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क्या आप जानते हैं कैसे हुई थी लोहड़ी मनाने की शुरूआत ?, इतिहास जानकर चौंक जाएंगे आप

Lohri 2026 : कड़कड़ाती ठंड में उत्तर भारत में रात को अगर आपको ढोल नगाड़ों के साथ गीतों की धुन सुनाई दे तो समझ जाइए लोहड़ी का त्यौहार मनाया जा रहा है। पंजाब में जब सर्द रात में आग की लपटों के साथ लोकगीतों की धुनों के साथ लोहड़ी का त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे क्यों मनाया जाता है और इसे मनाने की शुरूआत कैसे हुई थी ?
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कैसे हुई थी Lohri मनाने की शुरूआत ?
मकर सक्रांति से ठीक एक दिन पहले लोहड़ी का त्यौहार मनाया जाता है। यूं तो पूरे उत्तर भारत में इसकी धूम देखने को मिलती है। लेकिन खासकर पंजाब में इस त्यौहार को धूमधाम से मनाया जाता है। पंजाब में इस त्यौहार को जिन लोगों की नई-नई शादी हुई हो या बच्चा हुआ हो उनके लिए बेहद ही खास माना जाता है। बात करें इस त्यौहार को मनाने की शुरूआत की तो इस त्यौहार को मुगलशासकों के विरुद्ध न्याय की लड़ाई लड़ने वाले लोकप्रिय नायक हिन्दू गुर्जर दुल्ला भट्टी की याद में मनाया जाता है।

ऐसा कहा जाता है कि दुल्ला भट्टी हर किसी की मदद किया करते थे। एक बार उन्होंने एक ब्राह्मण की कन्या जिसका नाम सुंदर मुंदरिए था, उसे मुगलों से बचाया। मुगलों से बचाने के लिए उसका विवाह सुयोग्य हिन्दू वर से करवाया था। दुल्ला भाटी पंडित तो था नहीं इसलिए दोनों के विवाह के लिए उन्होंने आस-पास पड़ी लकड़ियों और गोबर के उपले इकटेठे किए और उन्हें जला दिया। इस दौरान उनके पास मूंगफली, रेवड़ी जैसी कुछ खाने की चीज़ें थी जिन्हें भी उसने आग में डाला और दोनों की शादी करवा दी।
दुल्ला भाटी की याद में मनाया जाता है लोहड़ी का त्यौहार
सुन्दर मुंदरिए की शादी के दौरान दुल्ला भाटी ने एक गीत गाया था जो कि कुछ इस प्रकार था – सुंदर मुंदरिए तेरा कौन विचारा, दुल्ला भट्टीवाला। दुल्ले दी धी व्याही, सेर शक्कर पायी, कुड़ी दा लाल पता। शादी तो हो गई लेकिन मुगलों ने दुल्ला भट्टी पर हमला कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। तभी से दुल्ला भाटी की याद में हर साल 13 जनवरी को Lohri का त्यौहार मनाया जाता है।
रबी की फसल के स्वागत का प्रतीक भी है लोहड़ी
दुल्ला भट्टी के अलावा ही इस त्यौहार को शीत ऋतु के विदा होने और रबी की फसल के स्वागत का प्रतीक भी माना जाता है। लोहड़ी हर साल मकर संक्रांति से एक दिन पहले आती है। इसे सूर्य, अग्नि और फसल से जुड़ा हुआ त्यौहार भी माना जाता है।

ये दिन सूर्य के उत्तरायण होने से पहले की अंतिम रात का संकेत माना जाता है। किसान समाज के लिए इसका विशेष महत्व है, क्योंकि इसी दौर में गेहूं की फसल पकने की ओर बढ़ती है। इस दिन आग की परिक्रमा की जाती है और रेवड़ी, मूंगफली चढ़ाने के साथ खाई भी जाती है। अलाव के चारों ओर घूमकर तिल, गुड़, मूंगफली और रेवड़ी अर्पित करना प्रकृति के प्रति आभार और धन्यवाद व्यक्त करने की परंपरा को दर्शाता है।
Lohri का ऐतिहासिक और सांस्कृति महत्व
लोहड़ी की परंपरा का संबंध लोकनायक दुल्ला भट्टी से है। जिन्हें पंजाब का रॉबिनहुड कहा जाता है। उन्होंने अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया और गरीब व असहाय बेटियों के विवाह में सहयोग देकर समाज में मिसाल कायम की। इसी लिए आज भी उन्हें याद किया जाता है। पंजाब के लोकगीतों में आज भी उनका जिक्र जरूर होता है।

