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Uttarakhand में जंगली जानवरों के बढ़ते हमलों से दहशत, 25 सालों में 1,264 लोगों की मौत

Uttarakhand : प्रदेश में जंगली जानवरों का आतंक कम होने का नाम नहीं ले रहा है। बीते कुछ समय से पहाड़ों पर गुलदार का आतंक इतना बढ़ गया है कि लोगों को रात के समय तो छोड़ो दिन में भी अपने घरों से बाहर निकलने में डर लग रहा है। आलम ये है कि कुछ जिलों में जंगली जानवरों के हमलों के कारण तो स्कूलों का समय भी बदलना पड़ा है।
Table of Contents
Uttarakhand में जंगली जानवरों के बढ़ते हमलों से दहशत
मानव वन्य जीव संघर्ष की घटनाएं Uttarakhand में लगातार बढ़ रही है। पहाड़ी क्षेत्रों में गुलदार व भालू, मैदानी क्षेत्रों में हाथी ने कई लोगों को मौत के घाट उतारा है। पिछले 25 वर्षों के आंकड़े डरावने तो है ही लेकिन इस साल की घटनाएं उससे भी ज्यादा भय का माहौल पैदा कर रही है। जिस कारण लोगों में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है।
25 सालों में 1,264 लोगों की मौत
उत्तराखंड के पहाड़ी जनपदों के कई गांव में शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है। दिन ढलते ही आवाजाही बंद हो जाती है जिसे देख ऐसा लगता है कि मानो कर्फ्यू लग गया हो। इसके पीछे की वजह प्रदेश में लगातार बढ़ता मानव वन्यजीव संघर्ष है। दिन दोपहरी में भी जंगली जानवर किसी ने किसी को अपने निवाला बना रहे हैं। इसका ताजा उ उदाहरण रामनगर का है जहां बीते शनिवार को एक व्यक्ति पर गुलदार ने हमला कर दिया। इसे व्यक्ति की किस्मत ही कहेंगे कि आस-पास मौजूद लोगों के कारण उसकी जान बच गई।
ये हमला पहली बार नहीं हुआ है, बल्कि ऐसे हमले Uttarakhand में पहाड़ों से लेकर मैदानों तक अब एक आम बात हो गए हैं। बीते 25 वर्षों के आंकड़े पर नजर डालेंगे तो सामने आता है कि जंगली जानवरों ने एक या दो नहीं बल्कि हजारों लोगों को अपना निवाला बनाया है। इन 25 वर्षों में वन्यजीवों ने 1264 व्यक्तियों को मौत के घाट उतारा है, जबकि मौत को मात देते हुए 6519 लोग घायल हुए हैं।
Uttarakhand में इस साल अब तक 64 की मौत
2025 के आंकड़ों ही पर नजर डाली जाए तो ये तस्वीर और भी भयावह है। इस बार जंगली जीवों के हमले से 64 परिवारों के चिराग बुझे हैं। खास तौर पर इस साल भालू का आतंक ज्यादा ही देखने को मिला है। भालू के हमले से नौ लोगों की जान गई है जबकि 25 लोग घायल हुए हैं।
राज्यसभा से लेकर लोकसभा तक गूंजा Uttarakhand Wildlife Attacks का मुद्दा
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जंगली जानवरों के बढ़ते हमलों को लेकर भाजपा सरकार पर कटाक्ष किया है। ये मामला इतना गंभीर है कि न केवल उत्तराखंड विधानसभा के अंदर बल्कि राज्यसभा और लोकसभा के भीतर भी गूंजा है। राज्यसभा में महेंद्र भट्ट ने तो वहीं लोकसभा में अनिल बलूनी ने इस प्रकरण को उठाया है।
ये हाल तब है जब उत्तराखंड 65 फीसद वन आच्छादित है, विभाग में अफसरों की भी लंबी फौज है। लेकिन इसके बावजूद लोग खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं और प्रदेश के वन मंत्री सुबोध उनियाल बयानबाजी में मशगूल हैं। लोग लगातार सवाल पूछ रहे हैं कि कब तक जंगली जानवरों के हमले में उनके अपने जान गंवाते रहेंगे लेकिन वन मंत्री इसका जवाब तक नहीं दे पा रहे। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन कर्फ्यू जैसे हालातों से प्रदेश के लोग कब मुक्त होंगे? इससे भी गंभीर सवाल ये है कि कुंभकर्णी निंद्रा में सोया वन विभाग आखिर कब जागेगा ?
Uttarakhand Wildlife Attacks – FAQs
Q1. उत्तराखंड में जंगली जानवरों के हमले क्यों बढ़ रहे हैं?
उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की प्रमुख वजहें हैं—जंगलों का सिकुड़ना, बढ़ती जनसंख्या, जानवरों का मानव बस्तियों की ओर आना, और भोजन-पानी की तलाश में गांवों में प्रवेश करना।
Q2. सबसे ज्यादा हमले किन जंगली जानवरों द्वारा किए जा रहे हैं?
पहाड़ी क्षेत्रों में गुलदार (तेंदुआ) और भालू, जबकि मैदानी क्षेत्रों में हाथी लोगों पर सबसे अधिक हमले कर रहे हैं।
Q3. पिछले 25 वर्षों में कितने लोग जंगली जानवरों के हमलों में मारे गए हैं?
पिछले 25 सालों में 1,264 लोगों की मौत हुई है। इसके अलावा 6,519 लोग घायल हुए हैं।
Q4. क्या 2025 में भी ऐसे हमलों में बढ़ोतरी हुई है?
हाँ, 2025 में स्थिति और भयावह हो गई है। इस वर्ष अब तक 64 लोगों की मौत जंगली जानवरों के हमलों से हो चुकी है।
Q5. इस साल (2025) कौन सा जानवर सबसे ज्यादा हमला कर रहा है?
2025 में भालू के हमले सबसे अधिक सामने आए हैं—
- 9 लोगों की मौत
- 25 लोग घायल
Q6. क्या इन हमलों का असर स्थानीय जीवन पर पड़ रहा है?
हाँ, बेहद गंभीर असर पड़ रहा है।
कई पहाड़ी गांवों में शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है।
कुछ जिलों में स्कूलों के समय भी बदले गए हैं क्योंकि बच्चों की सुरक्षा को लेकर खतरा बढ़ गया है।
Q7. क्या हाल ही में कोई बड़ा हमला सामने आया है?
हाँ, रामनगर में एक व्यक्ति पर गुलदार ने हमला किया था। वह व्यक्ति मुश्किल से मौत के मुंह से बाहर निकल पाया—उसका बयान भी सामने आया है।
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Border 2 में किस किरदार मे नज़र आए दिलजीत दोसांझ जाने उस परमवीर चक्र विजेता की विजय गाथा…

