धर्म-कर्म
Pradosh Vrat 2026: तिथि, पूजा विधि, महत्व और संपूर्ण जानकारी

Pradosh Vrat 2026
हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना को समर्पित होता है और हर महीने कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। मान्यता है कि प्रदोष काल में की गई पूजा अत्यंत फलदायी होती है। इस समय शिव और शक्ति की आराधना करने से जीवन में फैली नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और मानसिक, शारीरिक व आत्मिक शांति प्राप्त होती है।
जो श्रद्धालु नियम, संयम और भक्ति भाव से प्रदोष व्रत रखते हैं, उन पर भगवान शिव की विशेष कृपा बनी रहती है। यही कारण है कि शिव भक्त इस व्रत को बड़ी श्रद्धा से करते हैं और इसे जीवन की बाधाओं को दूर करने वाला व्रत माना जाता है।
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प्रदोष व्रत क्या है?
प्रदोष व्रत हर महीने दो बार आता है। यह व्रत सूर्यास्त के बाद के समय, यानी प्रदोष काल में किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी समय भगवान शिव कैलाश पर्वत पर नृत्य करते हैं और भक्तों की प्रार्थनाएं स्वीकार करते हैं।
Pradosh Vrat 2026 उन श्रद्धालुओं के लिए विशेष रहेगा जो स्वास्थ्य, धन, पारिवारिक सुख, वैवाहिक जीवन में मधुरता और मानसिक शांति की कामना करते हैं।
Pradosh Vrat 2026 कब है?
वैदिक पंचांग के अनुसार, माघ महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि:
- त्रयोदशी तिथि आरंभ: 15 जनवरी 2026, रात 8 बजकर 16 मिनट
- त्रयोदशी तिथि समाप्त: 16 जनवरी 2026, रात 10 बजकर 21 मिनट
पंचांग के आधार पर माघ महीने का पहला प्रदोष व्रत शुक्रवार, 16 जनवरी 2026 को रखा जाएगा। शुक्रवार होने के कारण यह व्रत और भी शुभ माना जाता है क्योंकि इस दिन माता पार्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इससे पारिवारिक सुख और दांपत्य जीवन में प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है।
प्रदोष व्रत 2026 में दिन का महत्व
हर प्रदोष व्रत का महत्व उसके वार के अनुसार बदलता है। जैसे:
- सोम प्रदोष: मानसिक शांति और स्वास्थ्य के लिए
- मंगल प्रदोष: साहस और कार्यों में सफलता के लिए
- शुक्र प्रदोष: वैवाहिक सुख और पारिवारिक आनंद के लिए
- शनि प्रदोष: कर्म दोष और बाधाओं से मुक्ति के लिए
जनवरी 2026 का प्रदोष व्रत शुक्रवार को होने से यह विशेष रूप से गृहस्थ जीवन के लिए शुभ माना जा रहा है।
प्रदोष व्रत की पूजा विधि (Step-by-Step)
Pradosh Vrat 2026 में पूजा विधि को सही तरीके से करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। नीचे पूरी प्रक्रिया दी गई है:
1. प्रातःकाल की तैयारी
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें
- स्वच्छ और सात्त्विक वस्त्र धारण करें
- व्रत का संकल्प लें
2. दिनभर संयम
- पूरे दिन सात्त्विक विचार रखें
- व्रत के दौरान क्रोध, नकारात्मक सोच और असत्य से दूर रहें
3. संध्या समय पूजा
- प्रदोष काल में पूजा की तैयारी करें
- घर के पूजा स्थान में शिवलिंग स्थापित करें या नजदीकी शिव मंदिर जाएं
- शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र और आक के फूल अर्पित करें
4. मंत्र जाप और कथा
- “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करें
- प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें या सुनें
5. आरती और समापन
- भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की आरती करें
- परिवार की सुख-शांति और कल्याण की कामना करें
प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक दृष्टि से प्रदोष व्रत को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस व्रत को रखने से:
