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हिंदू नववर्ष 2026 आज से शुरू, इस साल 12 नहीं होंगे 13 महीने, जानें ये शुभ संकेत या अशुभ

Hindu Nav Varsh 2026 : सनातन परंपरा में हिंदू नववर्ष का विशेष महत्व माना जाता है। प्रत्येक वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ होता है और इसी दिन से नए साल की शुरुआत भी मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी तिथि पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना आरंभ की थी। इस वर्ष भी आज से हिंदू नववर्ष का आगमन हो चुका है।
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आज से शुरू हुआ हिंदू नववर्ष 2026
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिस दिन हिंदू नववर्ष प्रारंभ होता है, उस दिन का स्वामी ग्रह पूरे वर्ष का राजा माना जाता है। इस बार नववर्ष गुरुवार को शुरू हुआ है, जो बृहस्पति देव का दिन होता है, इसलिए इस साल के राजा गुरु बृहस्पति माने जा रहे हैं। वहीं, ग्रहों के सेनापति के रूप में मंगल का प्रभाव रहेगा।
यह नववर्ष विक्रम संवत 2083 के रूप में जाना जाएगा और इसे ‘रौद्र संवत्सर’ कहा जा रहा है। ऐसे में अब जानना दिलचस्प होगा कि यह संवत्सर लोगों के जीवन, देश और दुनिया के लिए कैसा प्रभाव लेकर आएगा।
‘रौद्र संवत्सर’ को लेकर ये हैं भविष्यवाणी
इस वर्ष हिंदू नववर्ष 19 मार्च से शुरू होकर 7 अप्रैल 2027 तक रहेगा। ज्योतिष के अनुसार ‘रौद्र संवत्सर’ को उथल-पुथल और चुनौतियों वाला समय माना जाता है। माना जाता है कि ऐसा संवत्सर लगभग 60 साल पहले 1966 के आसपास भी आया था।

देश की राजनीति में देखने को मिल सकते हैं बदलाव
इस दौरान वैश्विक और देश की राजनीति में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। कुछ बड़े फैसले, नेतृत्व परिवर्तन और महत्वपूर्ण घटनाएं संभव हैं। भारत में नीतिगत स्तर पर अहम निर्णय लिए जा सकते हैं। इसके साथ ही मौसम में अस्थिरता के कारण प्राकृतिक आपदाओं और खेती पर असर पड़ने की आशंका है। जिससे महंगाई और आर्थिक उतार-चढ़ाव भी बढ़ सकते हैं। वहीं पड़ोसी देशों के साथ तनाव बढ़ने की संभावनाएं भी जताई गई है।
इस साल 12 नहीं होंगे 13 महीने, जानें ये शुभ संकेत या अशुभ
इस वर्ष के हिंदू नववर्ष की एक खास बात ये है कि इसमें सामान्य 12 महीनों की जगह 13 महीने होंगे। इसका कारण ज्येष्ठ माह में अधिकमास का जुड़ना है। अधिकमास को पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है, जिसे धार्मिक दृष्टि से बेहद पुण्यदायी माना जाता है।
जब किसी माह में अधिकमास जुड़ता है, तो उसकी तिथियों का क्रम थोड़ा अलग हो जाता है। पहले उस माह का कृष्ण पक्ष आता है, फिर अधिकमास का शुक्ल पक्ष 15 दिनों तक चलता है। इसके बाद अधिकमास का कृष्ण पक्ष होता है, और अंत में मुख्य माह का शुक्ल पक्ष पूरा होता है।

इस बार ज्येष्ठ माह के साथ अधिकमास जुड़ रहा है। इसकी शुरुआत 2 मई से ज्येष्ठ के कृष्ण पक्ष से होगी। इसके बाद 17 मई से अधिकमास का शुक्ल पक्ष आरंभ होगा, जो 31 मई को अधिक पूर्णिमा के साथ समाप्त होगा। फिर अधिकमास का कृष्ण पक्ष चलेगा, जिसकी अमावस्या 15 जून को होगी। इसके बाद 16 जून से ज्येष्ठ माह का शुक्ल पक्ष शुरू होगा और 29 जून को पूर्णिमा के साथ ज्येष्ठ माह का समापन हो जाएगा।
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Navratri day 2 : ऐसे करें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, बदल जाएगी आपकी किस्मत!, ये भोग चढ़ाने से मां हो जाएंगी खुश