Nirmal Jit Singh Sekhon : परमवीर चक्र विजेता भारतीय वायु सेना का एक मात्र अधिकारी
Nirmal Jit Singh Sekhon: 23 जनवरी 2026 को रिलीज हुई फिल्म Border 2 ने 1971 के भारत-पाक युद्ध से जुड़े कई वीरों की कहानियों को दोबारा सामने रखा। इन्हीं में एक नाम था Nirmal Jit Singh Sekhon, जिनका किरदार फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने निभाया। ये भूमिका सिर्फ एक सैनिक की नहीं, बल्कि भारतीय वायुसेना के अद्वितीय साहस और सर्वोच्च बलिदान की कहानी को दर्शाती है।
मुख्य बिंदु
Nirmal Jit Singh Sekhon: वायुसेना के इतिहास का विशेष नाम
Nirmal Jit Singh Sekhon भारतीय वायुसेना में फ्लाइंग ऑफिसर के पद पर तैनात थे। उन्हें अनुशासित, निडर और तेज निर्णय लेने वाले पायलट के रूप में जाना जाता था। देश के लिए उनका योगदान इतना असाधारण रहा कि वे भारतीय वायुसेना के इतिहास में परमवीर चक्र से सम्मानित होने वाले एकमात्र अधिकारी बने।
1971 का युद्ध: जब अकेले आसमान में डट गए सेखों
1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान दिसंबर का महीना चल रहा था। 14 दिसंबर 1971 को श्रीनगर एयरबेस पर अचानक हालात बदल गए। पाकिस्तानी वायुसेना ने हवाई हमले की कोशिश की, जबकि उस समय भारतीय एयरबेस पर सुरक्षा संसाधन बेहद सीमित थे।
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इसी नाजुक स्थिति में Flying Officer Nirmal Jit Singh Sekhon ने बिना किसी हिचक के अपने Gnat फाइटर जेट को उड़ाने का फैसला लिया। ये फैसला आसान नहीं था। सामने कई दुश्मन विमान थे और समर्थन लगभग ना के बराबर था।
Nirmal Jit Singh ने आसमान में अकेले ही मोर्चा संभाला
सेखों ने पीछे हटने के बजाय आसमान में अकेले ही मोर्चा संभाला। उन्होंने दुश्मन विमानों को श्रीनगर एयरबेस के करीब आने से रोकने की कोशिश की और अंतिम क्षण तक लड़ते रहे। ये मुकाबला किसी रणनीतिक जीत से ज्यादा कर्तव्य और साहस का प्रतीक बन गया।
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इस संघर्ष में वे वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन उनका यह बलिदान भारतीय सैन्य इतिहास में अमर हो गया। बाद में भारत सरकार ने उनके अद्वितीय साहस को सम्मान देते हुए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया।