- पाप कर्मों का नाश होता है
- ग्रह दोषों का प्रभाव कम होता है
- शिव कृपा से जीवन में स्थिरता आती है
यह व्रत व्यक्ति को आत्मसंयम और अनुशासन की ओर प्रेरित करता है।
प्रदोष व्रत का आध्यात्मिक महत्व
आध्यात्मिक रूप से प्रदोष व्रत आत्मशुद्धि का माध्यम है। उपवास और संध्या पूजा के माध्यम से मन भौतिक इच्छाओं से हटकर ईश्वर भक्ति में लीन होता है। इससे:
- मानसिक तनाव कम होता है
- सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है
- आत्मिक शांति की अनुभूति होती है
Pradosh Vrat 2026 से मिलने वाले लाभ
प्रदोष व्रत रखने से श्रद्धालुओं को कई लाभ प्राप्त होते हैं:
- जीवन की बाधाओं से मुक्ति
- कार्यों में सफलता
- स्वास्थ्य में सुधार
- आर्थिक स्थिरता
- पारिवारिक और वैवाहिक सुख
इसी कारण इसे शिव भक्तों के लिए अत्यंत प्रभावशाली व्रत माना गया है।
प्रदोष व्रत में क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- प्रदोष काल में ही पूजा करें
- शुद्ध और सात्त्विक भोजन ग्रहण करें
- शिव मंत्रों का जाप करें
क्या न करें
- व्रत के दिन तामसिक भोजन से बचें
- झूठ और नकारात्मक व्यवहार न करें
- पूजा में जल्दबाजी न करें
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14 या 15 जनवरी कब है मकर संक्राति ?, यहां जानें makar sankranti 2026 की सही डेट और मुहूर्त
निष्कर्ष
Pradosh Vrat भगवान शिव की आराधना का एक पवित्र और शक्तिशाली अवसर है। यह व्रत न केवल धार्मिक बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी जीवन को संतुलित करता है। श्रद्धा और नियम से किया गया प्रदोष व्रत भक्तों को शांति, समृद्धि और शिव कृपा प्रदान करता है।
Disclaimer
यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पंचांग और सामान्य जानकारियों पर आधारित है। तिथि, मुहूर्त और पूजा विधि में क्षेत्रीय पंचांग के अनुसार अंतर हो सकता है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले स्थानीय पंडित या आधिकारिक पंचांग की पुष्टि अवश्य करें।
❓ Pradosh Vrat 2026 कब है?
जनवरी 2026 में माघ महीने का पहला प्रदोष व्रत शुक्रवार, 16 जनवरी 2026 को रखा जाएगा। यह व्रत विशेष रूप से पारिवारिक सुख और वैवाहिक जीवन के लिए शुभ माना जाता है।
❓ क्या Pradosh Vrat 2026 सभी लोग रख सकते हैं?
हां, Pradosh Vrat 2026 स्त्री, पुरुष, युवा और वृद्ध सभी रख सकते हैं। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जो मानसिक शांति, स्वास्थ्य और जीवन में स्थिरता की कामना करते हैं।
❓ प्रदोष व्रत का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
मान्यता है कि प्रदोष व्रत रखने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और भक्त को भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
❓ प्रदोष व्रत का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
मान्यता है कि प्रदोष व्रत रखने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और भक्त को भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
आस्था
14 या 15 जनवरी कब है मकर संक्राति ?, यहां जानें makar sankranti 2026 की सही डेट और मुहूर्त

makar sankranti 2026 date : मकर संक्रांति का त्यौहार नजदीक है लेकिन कई लोगों को इसकी डेट को लेकर क्नफ्यूजन है कि त्यौहार 14 जनवरी को मनाया जा रहा है या फिर 15 जनवरी को मनाया जाएगा। अगर आपको भी है ये कन्फूजन तो हम बताते हैं आपको सही डेट और शुभ मुहूर्त।
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14 या 15 जनवरी कब है मकर संक्राति ?
