र से 12,000 से अधिक देवदार पेड़ गायब हो चुके हैं।
इतिहास में देवदारों की गिनती और संरक्षण
वर्ष 1985 में, जब चंपावत पिथौरागढ़ जिले का हिस्सा था, तत्कालीन पर्यावरण प्रेमी जिलाधिकारी विजेंद्र पाल ने लोहाघाट के प्रत्येक देवदार पेड़ की नंबरिंग और विस्तृत रिकॉर्ड तैयार कराया। उस समय लगभग 15,000 पेड़ों की गिनती की गई थी। इसके बाद साल 2013 में, तत्कालीन जिलाधिकारी चौधरी द्वारा कराई गई गिनती में ये संख्या घटकर करीब 12,000 रह गई। इसके बाद भी अवैध कटान और अतिक्रमण लगातार जारी रहा। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि दिनदहाड़े देवदारों (Deodar cedar) पर कुल्हाड़ी चलने जैसी घटनाएं सामने आने लगीं। वन विभाग ने केवल जुर्माना लगाया, लेकिन इस अपराध की जड़ और स्थायी समाधान पर कोई कार्यवाही नहीं की गई।
स्थानीय सुझाव और संरक्षण के उपाय
Journalist Ganesh Pandey का कहना है कि नगर क्षेत्र में देवदारों की सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और उनका नियंत्रण सीधे थाना द्वारा किया जाए। इसके अलावा, नगर क्षेत्र में देवदार वन क्षेत्र (Deodar cedar) की पूर्ण सुरक्षा वन विभाग को ही सौंपी जाए। नगर पालिका और वन विभाग की संयुक्त गश्त नियमित रूप से की जानी चाहिए। वन क्षेत्र के आसपास रहने वाले लोगों को लिखित रूप से पेड़ों की सुरक्षा की जिम्मेदारी देकर उन्हें सहभागी बनाया जा सकता है। इससे लोग इन्हें अपनी धरोहर समझकर संरक्षित करेंगे।
पर्यटन और धार्मिक महत्व
लोहाघाट के देवदार वन न केवल पर्यावरणीय बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। दिल्ली, कोलकाता और मुंबई जैसे महानगरों से पर्यटक और तीर्थयात्री मायावती आश्रम और रीठा साहिब जैसे धार्मिक स्थलों में आकर इन देवदारों की शोभा का दीदार करते हैं। इसलिए केवल प्रशासनिक उपाय ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों और पर्यटकों की सक्रिय भागीदारी भी इन दुर्लभ वृक्षों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
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माँ पूर्णागिरि मंदिर : इतिहास, महत्व, यात्रा मार्ग और दर्शन गाइड – संपूर्ण जानकारी 2026

🌺 Purnagiri Mandir : दर्शन गाइड
पूर्णागिरि मंदिर (Purnagiri Mandir) उत्तराखंड के टनकपुर क्षेत्र में स्थित देवी शक्ति का अत्यंत प्राचीन और सिद्ध शक्तिपीठ है। इसे माँ पूर्णागिरि, पूर्णा शक्ति, माँ पूर्णा देवी के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर शारदा नदी के तट पर स्थित पहाड़ी के शीर्ष पर बना है और अपनी अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा, सिद्धि, पूर्णता और शक्तिपूजन के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहाँ आने वाले भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं, इसलिए इसे “पूर्ण करने वाली शक्ति” भी कहा जाता है।
Table of Contents
🕉️ पूर्णागिरि मंदिर कहाँ स्थित है? (purnagiri mandir Location)
पूर्णागिरि मंदिर उत्तराखंड राज्य के चंपावत ज़िले के टनकपुर के पास स्थित है।
- समुद्र तल से ऊँचाई लगभग – 3000 मीटर (लगभग)
- शारदा नदी और काली नदी के संगम के निकट
- भारत–नेपाल सीमा के पास
- टनकपुर से दूरी – लगभग 20–22 किलोमीटर

🛕 पूर्णागिरि मंदिर का इतिहास (History of Purnagiri Mandir)
पूर्णागिरि मंदिर का इतिहास सती के 51 शक्तिपीठों से जुड़ा है।
पुराणों में कथा
- भगवान शिव और माता सती का विवाह हुआ
- दक्ष प्रजापति ने यज्ञ किया, लेकिन शिव को आमंत्रित नहीं किया
- अपमान से आहत सती ने यज्ञ कुंड में देह त्याग दी
- शोकाकुल शिव सती के शरीर को लेकर तांडव करने लगे
- ब्रह्मांड की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए
👉 जहाँ-जहाँ टुकड़े गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने
👉 पूर्णागिरि में माता सती का नाभि भाग गिरा
इसलिए इसे परिपूर्ण शक्ति का स्थान माना जाता है।
🙏 धार्मिक महत्व (Spiritual Importance)
- यह 108 सिद्ध शक्तिपीठों में से एक
- मनोकामना पूर्ण करने वाला धाम
- नवदुर्गा का विशेष पूजा स्थल
- कुमाऊँ और तराई क्षेत्र का सबसे बड़ा शक्ति स्थल
- यहाँ नवरात्रि के दौरान लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं
भक्त यहाँ आकर:
- ध्वज चढ़ाते हैं
- मनौती मांगते हैं
- प्रसाद चढ़ाते हैं
- गर्भगृह में दर्शन करते हैं