Border 2 में दिलजीत दोसांझ की भूमिका
फिल्म Border 2 में दिलजीत दोसांझ ने Nirmal Jit Singh Sekhon का किरदार निभाया, जिसे दर्शकों ने गंभीर और भावनात्मक रूप में देखा। यह भूमिका उनके अब तक के करियर की सबसे अलग और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में गिनी गई।
फिल्म में दिलजीत का किरदार युद्ध के शोर से ज्यादा उस पल के फैसले पर केंद्रित रहा, जब एक पायलट ने जान की परवाह किए बिना अपने एयरबेस और देश की रक्षा को प्राथमिकता दी।
क्यों खास रहा ये किरदार
- ये किरदार किसी काल्पनिक कहानी पर नहीं, बल्कि वास्तविक इतिहास पर आधारित रहा
- 1971 युद्ध की हवाई लड़ाई का दुर्लभ चित्रण दिखाया गया
- भारतीय वायुसेना के सर्वोच्च बलिदान को सम्मान मिला
- नई पीढ़ी को एक भूले-बिसरे नायक से परिचय कराया गया
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फिल्म और दर्शकों की प्रतिक्रिया
Border 2 के रिलीज के बाद इस किरदार को लेकर खास चर्चा हुई। दर्शकों और समीक्षकों ने माना कि Nirmal Jit Singh Sekhon की कहानी फिल्म का सबसे भावनात्मक और प्रभावशाली हिस्सा रही। दिलजीत दोसांझ के अभिनय को संयमित और सम्मानजनक बताया गया।

