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नंदा देवी राज जात यात्रा 2026 : ख़त्म हुआ इंतजार, इस दिन से शुरू होगी यात्रा…..

NANDA DEVI RAJ JAT YATRA 2026: वसंत पंचमी के दिन जारी होगा यात्रा कार्यक्रम, 20 जनवरी से नौटी गाँव में आयोजित होगा महोत्सव
NANDA DEVI RAJ JAT YATRA : साल 2026 उत्तराखंड के लिए कई नए यादगार पल लाएगा। इसी साल हिमालयी महाकुम्भ के नामा से विख्यात नंदा राज जात यात्रा का आयोजन भी होना है। नंदा राजजात यात्रा कुंभ की तरह ही प्रति 12 वर्षों में एक बार आयोजित की जाती है। इस बार 2026 में नंदा राज जात यात्रा के लिए 23 जनवरी को यात्रा कार्यक्रम जारी किया जाएगा।
मुख्य बिंदु
क्या है नंदा राज जात यात्रा 2026 ? ( NANDA DEVI RAJ JAT YATRA SCHEDULE 2026 )
नंदा देवी गढ़वाल ही नहीं बल्कि कुमाऊँ क्षेत्र में भी अत्यंत पूजनीय हैं। जहाँ उन्हें श्रद्धापूर्वक राजराजेश्वरी भी कहा जाता है। मान्यताओं के मुताबिक कुमाऊँ मंडल को माँ नंदा का मायका और गढ़वाल मंडल को उनका ससुराल माना जाता है। जिससे दोनों क्षेत्रों की सांस्कृतिक एकता झलकती है। इसी परंपरा के चलते नंदा देवी राजजात यात्रा सदियों से चली आ रही है। हालांकि ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि ये हिमालयी महाकुंभ वर्ष 1843 से नियमित आयोजित किया जा रहा है। ये यात्रा कुमाऊँ और गढ़वाल के लोगों को एक सूत्र में बाँधते हुए धार्मिक और सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक बनती है।
क्यों मनाई जाती हैं नंदा राज जात यात्रा ? ( NANDA DEVI RAJ JAT YATRA 2026 )
नंदा देवी राज जात यात्रा ( HIMALAYI MAHAKUMBH ) से जुड़ी अनेक लोक मान्यताएं प्रचलित हैं। जिनमें एक लोककथा विशेष रूप से स्वीकार की जाती है। जिसके मुताबिक राजा दक्ष के घर जन्मी माँ नंदा देवी को माता पार्वती का अवतार माना जाता है। जिनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। विवाह के बाद वो भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत स्थित अपने ससुराल चली गईं। जब कई वर्षों बाद उन्हें अपने मायके की याद आई और उन्होंने भगवान शिव से वहां जाने की अनुमति मांगी। जिस पर भगवान शिव ने कहा कि बारह दिन बाद वो अपने दूत को उन्हें वापस लाने के लिए भेजेंगे।

इसके बाद, मायके में बारह दिन पूरे होने पर भगवान शिव ने अपने प्रिय चौसिंघिया खाडू को माँ नंदा को वापस लाने के लिए भेजा। विदाई की सभी तैयारियां पूरी की गईं। यात्रा के दौरान माँ नंदा के परिवार जन भी भावुक मन से उनके साथ चले। मार्ग में जिन स्थानों पर माँ नंदा ने विश्राम किया, वहां आज शक्ति पीठ स्थापित माने जाते हैं। इसी विश्वास के चलते प्रत्येक बारह वर्षों में नंदा देवी राज जात यात्रा आयोजित कर माँ नंदा को प्रतीकात्मक रूप से उनके ससुराल भेजा जाता है।
NANDA DEVI RAJ JAT YATRA में बारह सालों का अंतराल क्यों हैं ?
नंदा राज जात यात्रा ( HIMALAYI MAHAKUMBH ) प्रत्येक बारह सालों में एक बार मनाई जाती हैं। इसीलिए ऐसे हिमालयी महाकुम्भ भी कहते हैं। माँ नंदा और भगवान् शिव की ये लोककथा सतयुग की मानी जाती है। और लोकमान्यताओं के मुताबिक सतयुग का एक दिन कलयुग के एक साल के बर्बर हैं। इसलिए सतयुग में माँ नंदा 12 दिनों के लिए अपने मायके आई थी जिसे आज के समय में 12 सालों के बराबर माना जाता है। इसलिए नंदा राज जात यात्रा प्रत्येक 12 सालों के समय अंतराल पर आयोजित की जाती है।