Lohri नवविवाहित दंपतियों और नवजात शिशु वाले परिवारों के लिए बेहद खास है। इस दिन भांगड़ा, गिद्धा, ढोल की गूंज और सामूहिक नृत्य इस पर्व में उल्लास भर देते हैं। यो त्योहार सामूहिक खुशियों का महत्व समझाता है बल्कि ये भी याद दिलाता है कि यही परंपराएं समाज और पीढ़ियों को एक सूत्र में बांधती हैं।
FAQs: Lohri 2026 – लोहड़ी का इतिहास
Q1. लोहड़ी कब मनाई जाती है?
लोहड़ी हर साल 13 जनवरी को मनाई जाती है। यह मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले आती है।
Q2. लोहड़ी का सबसे ज्यादा महत्व किस राज्य में है?
लोहड़ी का विशेष महत्व पंजाब में है, हालांकि उत्तर भारत के कई हिस्सों में भी यह पर्व उत्साह के साथ मनाया जाता है।
Q3. लोहड़ी का संबंध दुल्ला भाटी से क्यों जोड़ा जाता है?
लोहड़ी का इतिहास लोकनायक दुल्ला भाटी से जुड़ा है, जिन्होंने मुगल अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष किया और गरीब बेटियों की मदद की। उनकी याद में ही लोहड़ी के गीत गाए जाते हैं।
Q4. लोहड़ी पर आग जलाने की परंपरा क्यों है?
अलाव जलाना अग्नि देव को समर्पण, ठंड के अंत और नई फसल के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। यह प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का भी तरीका है।
Q5. लोहड़ी पर क्या-क्या चढ़ाया जाता है?
लोहड़ी के दिन तिल, गुड़, मूंगफली, रेवड़ी और पॉपकॉर्न अग्नि में अर्पित किए जाते हैं और इन्हें प्रसाद के रूप में खाया भी जाता है।
Q6. किसानों के लिए लोहड़ी क्यों खास है?
यह पर्व रबी की फसल, खासकर गेहूं की अच्छी पैदावार की उम्मीद और उसके स्वागत का प्रतीक है।
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Happy Lohri 2026 Images: भेजें बेहतरीन कोट्स और फोटोज

HAPPY LOHRI 2026 IMAGES: दोस्तों और परिवार को भेजें ये बेहतरीन कोट्स और फोटोज
हैप्पी लोहड़ी 2026
HAPPY LOHRI 2026 IMAGES: कड़कड़ाती सर्द रातों में जब ढोल-नगाड़ों की थाप और लोकगीतों की मधुर धुन सुनाई दे, तो समझ लीजिए कि लोहड़ी का त्योहार मनाया जा रहा है। खासकर पंजाब और उत्तर भारत में लोग आग के चारों ओर इकट्ठा होकर रेवड़ी, मूंगफली और गजक चढ़ाते हैं और खुशी के साथ नाच-गाना करते हैं। यह त्योहार न सिर्फ फसल कटाई और नए मौसम के स्वागत का प्रतीक है।
बल्कि परिवार और समुदाय को करीब लाने का भी अवसर देता है। माना जाता है कि लोहड़ी की परंपरा प्राचीन काल से जुड़ी है, जब लोग सूर्य के उत्तरायण होने पर प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते थे। धीरे-धीरे यह त्योहार लोककथाओं, वीरता की कहानियों और सामाजिक एकता का उत्सव बन गया। आज भी लोहड़ी लोगों के जीवन में गर्माहट, खुशी और नई उम्मीदों की लौ जलाने का काम करती है।
HAPPY LOHRI WISHES 2026
अगर आप भी अपने दोस्तों और परिवार को लोहड़ी की शुभकामनाएं देना चाहते हैं, तो इन प्यारे मैसेज और फोटो के जरिए अपनी बधाइयाँ ज़रूर भेजें। लोहड़ी का यह खुशनुमा त्योहार रिश्तों में मिठास घोलता है और अपनों के चेहरों पर मुस्कान ले आता है। जलती अग्नि की तरह आपकी जिंदगी भी रोशनी और गर्माहट से भर जाए, इसी कामना के साथ लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाएं अपने प्रियजनों तक पहुँचाएँ और इस त्योहार को और भी यादगार बना दें।
HAPPY LOHRI PHOTOS
लोहड़ी की अग्नि आपकी जिंदगी से अंधकार मिटाए और खुशियों की रोशनी लाए।

“तिल की मिठास, रेवड़ी की बहार—लोहड़ी का त्यौहार लाए खुशियों की बौछार।”