निष्कर्ष
Nirmal Jit Singh Sekhon सिर्फ एक युद्ध नायक नहीं थे, बल्कि वह उदाहरण थे कि संकट के समय एक निर्णय इतिहास बन सकता है। Border 2 के जरिए उनकी कहानी एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श में आई और यह याद दिलाया कि 1971 के युद्ध में सिर्फ ज़मीन पर नहीं, बल्कि आसमान में भी भारत के वीरों ने इतिहास रचा था।
Who was Nirmal Jit Singh Sekhon?
Nirmal Jit Singh Sekhon भारतीय वायुसेना के फ्लाइंग ऑफिसर थे, जिन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान श्रीनगर एयरबेस की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। वे भारतीय वायुसेना के एकमात्र अधिकारी हैं जिन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
Why is Nirmal Jit Singh Sekhon famous?
Nirmal Jit Singh Sekhon इसलिए प्रसिद्ध हैं क्योंकि उन्होंने 14 दिसंबर 1971 को दुश्मन वायुसेना के कई विमानों का सामना अकेले किया और अंतिम सांस तक लड़ते हुए देश की रक्षा की।
Did Nirmal Jit Singh Sekhon receive the Param Vir Chakra?
Yes. Nirmal Jit Singh Sekhon को उनके अद्वितीय साहस और बलिदान के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
Is Border 2 based on real war stories?
Yes. Border 2 1971 के भारत-पाक युद्ध से जुड़े वास्तविक सैन्य नायकों और उनके बलिदान पर आधारित फिल्म है।
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नीम करौली बाबा कैंची धाम: इतिहास, महत्व, दूरी और यात्रा गाइड 2026…

Neem Karoli Baba Kainchi Dham (बाबा नीम करौली महाराज का परिचय)
Nainitaal : नीम करौली बाबा, जिन्हें उनके भक्त प्रेम से महाराज जी कहते हैं, 20वीं सदी के महान संतों में से एक थे। neem karoli baba kainchi dham उनके प्रमुख साधना स्थलों में गिना जाता है। बाबा की ख्याति केवल भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि विदेशों में भी उनके असंख्य अनुयायी बने।
उनकी शिक्षाएं सरल थीं—प्रेम करो, सेवा करो और ईश्वर पर भरोसा रखो। यही वजह है कि आज भी कैंची धाम आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ महसूस होता है।
कैंची धाम का इतिहास
कैंची धाम की स्थापना 1964 में नीम करौली बाबा द्वारा की गई थी। यह स्थान दो पहाड़ियों के बीच कैंची जैसी आकृति में स्थित होने के कारण कैंची धाम कहलाया।
इतिहास पर नजर डालें तो यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक केंद्र बन चुका है। समय के साथ neem karoli baba kainchi dham आस्था, चमत्कार और विश्वास का प्रतीक बन गया।

कैंची धाम का आध्यात्मिक महत्व
कैंची धाम को ध्यान, भक्ति और आत्मिक शांति का केंद्र माना जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालु मानते हैं कि बाबा आज भी इस धाम में अपनी कृपा बरसाते हैं।
यही कारण है कि हर साल लाखों लोग neem karoli baba kainchi dham पहुंचकर मन की शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव करते हैं।