chaitra navratri day 2 पर होती है मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, जानें पूजा विधि और भोग की हर जानकारी
chaitra navratri day 2 : नवरात्रि के दूसरे दिन मां मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। नवरात्रि के नौ स्वरूपों में देवी ब्रह्मचारिणी का स्थान दूसरा है, जो तप, साधना और संयम का प्रतीक है।
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नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को है समर्पित
‘ब्रह्मचारिणी’ शब्द दो भागों से मिलकर बना है—‘ब्रह्म’, जिसका अर्थ कठोर तपस्या से है, और ‘चारिणी’, जिसका मतलब आचरण या जीवनशैली से होता है। यानी ये स्वरूप उस शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जो तप और अनुशासन के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
ऐसे करें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा
मांं ब्रह्मचारिणी की पूजा के लिए सबसे पहले मंदिर को साफ कर लें और मां की मूर्ति को स्थापित करें। पूजा के दौरान पीले या सफेद कपड़े पहनें। इसके बाद मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर, पंचामृत और मिश्री जैसी चीजें अर्पित करें। मां का मंत्र और व्रत कथा पढ़ने के बाद आरती करें।

मां ब्रह्मचारिणी की व्रत कथा (Maa Brahmacharini Vrat Katha )
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी पार्वती ने दक्ष प्रजापति के घर ब्रह्मचारिणी रूप में जन्म लिया। उनका यह स्वरूप अत्यंत सरल, तपस्विनी और संत समान माना जाता है। बचपन से ही उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने का संकल्प लिया और इसके लिए कठोर तपस्या करने का निश्चय किया।
देवी ने अपनी साधना को इतना दृढ़ बनाया कि हजारों वर्षों तक तप में लीन रहीं। तपस्या के दौरान उन्होंने मौसम की कठोर परिस्थितियों—भीषण गर्मी, सर्दी और वर्षा—को भी अपने संकल्प के आगे कमजोर नहीं पड़ने दिया। ऐसा कहा जाता है कि प्रारंभ में देवी केवल फल, फूल और बेलपत्र ग्रहण कर जीवित रहीं।

ब्रह्मचारिणी माता को अर्पणा भी है कहा जाता
जब उनका तप और अधिक कठोर हुआ, तो उन्होंने भोजन और जल तक का त्याग कर दिया। यहां तक कि पत्तों का सेवन भी छोड़ दिया, जिसके कारण उनका एक नाम ‘अर्पणा’ भी प्रसिद्ध हुआ। उनकी इस अटूट भक्ति और कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर अंततः भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। मां ब्रह्मचारिणी का यह स्वरूप हमें धैर्य, त्याग और दृढ़ निश्चय की शक्ति का संदेश देता है।
मां ब्रह्मचारिणी को बेहद प्रिय हैं ये भोग
नवरात्रि के इस दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा सफेद वस्त्र धारण करके करना शुभ माना जाता है। साथ ही सफेद रंग से जुड़ी चीजों का भोग अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन खास तौर पर चीनी, उससे बनी मिठाइयां या पंचामृत का भोग लगाना अत्यंत शुभ फल देने वाला माना जाता है। पंचामृत एक पवित्र प्रसाद है, जिसे गाय का दूध, दही, शहद, देसी घी और चीनी से तैयार किया जाता है।

प्रसाद के लिए पंचामृत बनाने की विधि
- 1. सबसे पहले अपने हाथ अच्छी तरह से धो लें और साफ बर्तन का उपयोग करें।
- 2. एक साफ कटोरे में एक कटोरी गाय का दूध डालें।
- 3. अब इसमें आधी कटोरी दही मिलाएं और हल्के से चलाएं।
- 4. इसके बाद 1 टीस्पून शहद और 1 टीस्पून देसी घी डालें।
- 5. सभी सामग्री को अच्छे से मिलाएं, ताकि मिश्रण एकसार हो जाए।
- 6. सबसे आखिर में 1 चम्मच चीनी डालकर अच्छी तरह घोल लें। अब आपका पवित्र पंचामृत तैयार है
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नवरात्रि के पहले दिन होती है मां शैलपुत्री की पूजा, ये भोग लगाने से बरसेगी आप पर कृपा, जानें पूजा विधि और मंत्र