अलग-अलग पंचांगों में सूर्य के गोचर का समय अलग-अलग दिए जाने के कारण मकर संक्रांति कब है? इसे लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। इसी कारण मकर संक्रांति की तारीख (makar sankranti 2026 date) को लेकर भी कन्फ्यूजन बना हुआ है। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक जब सूर्य देव जब मकर राशि में गोचर करते हैंउस समय सूर्य की मकर संक्रांति मनाई जाती है। ऐसे में 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई जाएगी।

15 जनवरी है makar sankranti 2026 की सही डेट
काशी विश्वनाथ के हृषिकेश पंचांग के मुताबिक सूर्यदेव 14 जनवरी 2026 को रात में 9 बजकर 41 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इस बार रात्रि के समय में ही संक्रांति हो रही है। इसी कारण makar sankranti का पुण्य काल 15 जनवरी को सूर्योदय के बाद से होगा।
निर्णय सिंधु के मुताबिक इस साल मकर संक्रांति का पुण्य काल 15 जनवरी को प्राप्त हो रहा है। क्योंकि सूर्य का प्रवेश मकर राशि में रात के समय हो रहा है। ऐसे में मकर संक्रांति 15 जनवरी गुरुवार को मनाना शास्त्र सम्मत है।

makar sankranti का शुभ मुहूर्त
बात करें मकर संक्रांति पर शुभ मुहूर्त की तो 15 जनवरी को मकर संक्रांति वाले दिन पुण्य काल 2 बजकर 53 मिनट तक है। ऐसे में आप सुबह से लेकर दोपहर दो बजकर 53 मिनट तक स्नान और दान कर सकते हैं। बता दें कि makar sankranti वाले दिन दान का पुण्य मिलता है।
क्यों मनाया जाता है मकर संक्रांति का त्यौहार ?
मकर संक्रांति अलग-अलग नामों से लेकिन पूरे देश में धूमधाम से मनाई जाती है। कहीं इस दिन खिचड़ी बनती है तो कहीं पतंगबाजी देखने को मिलती है। ये एकमात्र ऐसा त्यौहार है जो पूरे देश में एकसाथ मनाया जाता है चाहे इसे मनाने के तरीके और नाम अलग हों।

आमतौर पर ये त्यौहा जनवरी महीने की 14 तारीख को मनाया जाता है। लेकिन कभी-कभी ये त्योहार 12, 13 या 15 तारीख को भी मनाया जाता है। जिसके पीछे का कारण ये है कि जिस दिन सूर्य पूरी तरह से मकर राशि में प्रवेश करते हैं इसे उसी दिन मनाया जाता है। जो कि 12, 13, 14 या 15 तारीख को ही होता है।
हिन्दू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक भगवान विष्णु ने इसी दिन असुरों का अंत कर उनके सिरों को मंदार पर्वत में दबाकर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। इसलिए इस दिन को बुराइयों और नकारात्मकता को समाप्त करने का दिन भी माना जाता है जो कि बेहद ही शुभ होता है।
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माँ पूर्णागिरि मंदिर : इतिहास, महत्व, यात्रा मार्ग और दर्शन गाइड – संपूर्ण जानकारी 2026

🌺 Purnagiri Mandir : दर्शन गाइड
पूर्णागिरि मंदिर (Purnagiri Mandir) उत्तराखंड के टनकपुर क्षेत्र में स्थित देवी शक्ति का अत्यंत प्राचीन और सिद्ध शक्तिपीठ है। इसे माँ पूर्णागिरि, पूर्णा शक्ति, माँ पूर्णा देवी के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर शारदा नदी के तट पर स्थित पहाड़ी के शीर्ष पर बना है और अपनी अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा, सिद्धि, पूर्णता और शक्तिपूजन के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहाँ आने वाले भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं, इसलिए इसे “पूर्ण करने वाली शक्ति” भी कहा जाता है।
