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सुहागरात के दिन दुल्हन के पेट में हुआ दर्द, डॉक्टर की बात सुनकर दूल्हे के साथ घरवालों के उड़े होश।

मैनपुरी – उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में मंगलवार को दुल्हन विदाई के बाद ससुराल पहुंची। घर पर खुशी का माहौल था। बधाई गीत गाए जा रहे थे। लोग प्रसन्न थे। गांव के लोग भी नवदंपती को बधाई देने के लिए घर आ रहे थे। उसी दिन उनकी सुहागरात थी। इससे पहले शाम को ही दुल्हन के पेट में तेज दर्द होने लगा। घरवाले उसे लेकर अस्पताल पहुंचे। यहां जो घटना घटी उसे देखकर घरवालों के होश उड़ गए। उन्होंने हंगामा शुरू कर दिया।

मामला किशनी थाना के कुसमरा चौकी क्षेत्र के एक गांव का है। यहां मंगलवार को एक घर में नई नवेली बहू विदा होकर आई थी। घर में खुशियों का माहौल था। शाम को बहू के पेट में अचानक तेज दर्द होने लगा। घरवाले उसे लेकर अस्पताल पहुंचे। वहां पता चला कि यह असहनीय दर्द प्रसव पीड़ा का है। इसके बाद परिजन उसे लेकर जिला महिला अस्पताल पहुंचे। यहां बहू ने स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। बच्चे के जन्म के बाद पति और ससुरालीजन ने हंगामा शुरू कर दिया। दूल्हे ने कहा कि यह बच्चा उसका नहीं है। घरवालों ने बहू को साथ रखने से मना कर दिया। इसके बाद अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई। हंगामा देख और भी तमाशबीन लोग जुट गए। सुबह तक खबर लोगों में फैल गई।
Uttarakhand
गणतंत्र दिवस परेड़ में कर्तव्य पथ पर नहीं दिखेगी उत्तराखंड की झांकी, रोस्टर के चलते हुआ फैसला

Republic Day Parade: गणतंत्र दिवस पर कर्तव्य पथ पर नहीं मिली उत्तराखंड की झांकी को जगह,
मुख्य बिंदु
Republic Day Parade: उत्तराखंड की गणतंत्र दिवस झांकी ने बीते वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है। वर्ष 2023 में मानसखंड झांकी ने देशभर के राज्यों को पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान प्राप्त किया था, जबकि 2021 में केदारखंड झांकी और 2025 में सांस्कृतिक विरासत एवं साहसिक खेल आधारित झांकी को तीसरा स्थान प्राप्त हुआ। ऐसे में इस वर्ष भी राज्य को उम्मीद थी कि 26 जनवरी को कर्तव्य पथ पर देवभूमि की लोक कला और संस्कृति की झलक देखने को मिलेगी। लेकिन, इस बार परिस्थितियां कुछ अलग रहीं और राज्यवासियों को थोड़ी निराशा का सामना करना पड़ा।
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इस वर्ष गणतंत्र दिवस परेड में शामिल नहीं होगी उत्तराखंड की झांकी
दरअसल, रक्षा मंत्रालय की ओर से इस वर्ष गणतंत्र दिवस झांकियों के चयन में रोस्टर सिस्टम लागू किया गया है। इसका उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को समान मौका मिल सके। पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों को झांकी प्रदर्शित करने का मौका नहीं मिल पाया था, जिसे देखते हुए ये व्यवस्था लागू की गई। इसी कड़ी में इस बार उत्तराखंड को कर्तव्य पथ पर स्थान नहीं मिल सका, जबकि राज्य की ओर से झांकी को लेकर पूरी तैयारी कर ली गई थी।
भारत पर्व में मिलेगा उत्तराखंड को मंच
लेकिन, कर्तव्य पथ पर जगह न मिलने के बावजूद उत्तराखंड की झांकी पूरी तरह से दर्शकों से दूर नहीं रहेगी। इसके बदले राज्य को लाल किले पर आयोजित होने वाले भारत पर्व में अपनी झांकी प्रदर्शित करने का अवसर मिला है। इस झांकी का विषय “आत्मनिर्भर उत्तराखंड” रखा गया है, जिसमें कुमाऊं क्षेत्र के अल्मोड़ा जिले में मौजूद पारंपरिक तांबा उद्योग को दर्शाया गया है। इस माध्यम से उत्तराखंड की लोक कला, हस्तशिल्प और आत्मनिर्भरता की सोच को देश-दुनिया के सामने प्रस्तुत किया जाएगा।
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26 से 31 जनवरी तक होगा भारत पर्व का आयोजन
राज्य सूचना विभाग के संयुक्त निदेशक केएस चौहान के मुताबिक, इस वर्ष भारत पर्व का आयोजन 26 से 31 जनवरी तक लाल किले में किया जाएगा। सभी चयनित राज्यों की झांकियां 26 जनवरी को लाल किले पर पहुंच जाएंगी, जिसके बाद इन्हें चरणबद्ध तरीके से प्रदर्शित किया जाएगा। गौरतलब है कि भारत पर्व में बड़ी संख्या में देश-विदेश के पर्यटक और दर्शक शामिल होते हैं, जिससे उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को व्यापक मंच मिलने की संभावना है।
झांकियों का गौरवशाली इतिहास और उपलब्धियां
अब तक उत्तराखंड गणतंत्र दिवस पर 15 बार और भारत पर्व में एक बार अपनी झांकी प्रस्तुत कर चुका है। फूलदेई, नंदा राजजात, फूलों की घाटी, केदारनाथ, रम्माण, मानसखंड और विकसित उत्तराखंड जैसी झांकियां राज्य की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक रही हैं। वर्ष 2023 में पहला और 2021 व 2025 में तीसरा स्थान हासिल कर उत्तराखंड ने राष्ट्रीय मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। ऐसे में भले ही इस बार कर्तव्य पथ पर झांकी न दिखे, लेकिन भारत पर्व के जरिए देवभूमि की सांस्कृतिक चमक एक बार फिर लाल किले से देशभर में बिखरेगी
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Pauri
उत्तराखंड का ये गांव हो गया वीरान, भालू के हमलों से परेशान होकर मज़बूरी में लिया फैसला