मंदिर परिसर और वास्तुकला
कैंची धाम का मंदिर परिसर सरल लेकिन अत्यंत प्रभावशाली है। हनुमान जी, राम-सीता और अन्य देवी-देवताओं के मंदिर यहां स्थित हैं।
प्राकृतिक सौंदर्य, पहाड़ों की हरियाली और शांत वातावरण इस स्थान को और भी दिव्य बनाता है।
नीम करौली बाबा की शिक्षाएं
बाबा की शिक्षाएं आज के युग में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। वे कहते थे:
- प्रेम सबसे बड़ा धर्म है
- सेवा ही सच्ची साधना है
- अहंकार को छोड़ो
neem karoli baba kainchi dham इन शिक्षाओं का जीवंत उदाहरण है।
कैंची धाम में प्रमुख उत्सव
15 जून को कैंची धाम स्थापना दिवस मनाया जाता है। इस दिन भव्य भंडारे और पूजा का आयोजन होता है।
देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इस अवसर पर कैंची धाम पहुंचते हैं।
delhi to kainchi dham distance
दिल्ली से कैंची धाम की दूरी लगभग 320 किलोमीटर है।
- सड़क मार्ग से: 8–9 घंटे
- ट्रेन + टैक्सी: 7–8 घंटे
दिल्ली से neem karoli baba kainchi dham जाना श्रद्धालुओं के लिए सुविधाजनक माना जाता है।
nainital to kainchi dham distance
नैनीताल से कैंची धाम की दूरी करीब 17 किलोमीटर है।
- टैक्सी से: 40–50 मिनट
- बस से: 1 घंटा
नैनीताल घूमने आए पर्यटक अक्सर कैंची धाम दर्शन के लिए अवश्य जाते हैं।
kathgodam to kainchi dham distance
काठगोदाम से कैंची धाम की दूरी लगभग 38 किलोमीटर है।
- टैक्सी: 1.5 घंटे
- बस: 2 घंटे
काठगोदाम उत्तराखंड का प्रमुख रेलवे स्टेशन है।
kainchi dham nearest railway station
- काठगोदाम (38 किमी) – सबसे नजदीकी और सुविधाजनक
- हल्द्वानी (40 किमी) – वैकल्पिक स्टेशन
- लालकुआं (60 किमी) – सीमित ट्रेनें
इनमें काठगोदाम kainchi dham nearest railway station के रूप में सबसे लोकप्रिय है।
कैंची धाम कैसे पहुंचें
सड़क मार्ग से
दिल्ली, नैनीताल और हल्द्वानी से नियमित बस और टैक्सी उपलब्ध हैं।
रेल मार्ग से
काठगोदाम स्टेशन से टैक्सी द्वारा सीधे neem karoli baba kainchi dham पहुंचा जा सकता है।
हवाई मार्ग से
निकटतम हवाई अड्डा पंतनगर (लगभग 70 किमी) है।
रहने और खाने की सुविधाएं
कैंची धाम और आसपास आश्रम, गेस्ट हाउस और होटल उपलब्ध हैं।
भोजन के लिए आश्रम में सादा और सात्विक प्रसाद मिलता है।
यात्रा के लिए सबसे अच्छा समय
मार्च से जून और सितंबर से नवंबर का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है।
मानसून में हरियाली तो रहती है, लेकिन सड़कें फिसलन भरी हो सकती हैं।
कैंची धाम से जुड़े रोचक तथ्य
- एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स यहां आ चुके हैं
- फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग भी बाबा से प्रभावित थे
- यह स्थान ध्यान के लिए विश्व प्रसिद्ध है
अधिक जानकारी के लिए आप उत्तराखंड पर्यटन की आधिकारिक वेबसाइट देख सकते हैं।
FAQs
1. नीम करौली बाबा कौन थे?
वे एक महान संत और हनुमान जी के अनन्य भक्त थे।
2. कैंची धाम कहां स्थित है?
यह नैनीताल जिले, उत्तराखंड में स्थित है।
3. दिल्ली से कैंची धाम कितनी दूरी है?
लगभग 320 किलोमीटर।
4. कैंची धाम का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन कौन सा है?
काठगोदाम।
5. क्या कैंची धाम में ठहरने की सुविधा है?
हां, आश्रम और होटल उपलब्ध हैं।
6. कैंची धाम जाने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
मार्च से जून और सितंबर से नवंबर।
निष्कर्ष
neem karoli baba kainchi dham केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम और शांति का केंद्र है। यहां आकर व्यक्ति न केवल आध्यात्मिक रूप से जुड़ता है, बल्कि जीवन को एक नई दृष्टि से देखने लगता है। अगर आप मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा की तलाश में हैं, तो कैंची धाम की यात्रा जरूर करें।
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Javed Akhtar Birthday: शब्दों का जादूगर, विचारों का योद्धा और भारतीय सिनेमा की जीवित विरासत
Javed Akhtar Birthday: जावेद अख़्तर केवल एक नाम नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा, साहित्य और विचारधारा का एक ऐसा अध्याय हैं, जिसने दशकों तक समाज को शब्द, सोच और साहस दिया। 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में जन्मे जावेद अख्तर आज हिंदी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली पटकथा लेखक, गीतकार, कवि और निर्भीक विचारक के रूप में जाने जाते हैं।