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🕉️ पूर्णागिरि मंदिर कहाँ स्थित है? (purnagiri mandir Location)
पूर्णागिरि मंदिर उत्तराखंड राज्य के चंपावत ज़िले के टनकपुर के पास स्थित है।
- समुद्र तल से ऊँचाई लगभग – 3000 मीटर (लगभग)
- शारदा नदी और काली नदी के संगम के निकट
- भारत–नेपाल सीमा के पास
- टनकपुर से दूरी – लगभग 20–22 किलोमीटर

🛕 पूर्णागिरि मंदिर का इतिहास (History of Purnagiri Mandir)
पूर्णागिरि मंदिर का इतिहास सती के 51 शक्तिपीठों से जुड़ा है।
पुराणों में कथा
- भगवान शिव और माता सती का विवाह हुआ
- दक्ष प्रजापति ने यज्ञ किया, लेकिन शिव को आमंत्रित नहीं किया
- अपमान से आहत सती ने यज्ञ कुंड में देह त्याग दी
- शोकाकुल शिव सती के शरीर को लेकर तांडव करने लगे
- ब्रह्मांड की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए
👉 जहाँ-जहाँ टुकड़े गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने
👉 पूर्णागिरि में माता सती का नाभि भाग गिरा
इसलिए इसे परिपूर्ण शक्ति का स्थान माना जाता है।
🙏 धार्मिक महत्व (Spiritual Importance)
- यह 108 सिद्ध शक्तिपीठों में से एक
- मनोकामना पूर्ण करने वाला धाम
- नवदुर्गा का विशेष पूजा स्थल
- कुमाऊँ और तराई क्षेत्र का सबसे बड़ा शक्ति स्थल
- यहाँ नवरात्रि के दौरान लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं
भक्त यहाँ आकर:
- ध्वज चढ़ाते हैं
- मनौती मांगते हैं
- प्रसाद चढ़ाते हैं
- गर्भगृह में दर्शन करते हैं

🧭 पूर्णागिरि मंदिर कैसे पहुँचें? (How to Reach Purnagiri Mandir)
🚆 रेल मार्ग से
सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन – टनकपुर रेलवे स्टेशन
- यहाँ से मंदिर दूरी – लगभग 20–22 किमी
- टैक्सी/जीप आसानी से उपलब्ध
✈️ हवाई मार्ग से
नजदीकी हवाई अड्डा – पंतनगर एयरपोर्ट
- दूरी – लगभग 120 किमी
- पंतनगर से टनकपुर होते हुए मंदिर पहुँचा जाता है
🚌 सड़क मार्ग से
सीधे बसें उपलब्ध:
- हल्द्वानी
- बनबसा
- नैनीताल
- पिथौरागढ़
- खटीमा
- किच्छा
टनकपुर से:
- टैक्सी
- जीप
- साझा मैक्सी कैब
🚶 पैदल चढ़ाई
- टनकपुर से पर्वत तक सड़क
- इसके बाद लगभग 3–5 किमी पैदल ट्रेक
- मार्ग पर रेलिंग, सीढ़ियाँ, दुकानें, चाय-पकौड़े, प्रसाद की दुकानें
🧗 यात्रा रूट संक्षेप में
टनकपुर → ठूलीगाड़ → बाणबसा → शारदा नदी → पूर्णागिरि मंदिर

🕓 दर्शन और खुलने का समय
- सुबह: 5:00 बजे – 12:00 बजे
- शाम: 4:00 बजे – 9:00 बजे
- नवरात्रि में समय बढ़ा दिया जाता है
🌸 पूर्णागिरि मेला (Navratri Mela)
नवरात्रि के समय:
- भव्य मेला लगता है
- लाखों श्रद्धालु आते हैं
- नेपाल से भी भक्त आते हैं
- 2–3 सप्ताह का विशाल पर्व
मेले में:
- झूले
- प्रसाद
- धार्मिक भजन
- धर्म-प्रवचन

🌄 पूर्णागिरि ट्रेकिंग अनुभव
- प्राकृतिक पहाड़
- हरे जंगल
- नदी का नज़ारा
- ठंडी हवा का स्पर्श
- अद्भुत आध्यात्मिक शांति
⚠️ सुरक्षा व यात्रा टिप्स
- सीढ़ियों पर ध्यान से चलें
- बरसात के समय विशेष सावधानी
- नदी के किनारे सेल्फी से बचें
- बुजुर्गों के लिए डांडी-कांडी उपलब्ध