Pauri : भालू की दहशत से पौड़ी में गांव हुआ खाली, मज़बूरी में लेना पड़ा फैसला
मुख्य बिंदु
पौड़ी गढ़वाल (Pauri): उत्तराखंड में पहाड़ से लेकर मैदान तक जंगली जानवरों के हमले ज़े लोग खौफ में हैं। राज्य निर्माण के बाद पिछले वर्ष 2025 में सबसे ज्यादा मानव-वन्य जीव संघर्ष के मामले सामने आए। जिनमें कई लोगों ने अपनी जान गंवाई, इसके चलते पौड़ी जिले के पोखड़ा ब्लॉक के एक गांव में भालू के हमले से दहशत में आए लोगों ने पूरा गांव खाली कर दिया है। बीते दिनों गाँव के आखिरी परिवार ने भी अपना पैतृक घर छोड़ दिया है।
पौड़ी जिले में भालू के हमले से पूरा गांव हुआ खाली
एक तरफ जहाँ सरकार अपनी तारीफ़ करते नहीं थकती है। वहीँ दूसरी ओर पहाड़ से लेकर मैदान तक जंगली जानवरों के हमलों को नियंत्रित करने के लिए पूरा तंत्र फेल होता दिख रहा है। विभाग के पास सैकड़ों की तादात में शिकायत जाने के बाद भी कोई ठोस रणनीति जमीन पर प्रभावी नहीं दिख रही है। इसके चलते अब पौड़ी जिले के पोखड़ा ब्लॉक में की पणिया ग्राम सभा के तोक गांव बस्ताग के एक परिवार ने बीते दिनों अपना पैतृक गाँव छोड़ दिया है। जिसके बाद पूरा गाँव वीरान हो गया है।
बीते दिनों आखिरी परिवार भी विस्थापित
बता दें कि, पूरा गांव पहले ही पलायन कर चुका था। जिसके बाद कई लोगों ने भालू के हमले से परेशान होकर विस्थापन किया था। ऐसे में यही एक आखिरी परिवार था जो गाँव को आबाद कर रहा था। लेकिन अब भालू के बढ़ते हमलों से इस परिवार का हौंसला भी टूट गया है। जिसके बाद वो भी पड़ोस के गांव पाणिया में विस्थापित हो चुके हैं।
जनवरी महीने में महज तीन दिनों के भीतर भालू ने उनके छह मवेशियों को अपना शिकार बना लिया। लगातार जान के खतरे और आजीविका पर मंडराते संकट को देखते हुए उन्हें पूरे परिवार के साथ गांव छोड़ने का कठोर फैसला लेना पड़ा। उनका कहना है कि अब तक न तो प्रशासन की ओर से कोई आर्थिक सहायता मिली है और न ही कोई अधिकारी हालचाल लेने पहुंचा है।
– हरिप्रसाद, पलायन करने वाले ग्रामीण
मज़बूरी में लेना पड़ा गाँव छोड़ने का फैसला
परिवार के सदस्यों का कहना है कि ये निर्णय उन्होंने अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि मजबूरी में लिया है। गांव में रहना अब जान जोखिम में डालने जैसा हो गया है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि भालू दिन के उजाले में भी गांव के आसपास घूमते नजर आ रहे हैं। इस कारण महिलाएं और बच्चे सबसे अधिक दहशत में हैं। इसके अलावा भालू लगातार मवेशियों को निशाना बना रहा है, जिससे परिवार को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है ।
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पहले से ही जीवन यापन चुनौतीपूर्ण है और जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक ने हालात को और अधिक कठिन बना दिया है। ऐसे में सरकार से जल्द ठोस और व्यावहारिक निर्णय लेने की मांग की जा रही है, ताकि लोग सुरक्षित तरीके से अपने गांवों में रह सकें।
–बलवंत सिंह नेगी, जिला पंचायत सदस्य, पोखड़ा
इस पूरे मामले पर वन विभाग का कहना है कि बस्तांग गांव में मवेशियों की मौत से जुड़े प्रकरण में मुआवजा प्रक्रिया प्रगति पर है। संबंधित रेंजर से रिपोर्ट मांगी गई है और प्रभावित परिवार को शीघ्र मुआवजा दिया जाएगा। इसके साथ ही भालू को पकड़ने के लिए उच्च अधिकारियों से पत्राचार किया जा रहा है।
– महातिम यादव, डीएफओ
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श्रद्धालुओं के लिए बड़ी खबर, नंदा राजजात यात्रा 2026 पर बड़ा फैसला, जानिए क्या कहा……..