मुख्य बिंदु
Javed Akhtar on Does God Exist
आज जावेद अख़्तर का 81 वां जन्म दिन है। वर्तमान समय में शायद ही ऐसा कोई होगा जो जावेद अख्तर को न जनता होगा। अगर आप उन्हें नहीं भी जानते हो फिर भी उनके गाने या शायरी कभी न कभी सोशल मीडिया की फीड से आपकी जुबान तक जरूर पहुंचे होंगे। हाल ही में लल्लनटॉप के मंच पर”क्या ईश्वर है” चर्चा के बाद तो जावेद अख्तर का नाम डिजिटल युग के छोटे-बड़े हर इंसान की जुबान पर था। जावेद अख्तर और मुफ़्ती शामाइल के बीच चली इस बहस ने उनके तर्कों पर हर किसी को सोचने के लिए मजबूर कर दिया।
साहित्यिक विरासत से सिनेमा तक का सफर
जावेद अख्तर को शब्द विरासत में मिले। उनके पिता जान निसार अख्तर उर्दू के प्रतिष्ठित कवि और गीतकार थे, जबकि उनके दादा और परदादा भी साहित्य और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे। बचपन लखनऊ में बीता, जहाँ तहज़ीब और शायरी ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा। भोपाल के सैफिया कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे सपनों की नगरी मुंबई पहुँचे—जेब खाली थी, लेकिन हौसले बेहिसाब।
सलीम-जावेद: जिसने हिंदी सिनेमा की दिशा बदल दी
1970 के दशक में जावेद अख्तर की किस्मत तब बदली जब उनकी जोड़ी सलीम खान के साथ बनी। सलीम-जावेद नाम की इस ऐतिहासिक जोड़ी ने हिंदी फिल्मों को नया नायक दिया—“Angry young men”।
ज़ंजीर, दीवार, शोले, डॉन, त्रिशूल और शक्ति जैसी फिल्मों ने न केवल बॉक्स ऑफिस के रिकॉर्ड तोड़े, बल्कि समाज के गुस्से, संघर्ष और आत्मसम्मान को परदे पर उतार दिया। सलीम-जावेद भारतीय सिनेमा के पहले ऐसे पटकथा लेखक बने जिन्हें स्टारडम मिला।
गीतों में संवेदना, शब्दों में क्रांति (Songs, shayari of javed akhtar)
1980 के दशक में जोड़ी के टूटने के बाद जावेद अख्तर ने गीत लेखन को अपना मुख्य माध्यम बनाया। उनके गीत मनोरंजन से कहीं आगे जाकर संवेदना, सामाजिक चेतना और मानवीय भावनाओं की आवाज़ बने।
“एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा”,
“संदेशे आते हैं”,
“कल हो ना हो”,
“मितवा”,
“तेरे लिए”
जैसे गीत आज भी पीढ़ियों के दिलों में बसे हैं।
बेबाक विचारक और सामाजिक हस्तक्षेप
जावेद अख्तर सिर्फ कलाकार नहीं, बल्कि एक निर्भीक सार्वजनिक बुद्धिजीवी हैं। वे खुलकर धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, तर्कवाद और लैंगिक समानता की वकालत करते रहे हैं। स्वयं को “सभी धर्मों के प्रति समान अवसर वाला नास्तिक” बताने वाले अख्तर ने सामाजिक पाखंड पर हमेशा सवाल उठाए।
2010 से 2016 तक वे राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे और संसद में कला व संस्कृति की सशक्त आवाज बने।
पुरस्कार और सम्मान
जावेद अख्तर को मिले सम्मान उनकी बहुआयामी प्रतिभा का प्रमाण हैं:
- पद्म श्री (1999)
- पद्म भूषण (2007)
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (2013)
- रिचर्ड डॉकिन्स अवॉर्ड (2020) – पाने वाले पहले भारतीय
- 5 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
- 16 फिल्मफेयर पुरस्कार
निजी जीवन: कला का पारिवारिक वृक्ष
जावेद अख्तर की पहली शादी हनी ईरानी से हुई, जिनसे उनके दो बच्चे—फरहान अख्तर और जोया अख्तर—हुए, जो आज खुद सिनेमा के बड़े नाम हैं। बाद में उन्होंने अभिनेत्री शबाना आज़मी से विवाह किया। यह परिवार भारतीय सिनेमा का एक रचनात्मक स्तंभ माना जाता है।
आज भी प्रासंगिक
2024 में आई अमेज़न प्राइम की डॉक्यूमेंट्री ‘Angry Young Men’ ने एक बार फिर सलीम-जावेद की विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ा। वहीं 2025 में “क्या ईश्वर का अस्तित्व है?” विषय पर हुई बहस में जावेद अख्तर की तार्किक दृष्टि ने वैश्विक ध्यान खींचा।
जावेद अख्तर के जन्मदिन पर पढ़िए उनके लिखे चुनिंदा शेर
जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता
मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता
गलत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना
बहुत हैं फ़ाएदे इस में मगर अच्छा नहीं लगता