- ऊँचाई पर ठंड बढ़ जाती है – गर्म कपड़े रखें
- पानी और हल्का भोजन साथ रखें
🛍️ आसपास घूमने की जगहें
- टनकपुर शारदा घाट
- बनबसा बैराज
- चंपावत
- पूरनपुर
- पूर्णा नदी तट
💡 पूर्णागिरि मंदिर से जुड़ी रोचक तथ्य
- यह सिद्ध शक्तिपीठ है
- नेपाल सीमा के निकट स्थित
- सती का नाभि भाग यहाँ गिरा माना जाता है
- शारदा नदी के किनारे स्थित
- यहाँ साधना करने वाले अनेक संतों ने सिद्धियाँ प्राप्त की
🌞 आने का सबसे अच्छा समय
- फरवरी से जून
- अक्टूबर से दिसंबर
- नवरात्रि में विशेष भीड़
बरसात में यात्रा कठिन हो सकती है।
🛌 ठहरने की सुविधा
- टनकपुर में होटल
- धर्मशाला
- गेस्ट हाउस
- सरल बजट विकल्प
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🙋 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
❓ पूर्णागिरि मंदिर कहाँ है?
उत्तराखंड के चंपावत जिले के टनकपुर के पास पहाड़ी पर।
❓ यह किस लिए प्रसिद्ध है?
सिद्ध शक्तिपीठ और मनोकामना पूर्ण करने के लिए।
❓ किसका अंग यहाँ गिरा था?
माता सती का नाभि भाग।
❓ कौन सा महीना सबसे अच्छा है?
नवरात्रि और मार्च–अप्रैल।
❓ क्या बच्चे और बुजुर्ग जा सकते हैं?
हाँ, डांडी-कांडी सुविधा उपलब्ध है।
✨ समापन
Purnagiri Mandir केवल धार्मिक स्थान नहीं, बल्कि आस्था, ऊर्जा और प्रकृति का अद्भुत संगम है।
यहाँ आने वाला प्रत्येक भक्त माँ पूर्णागिरि की शक्तिमय उपस्थिति का अनुभव करता है और अपने भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार महसूस करता है।
यदि आप आध्यात्मिक शांति, प्राकृतिक सौंदर्य और शक्तिपूजा का अद्भुत अनुभव लेना चाहते हैं, तो जीवन में एक बार पूर्णागिरि धाम की यात्रा अवश्य करें।
आस्था
कब है Sakat Chauth Vrat 2026 , जानें क्या करें , क्या न करें और पूजा विधि…

Sakat Chauth Vrat 2026: संतान सुख, विघ्न नाश और रिद्धि-सिद्धि का पावन पर्व
हिंदू धर्म में सकट चौथ व्रत को अत्यंत पुण्यदायी और फलदायी माना जाता है। यह व्रत भगवान श्री गणेश और सकट माता की उपासना का विशेष दिन है, जिसे संतान की लंबी आयु, परिवार की सुख-समृद्धि और जीवन की बाधाओं के नाश से जोड़ा जाता है। वर्ष 2026 में सकट चौथ व्रत 06 जनवरी, मंगलवार को माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मनाया जाएगा। यह पर्व विशेष रूप से माताओं और महिलाओं के बीच गहरी आस्था रखता है, हालांकि पुरुष भी यह व्रत रख सकते हैं।
सनातन परंपरा में माना जाता है कि सकट चौथ के दिन विधि-विधान से पूजा और नियमों का पालन करने पर भगवान गणेश अपने भक्तों के सभी विघ्न हर लेते हैं और जीवन में शुभता का विस्तार होता है।
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Sakat Chauth Vrat का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
सकट चौथ व्रत को कई क्षेत्रों में संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है। “सकट” शब्द का अर्थ संकट से है, यानी यह व्रत संकटों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है। लोक मान्यताओं के अनुसार, सकट माता ने अपने आशीर्वाद से संतान की रक्षा की थी, इसलिए माताएं इस दिन उपवास रखकर अपनी संतान की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं।