Chaitra Navratri 2026 Day 1 : हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि का पर्व बेहद श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। इस बार नवरात्रि 2026 की शुरुआत 19 मार्च से हो रही है, और पहले दिन मां शैलपुत्री की उपासना का विशेष महत्व होता है।
इसी दिन विधि-विधान से कलश स्थापना भी की जाती है, जिससे नवरात्रि पूजा का शुभारंभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि मां शैलपुत्री की पूजा करने से जीवन में स्थिरता आती है और मानसिक अशांति दूर होती है।
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नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को है समर्पित
नवरात्रि के प्रथम दिन मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा की जाती है। इन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है, इसलिए इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। इनका वाहन वृषभ (बैल) है, इसी कारण इन्हें वृषारूढ़ा भी कहा जाता है। मां के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल शोभायमान रहता है।
कलश स्थापना का शुभ समय
ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार, कलश स्थापना के लिए सुबह 6:50 बजे से 7:52 बजे तक का समय उत्तम है। इसके अतिरिक्त अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:05 बजे से 12:50 बजे तक रहेगा। इन दोनों समयों में से किसी एक में श्रद्धापूर्वक स्थापना करना शुभ फलदायी माना गया है।

नवरात्रि के पहले दिन की व्रत कथा (Navratri Day 1 Vrat Katha)
धार्मिक कथाओं के अनुसार नवरात्रि के पहले दिन की कथा (Navratri Day 1 Vrat Katha) – पूर्व जन्म में मां शैलपुत्री सती के रूप में प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। एक बार दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन भगवान शिव को नहीं बुलाया गया।
भगवान शिव के मना करने के बावजूद माता सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंचीं। वहां उन्हें और उनके पति का अपमान सहना पड़ा। इस अपमान से आहत होकर सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद अगले जन्म में उन्होंने हिमालय के घर जन्म लिया और शैलपुत्री के नाम से जानी गईं। बाद में उनका विवाह पुनः भगवान शिव से हुआ और वे उनकी अर्धांगिनी बनीं।

मां शैलपुत्री की पूजा विधि
- 1. सबसे पहले सुबह स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें।
- 2. पूजा स्थल को शुद्ध कर कलश स्थापना करें।
- 3. मां शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- 4. उन्हें रोली, अक्षत, फूल अर्पित करें।
- 5. धूप-दीप जलाकर विधिपूर्वक पूजा करें और आरती करने के बाद प्रसाद बांटे।
मां शैलपुत्री को क्या भोग लगाएं? (Navratri Day 1 Bhog)
मां शैलपुत्री को घी का भोग (Navratri 2026 Day 1 Bhog) अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि घी अर्पित करने से भक्त को अच्छे स्वास्थ्य और रोगों से मुक्ति का आशीर्वाद मिलता है। बात करें मां शैलपुत्री के मंत्र की तो इस दिन ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः का जाप करने से मन को शांति मिलती है और मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

मां शैलपुत्री की आरती (Mata Shailputri Aarti in Hindi)
शैलपुत्री मां बैल असवार।
करें देवता जय जयकार।।
शिव शंकर की प्रिय भवानी।
तेरी महिमा किसी ने ना जानी।।
पार्वती तू उमा कहलावे।
जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।।
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू।
दया करे धनवान करे तू।।
सोमवार को शिव संग प्यारी।
आरती तेरी जिसने उतारी।।
उसकी सगरी आस पुजा दो।
सगरे दुख तकलीफ मिला दो।।
घी का सुंदर दीप जला के।
गोला गरी का भोग लगा के।।
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं।
प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।।
जय गिरिराज किशोरी अंबे।
शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।।
मनोकामना पूर्ण कर दो।
भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।।
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चैत्र नवरात्रि 2026 पर कैसे करें कलश स्थापना ?, जानें कलश स्थापना का शुभ समय और विधि