🧭 पूर्णागिरि मंदिर कैसे पहुँचें? (How to Reach Purnagiri Mandir)
🚆 रेल मार्ग से
सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन – टनकपुर रेलवे स्टेशन
- यहाँ से मंदिर दूरी – लगभग 20–22 किमी
- टैक्सी/जीप आसानी से उपलब्ध
✈️ हवाई मार्ग से
नजदीकी हवाई अड्डा – पंतनगर एयरपोर्ट
- दूरी – लगभग 120 किमी
- पंतनगर से टनकपुर होते हुए मंदिर पहुँचा जाता है
🚌 सड़क मार्ग से
सीधे बसें उपलब्ध:
- हल्द्वानी
- बनबसा
- नैनीताल
- पिथौरागढ़
- खटीमा
- किच्छा
टनकपुर से:
- टैक्सी
- जीप
- साझा मैक्सी कैब
🚶 पैदल चढ़ाई
- टनकपुर से पर्वत तक सड़क
- इसके बाद लगभग 3–5 किमी पैदल ट्रेक
- मार्ग पर रेलिंग, सीढ़ियाँ, दुकानें, चाय-पकौड़े, प्रसाद की दुकानें
🧗 यात्रा रूट संक्षेप में
टनकपुर → ठूलीगाड़ → बाणबसा → शारदा नदी → पूर्णागिरि मंदिर

🕓 दर्शन और खुलने का समय
- सुबह: 5:00 बजे – 12:00 बजे
- शाम: 4:00 बजे – 9:00 बजे
- नवरात्रि में समय बढ़ा दिया जाता है
🌸 पूर्णागिरि मेला (Navratri Mela)
नवरात्रि के समय:
- भव्य मेला लगता है
- लाखों श्रद्धालु आते हैं
- नेपाल से भी भक्त आते हैं
- 2–3 सप्ताह का विशाल पर्व
मेले में:
- झूले
- प्रसाद
- धार्मिक भजन
- धर्म-प्रवचन

🌄 पूर्णागिरि ट्रेकिंग अनुभव
- प्राकृतिक पहाड़
- हरे जंगल
- नदी का नज़ारा
- ठंडी हवा का स्पर्श
- अद्भुत आध्यात्मिक शांति
⚠️ सुरक्षा व यात्रा टिप्स
- सीढ़ियों पर ध्यान से चलें
- बरसात के समय विशेष सावधानी
- नदी के किनारे सेल्फी से बचें
- बुजुर्गों के लिए डांडी-कांडी उपलब्ध
- ऊँचाई पर ठंड बढ़ जाती है – गर्म कपड़े रखें
- पानी और हल्का भोजन साथ रखें
🛍️ आसपास घूमने की जगहें
- टनकपुर शारदा घाट
- बनबसा बैराज
- चंपावत
- पूरनपुर
- पूर्णा नदी तट
💡 पूर्णागिरि मंदिर से जुड़ी रोचक तथ्य
- यह सिद्ध शक्तिपीठ है
- नेपाल सीमा के निकट स्थित
- सती का नाभि भाग यहाँ गिरा माना जाता है
- शारदा नदी के किनारे स्थित
- यहाँ साधना करने वाले अनेक संतों ने सिद्धियाँ प्राप्त की
🌞 आने का सबसे अच्छा समय
- फरवरी से जून
- अक्टूबर से दिसंबर
- नवरात्रि में विशेष भीड़
बरसात में यात्रा कठिन हो सकती है।
🛌 ठहरने की सुविधा
- टनकपुर में होटल
- धर्मशाला
- गेस्ट हाउस
- सरल बजट विकल्प
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🙋 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
❓ पूर्णागिरि मंदिर कहाँ है?
उत्तराखंड के चंपावत जिले के टनकपुर के पास पहाड़ी पर।
❓ यह किस लिए प्रसिद्ध है?
सिद्ध शक्तिपीठ और मनोकामना पूर्ण करने के लिए।
❓ किसका अंग यहाँ गिरा था?
माता सती का नाभि भाग।
❓ कौन सा महीना सबसे अच्छा है?
नवरात्रि और मार्च–अप्रैल।
❓ क्या बच्चे और बुजुर्ग जा सकते हैं?
हाँ, डांडी-कांडी सुविधा उपलब्ध है।
✨ समापन
Purnagiri Mandir केवल धार्मिक स्थान नहीं, बल्कि आस्था, ऊर्जा और प्रकृति का अद्भुत संगम है।
यहाँ आने वाला प्रत्येक भक्त माँ पूर्णागिरि की शक्तिमय उपस्थिति का अनुभव करता है और अपने भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार महसूस करता है।
यदि आप आध्यात्मिक शांति, प्राकृतिक सौंदर्य और शक्तिपूजा का अद्भुत अनुभव लेना चाहते हैं, तो जीवन में एक बार पूर्णागिरि धाम की यात्रा अवश्य करें।
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