यह व्रत मातृत्व, त्याग और श्रद्धा का प्रतीक है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में इस पर्व की परंपराएं थोड़ी-बहुत भिन्न हो सकती हैं, लेकिन मूल भाव एक ही है—भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करना।
सकट चौथ व्रत 2026: तिथि, वार और समय
- तिथि: 06 जनवरी 2026
- वार: मंगलवार
- मास: माघ
- पक्ष: कृष्ण पक्ष
- व्रत पारण: चंद्र दर्शन के बाद
सकट चौथ व्रत में चंद्र दर्शन का विशेष महत्व है। मान्यता है कि चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना व्रत का पारण नहीं करना चाहिए। यही कारण है कि भक्त पूरे दिन उपवास रखकर रात में चंद्रमा निकलने की प्रतीक्षा करते हैं।
सकट चौथ व्रत की पूजा विधि (Step-by-Step)
सफल और पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए Sakat Chauth Vrat की पूजा विधि का पालन करना आवश्यक माना गया है।
- ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- घर के ईशान कोण को साफ कर वहां पूजा स्थान तैयार करें।
- भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र को लाल वस्त्र पर स्थापित करें।
- दीप जलाकर गणपति का ध्यान करें और संकल्प लें।
- दूर्वा, तिल के लड्डू, मोदक, गन्ना और लाल फूल अर्पित करें।
- गणेश मंत्र, स्तोत्र और आरती का पाठ करें।
- शाम को चंद्रमा के दर्शन कर अर्घ्य दें और फिर व्रत का पारण करें।
सकट चौथ व्रत में क्या करें
(What to do on Sakat Chauth Vrat)
- सूर्योदय से पहले उठकर स्नान-ध्यान करें।
- पूजा के समय लाल या पीले रंग के वस्त्र पहनें।
- लाल रंग के ऊनी आसन का प्रयोग करें।
- पूजा करते समय मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
- गणपति को उनकी प्रिय वस्तुएं जैसे दूर्वा और तिल से बने भोग अर्पित करें।
- पूरे दिन मन को शांत और संयमित रखें।
सकट चौथ व्रत में क्या न करें
(What to not do on Sakat Chauth Vrat)
- क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से बचें।
- तामसिक भोजन और नशे से दूरी रखें।
- दिन में सोने से बचें।
- पूजा में तुलसी दल अर्पित न करें।
- चूहों या किसी भी जीव को कष्ट न पहुंचाएं।

Sakat Chauth Vrat की पौराणिक कथा
प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक अत्यंत गरीब ब्राह्मणी अपने छोटे से पुत्र के साथ रहती थी। उसका जीवन अत्यंत कष्टों से भरा हुआ था। भोजन और वस्त्र तक का प्रबंध बड़ी कठिनाई से होता था, लेकिन वह स्त्री अत्यंत धार्मिक और संस्कारी थी। वह प्रतिदिन भगवान की पूजा करती और अपने पुत्र के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती।
एक वर्ष माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि आई। उसी दिन नगर की सभी महिलाएं सकट चौथ व्रत रख रही थीं। ब्राह्मणी भी व्रत रखना चाहती थी, लेकिन उसके पास न तो पूजा की सामग्री थी और न ही भोग चढ़ाने के लिए कुछ। फिर भी उसने मन में ठान लिया कि वह श्रद्धा से व्रत रखेगी।
ब्राह्मणी ने पूरे दिन उपवास रखा। शाम को जब चंद्रमा निकलने का समय हुआ, तो उसके घर में दीपक जलाने के लिए तेल तक नहीं था। वह बहुत दुखी हुई, लेकिन उसने मन में भगवान से प्रार्थना की और चंद्रमा को मन ही मन अर्घ्य अर्पित किया।