“ढोल की थाप और आग की गर्माहट के साथ, लोहड़ी लाए खुशियों की सौगात।”

सी-खुशी, प्यार-दुलार—लोहड़ी का त्यौहार करे सबका उद्धार।”

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आस्था
Tulsi Pujan Diwas क्यों मनाया जाता है ?, इस दिन सही पूजा से बदल सकती है आपकी किस्मत

Tulsi Pujan Diwas 2025 : हर साल 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस मनाया जाता है। इस दिन अगर आप सही विधि से मां तुलसी की पूजा करेंगे तो आपकी किस्मत भी बदल सकती है। इसके साथ ही आप पर मां तुलसी और भगवान विष्णु की कृपा बरसेगी।
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Tulsi Pujan Diwas क्यों मनाया जाता है ?
तुलसी के पौधे को हिंदू धर्म में माता लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। इस लिए इसकी पूजा करने से स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। यूं तो सालभर तुलसी माता की पूजा की जाती है। लेकिन हर साल 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस (Tulsi Pujan Diwas 2025) मनाया जाता है। तुलसी पूजन दिवस तुलसी के धार्मिक और औषधीय महत्व को दिखाता है।

साल 2014 से हुई थी इसे मनाने की शुरूआत
आपको बता दें कि Tulsi Pujan Diwas मनाने की शुरूआत साल 2014 में हुई थी। देश के कई साधु-संतों ने 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस मनाने का फैसला लिया था। तभी से इसे आज के दिन मनाया जाता है। इस साल यानी कि 25 दिसंबर 2025 को तुलसी पूजन दिवस का शुभ मुहूर्त सुबह आठ बजे से 10 बजे तक रहेगा। वहीं की पूजा का मुहूर्त 5:30 बजे से सात बजे तक रहेगा।

इस दिन सही पूजा से बदल सकती है आपकी किस्मत
तुलसी पूजन दिवस पर अगर आप सही विधि से पूजा करते हैं तो आप पर मां तुलसी और भगवान विष्णु की कृपा हमेशा बनी रहेगी। तुलसी पूजन दिवस पूजा विधि (Tulsi Pujan Diwas Puja Vidhi) शुरू करने से पहले सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लें।

पूजा को शुरू करते हुए स्नान के बाद तुलसी के पौधे में जल अर्पित करें। इसके बाद मां तुलसी को अक्षत, चंदन और रोली चढ़ाएं। फिर अपनी श्रद्धानुसार तुलसी की 7, 11, 21 या 111 परिक्रमा करें। परिक्रमा के दौरान तुलसी माता के मंत्रों का जाप करें। परिवार के साथ तुलसी माता की आरती करें और मां को भोग लगाकर प्रसाद सभी में बांटें। इस दिन शाम को पूजा के बाद तुलसी के पास गाय.
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चारों तरफ इगास की धूम, सासंद बलूनी संग गृह मंत्री शाह ने मनाया इगास

दिल्ली : आज उत्तराखंड में दिवाली के ग्यारह दिन बाद फिर पहाड़ का उल्लास जाग उठा है। घरों की सफाई हो रही है, लोग सजावट में जुटे हुए हैं। कहीं फूलों की माला बन रही है तो रसोई में मीठे पकवान बन रहे हैं। सभी लोकपर्व इगास बग्वाल की तैयारियों में जुटे हुए हैं।
गांवों से लेकर दिल्ली तक इगास की धूम
पहाड़ के छोटे-छोटे गांवों से लेकर राजधानी दिल्ली तक इगास की धूम देखने को मिल रही है। इगास बग्वाल यानी बूढ़ी दिवाली का पर्व पूरे उत्तराखंड में धूमधाम से मनाया जाता है। जो हर साल दीवाली के ठीक 11 दिन बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी तिथि को मनाया जाता है। कुमाऊं में इसे बूढ़ी दिवाली और गढ़वाल में इसे इगास बग्वाल के नाम से जाना जाता है।
इगास के अवसर पर कई स्थानों पर हो रहे कार्यक्रम
इगास के अवसर पर मुख्यमंत्री आवास पिछले वर्षों की भांति ही इस बार भी इगास के कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। उत्तराखंड ही नहीं दिल्ली तक में इगास की धूम देखने को मिल रही है। गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी ने दिल्ली में इगास कार्यक्रम का आयोजन किया। जिसमें गृह मंत्री अमित शाह, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पंडित धीरेंद्र शास्त्री समेत कई बड़ी हस्तियां शामिल हुईं। सभी ने इगास पूजन कार्यक्रम में भाग लिया।
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