Chaitra Navratri 2026 पर ऐसे करें कलश स्थापना, ये समय रहेगा सबसे शुभ
Chaitra Navratri 2026 : हिंदू परंपरा में चैत्र नवरात्रि का विशेष स्थान है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। इस वर्ष नवरात्रि 19 तारीख से आरंभ हो रही है और इसी दिन से हिंदू नववर्ष की भी शुरुआत हो रही है, जिससे इसका महत्व और बढ़ जाता है।
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चैत्र नवरात्रि 2026 पर कैसे करें कलश स्थापना ?
चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ प्रतिपदा तिथि पर होने वाली घटस्थापना, यानी कलश स्थापना से किया जाता है। इसे पूरे पर्व की आधारशिला माना जाता है। विधि-विधान से कलश स्थापित कर देवी दुर्गा का आह्वान किया जाता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

कलश स्थापना का शुभ समय
ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार, कलश स्थापना के लिए सुबह 6:50 बजे से 7:52 बजे तक का समय उत्तम है। इसके अतिरिक्त अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:05 बजे से 12:50 बजे तक रहेगा। इन दोनों समयों में से किसी एक में श्रद्धापूर्वक स्थापना करना शुभ फलदायी माना गया है।
कलश स्थापना की विधि
कलश स्थापना करते समय मन में श्रद्धा और आस्था का होना सबसे महत्वपूर्ण है। पूजा के दौरान नौ लौंग लेकर उन्हें कलावा में बांधकर एक माला तैयार की जा सकती है, जिसे पहले दिन मां दुर्गा को अर्पित किया जाता है। ऐसा करने से देवी की कृपा बनी रहती है।

कलश के लिए सोना, चांदी या अन्य धातु का पात्र इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन शास्त्रों में मिट्टी के कलश को सबसे अधिक पवित्र और शुभ माना गया है। सही विधि और सच्ची भक्ति के साथ की गई स्थापना से नवरात्रि का पूजन पूर्ण फलदायी होता है।
नवरात्रि पूजा की सामग्री की लिस्ट
| पूजा सामग्री | रोली, हल्दी, अक्षत, फूल, माला, धूप, दीपक, कपूर, लाल कपड़ा, चुनरी, बिंदी, चूड़ी, कंगन, कुमकुम, मेहंदी, इत्र |
|---|---|
| अन्य सामग्री | पूजा थाली, घंटी, शंख, गंगाजल, आम/अशोक पत्ते, नारियल, जौ, दुर्गा चालीसा, मिठाई, घी, मूर्ति/फोटो, कलश, फल, लौंग, पान, सुपारी |
FAQs Chaitra Navratri 2026
Q1. चैत्र नवरात्रि में कलश स्थापना कब की जाती है?
कलश स्थापना प्रतिपदा तिथि के दिन की जाती है, जो नवरात्रि का पहला दिन होता है।
Q2. Chaitra Navratri 2026 की कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त क्या है?
सुबह 6:50 बजे से 7:52 बजे तक का समय शुभ माना गया है। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त 12:05 बजे से 12:50 बजे तक भी उत्तम है।
Q3. कलश स्थापना क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है?
यह नवरात्रि पूजा की शुरुआत का मुख्य अनुष्ठान है, जिससे मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है।
Q4. कलश में क्या-क्या रखा जाता है?
कलश में गंगाजल, जौ, सिक्के, सुपारी आदि रखे जाते हैं और ऊपर नारियल व आम/अशोक के पत्ते लगाए जाते हैं।
Q5. कलश किस धातु का होना चाहिए?
सोना, चांदी या तांबे का कलश उपयोग किया जा सकता है, लेकिन मिट्टी का कलश सबसे शुभ माना जाता है।
Q6. क्या कलश स्थापना घर में कोई भी कर सकता है?
हाँ, कोई भी श्रद्धा और सही विधि के साथ घर पर कलश स्थापना कर सकता है।
Q7. कलश स्थापना में लौंग का क्या महत्व है?
नौ लौंग को कलावे में बांधकर माला बनाकर अर्पित करने से मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
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