NANDA DEVI RAJ JAT YATRA 2026: श्रीनंदा राजजात समिति ने लिया बड़ा फैसला
NANDA DEVI RAJ JAT YATRA 2026: उत्तराखंड में इस वर्ष 2026 में होने वाली नंदा राज जात (ठुली जात) यात्रा का हर कोई इन्तजार कर रहा है। बता दें कि हिमालयी महाकुंभ के नाम से प्रचलित ये यात्रा प्रत्येक 12 वर्ष में आयोजित की जाती है। आखिरी बार ये यात्रा साल 2014 में हुई थी। लेकिन इस बार नंदा राज जात यात्रा समिति ने बड़ा फैसला लिया है।
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नंदा राजजात यात्रा 2026 पर समिति का बड़ा फैसला
इस वर्ष वसंत पंचमी के दिन नंदा राजजात यात्रा के कार्यक्रम के लिए दिन तय किया जाना था। इससे पहले नंदा राज जात यात्रा को लेकर रुट मैप भी जारी कर दिया गया है। लेकिन समिति ने अब बड़ा फैसला लेते हुए बताया कि इस वर्ष ये धार्मिक यात्रा नहीं हो पाएगी।
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एशिया की सबसे बड़ी धार्मिक यात्रा- नंदा देवी राजजात यात्रा
नंदा देवी राज जात यात्रा एशिया की सबसे लम्बी धार्मिक यात्रा है। ये यात्रा उत्तराखंड के चमोली जिले के नौटी गांव से शुरू होकर होमकुंड में जाकर आम लोगों के लिए पूरी हो जाती है। जिसके बाद वहां से आगे चौसिंगिया खाडू (चार सींग वाले भेड़) को अकेले हिमालय के लिए रवाना किया जाता है। ये यात्रा 20 दिन में कठिन हिमालयी बुग्यालों से होते हुए 280 किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय करती है।

इस वर्ष नहीं हो पाएगी यात्रा, साल 2027 में संभावित
इस वर्ष यात्रा का इंतजार कर रहे श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखने को मिल रहा था। लेकिन नंदा देवी राजजात यात्रा समिति ने बड़ा फैसला लेते हुए बताया कि हिमालयी क्षेत्रों में पूरा काम न होने से ये यात्रा इस वर्ष नहीं हो पाएगी। श्रीनंदा देवी राजजात समिति के अध्यक्ष डॉ राकेश कुंवर ने मीडिया से बातचीत में बताया कि हिमालयी क्षेत्र में काम पूरे नहीं हो पाए हैं। इसलिए ये राजजात अब 2027 में आयोजित होगी।
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