नेकी इक दिन काम आती है हम को क्या समझाते हो
हम ने बे-बस मरते देखे कैसे प्यारे प्यारे लोग

हमको तो बस तलाश नए रास्तों की है,
हम हैं मुसाफिर ऐसे जो मंजिल से आए हैं

इस शहर में जीने के अंदाज निराले हैं
होठों पे लतीफ़े हैं आवाज में छाले हैं

मैं पा सका न कभी इस खलिश से छुटकारा
वह मुझसे जीत भी सकता था जाने क्यों हारा

अगर लहरों को है दरिया में रहना
तो उनको होगा चुपचाप अब बहना

तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूं फिर भी शायद
निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो

तब हम दोनों वक्त चुरा कर लाते थे
अब मिलते हैं जब भी फुर्सत होती है

जावेद अख्तर कौन हैं?
जावेद अख्तर भारत के प्रसिद्ध कवि, गीतकार और पटकथा लेखक हैं। वे हिंदी सिनेमा और आधुनिक उर्दू शायरी में अपने गहरे विचारों और प्रभावशाली लेखन के लिए जाने जाते
जावेद अख्तर क्यों प्रसिद्ध हैं?
जावेद अख्तर अपनी अर्थपूर्ण गीत रचनाओं, प्रगतिशील सोच और सामाजिक मुद्दों पर बेबाक विचारों के कारण प्रसिद्ध हैं।
Famous Books of Javed Akhtar
जावेद अख्तर की प्रमुख पुस्तकें हैं:
तरकश
लावा
टॉकिंग सॉन्ग्स
Javed Akhtar birthday date
17 january 1945, ग्वालियर
जावेद अख्तर को कौन-कौन से पुरस्कार मिले हैं?
जावेद अख्तर को:पद्म श्रीपद्म भूषणराष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारकई फिल्मफेयर पुरस्कारमिल चुके हैं।
Does God exist (क्या ईश्वर है) ?
हाल ही में जावेद अख्तर और मुफ़्ती शमाइल के बीच हुई बहस से जावेद काफी चर्चाओं में आए।
mufti shamail कौन है?
मुफ़्ती शमाइल नदवी एक भारतीय इस्लामी विद्वान हैं, जो जावेद अख़्तर के साथ “क्या ईश्वर है?” विषय पर हुई बहस के लिए चर्चा में आए।
क्या जावेद अख्तर नास्तिक हैं
हां जावेद अख्तर नास्तिक हैं
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