उसी रात उसके पुत्र को अचानक तेज बुखार आ गया और उसकी स्थिति गंभीर हो गई। ब्राह्मणी भयभीत हो उठी और रोते-रोते भगवान गणेश और सकट माता से अपने पुत्र की रक्षा की गुहार लगाने लगी।
उसकी सच्ची भक्ति और मातृत्व की पुकार सुनकर भगवान गणेश प्रकट हुए। उन्होंने सकट माता के साथ मिलकर बालक को जीवनदान दिया। बालक का बुखार उतर गया और वह स्वस्थ हो गया।
भगवान गणेश ने ब्राह्मणी से कहा,
“हे माता, तुमने बिना किसी दिखावे और स्वार्थ के श्रद्धा से सकट चौथ व्रत रखा है। आज से यह व्रत संतान की रक्षा, दीर्घायु और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाएगा।”
इसके बाद ब्राह्मणी का जीवन बदल गया। उसके घर में कभी अभाव नहीं रहा और उसका पुत्र दीर्घायु व यशस्वी बना।
Sakat Chauth Vrat की दूसरी लोकप्रचलित कथा
एक अन्य कथा के अनुसार, एक राजा की रानी के कई पुत्र थे, लेकिन सभी अल्पायु में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे। दुखी रानी ने एक वृद्धा से अपने कष्ट का कारण पूछा। वृद्धा ने बताया कि रानी ने कभी सकट चौथ व्रत नहीं रखा है।
रानी ने विधि-विधान से सकट चौथ व्रत रखा, चंद्र दर्शन किया और कथा सुनी। इसके बाद उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जो दीर्घायु और पराक्रमी बना। तभी से यह व्रत संतान की रक्षा से जुड़ गया।
किन गलतियों से लगता है दोष या पाप
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार Sakat Chauth Vrat में कुछ गलतियां पुण्य के स्थान पर दोष का कारण बन सकती हैं।
- टूटे हुए अक्षत या बासी फूल चढ़ाना।
- केतकी का फूल या तुलसी दल अर्पित करना।
- सफेद वस्त्र, सफेद आसन या सफेद चंदन का प्रयोग करना।
- पूजा के दौरान श्रद्धा का अभाव या जल्दबाजी दिखाना।
इनसे बचकर ही व्रत का पूर्ण फल प्राप्त किया जा सकता है।
सकट चौथ व्रत का आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश
यह व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। Sakat Chauth Vrat आत्मसंयम, अनुशासन और सकारात्मक सोच का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि आस्था और नियमों के पालन से जीवन की कठिनाइयों को भी सरल बनाया जा सकता है।
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FAQs
प्रश्न 2: सकट चौथ व्रत 2026 कब है?
6 जनवरी 2025 को ।
प्रश्न 2: सकट चौथ व्रत कौन-कौन रख सकता है?
यह व्रत महिलाएं, पुरुष और युवा सभी रख सकते हैं।
प्रश्न 3: क्या बिना चंद्र दर्शन व्रत खोला जा सकता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार चंद्र दर्शन के बिना व्रत का पारण नहीं करना चाहिए।
प्रश्न 4: सकट चौथ व्रत से क्या लाभ होते हैं?
संतान सुख, परिवार में शांति और जीवन की बाधाओं से मुक्ति।
निष्कर्ष
Sakat Chauth Vrat 2026 आस्था, श्रद्धा और संयम का पर्व है। सही विधि, नियम और शुद्ध भाव से किया गया यह व्रत जीवन में सुख-समृद्धि, सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति प्रदान करता है। यदि आप संतान के मंगल और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं, तो यह व्रत आपके लिए विशेष फलदायी सिद्ध हो सकता है।
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