क्या है नंदा राज जात यात्रा में चौसिंगिया खाडू की मान्यता ( CHAUSINGIYA KHADU )
चौसिंगिया खाडू ( CHAUSINGIYA KHADU ) , नंदा राज जात यात्रा के आयोजन के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। चौसिंगिया खाडू क्षेत्रीय भाषा का एक शब्द है। जिसका हिंदी में अर्थ होता है – चार सींग वाला भेड़ जो कि अत्यंत दुर्लभ है। यही चार सींग वाला भेड़ पूरी यात्रा की अगुवाई करता है। लोकमान्यताओं के मुताबिक यात्रा से कुछ महीनों पहले ही ये चौसिंगिया खाडू यात्रा क्षेत्र के किसी गांव में जन्म लेता है। और ये 12 वर्षों में केवल एक बार होता है। माना जाता है कि ये भेड़ स्वयं भगवान् शिव का ही एक रूप है जो माँ नंदा को लेने आते हैं।

एशिया की सबसे लम्बी धार्मिक यात्रा ( Asia’s Longest Religious Pilgrimage )
नंदा देवी राज जात यात्रा एशिया की सबसे लम्बी धार्मिक यात्रा ( Longest Religious Pilgrimage of Asia ) है। इस यात्रा का शुभारंभ चमोली जिले के नॉटी गाँव ( NAUTI VILLAGE ) से किया जाता है। जो अपने अंतिम यात्रा पड़ाव होमकुंड ( HOMKUND )पर आम लोगों के लिए समाप्त होती है। इसके बाद माना जाता हैं कि माँ नंदा कैलाश की ओर प्रस्थान करती है। HOMEKUND से आगे रंग-बिरंगे वस्त्रों से सुशोभित चौसिंगिया खाडू को हिमालय के लिए रवाना किया जाता है।
नंदा देवी राज जात यात्रा का रुट मैप ( ROOT OF NANDA DEVI RAJ JAT YATRA 2026 )
( HIMALAYI MAHAKUMBH ) लगभग तीन सप्ताह तक चलने वाली ये करीब 280 किलोमीटर लंबी यात्रा विभिन्न गांवों, विस्तृत घास के मैदानों, घने जंगलों और ऊँचे पहाड़ी मार्गों से गुजरते हुए अपने अंतिम पड़ाव तक पहुँचती है। इस दौरान श्रद्धालुओं को प्रकृति के अनेक अद्भुत और विविध रूप देखने को मिलते हैं। विशेष रूप से ये यात्रा मार्ग रूपकुंड और बेदनी बुग्याल के लिए जाना जाता है। जहां बेदनी बुग्याल अपने दूर-दूर तक फैले हरे-भरे घास के मैदानों के लिए प्रसिद्ध है, वहीं रूपकुंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ ऐतिहासिक रहस्यों के कारण भी पहचान रखता है।

इसी कड़ी में यहां स्थित रूपकुंड झील को SKELETON LAKE और “पातर नचोनिया” जैसे नामों से जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, एक समय एक राजा अपने साथ नर्तकों के दल को इस स्थान पर लेकर आया था। इससे कुपित होकर माँ नंदा की शक्ति से ओलों की वर्षा हुई, जिसमें वे सभी पत्थर में परिवर्तित हो गए। कहा जाता है कि उन्हीं के अवशेष आज भी इस झील के आसपास देखे जा सकते हैं।
नंदा देवी राजजात यात्रा का निर्धारित मार्ग और पड़ाव
Nanda devi raj jat yatra एक निश्चित और पारंपरिक मार्ग से होकर गुजरती है, जिसमें अनेक महत्वपूर्ण पड़ाव शामिल हैं। यह यात्रा चरणबद्ध रूप से गांवों, पर्वतीय क्षेत्रों और उच्च हिमालयी बुग्यालों से होती हुई आगे बढ़ती है। प्रत्येक पड़ाव का अपना धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व है, जहां श्रद्धालु विधि-विधान के साथ यात्रा को आगे बढ़ाते हैं।
यात्रा मार्ग और दूरी
| से | तक | दूरी |
|---|---|---|
| नौटी गांव ( Nauti Village ) | ईडा बधानी | 10 किमी |
| ईडा बधानी | नौटी | 10 किमी |
| नौटी | कांसुवा | 10 किमी |
| कांसुवा | सेम | 12 किमी |
| सेम | कोटि | 10 किमी |
| कोटि | भगोती | 12 किमी |
| भगोती | कुलसारी | 12 किमी |
| कुलसारी | चेपड़ों | 10 किमी |
| चेपड़ों | नंद केसरी | 11 किमी |
| नंद केसरी | फल्दिया | 8 किमी |
| फल्दिया | मुंडोली | 10 किमी |
| मुंडोली | वाण | 15 किमी |
| वाण | गेरोली पातल | 10 किमी |
| गेरोली पातल | बेदनी बुग्याल (Bedni bugyal) | 9 किमी |
| बेदनी बुग्याल (Bedni bugyal) | पातर नाचोनिया | 5 किमी |
| पातर नाचोनिया (SKELETON LAKE) | सिला समुंद्र | 15 किमी |
| सिला समुंद्र | चंदनिया घाट | 16 किमी |
| चंदनिया घाट | सुतोल | 18 किमी |
| सुतोल | घाट | 32 किमी |
| घाट | नौटी | 40 किमी |
| नौटी गांव ( Nauti Village ) | — | — |
यात्रा के प्रमुख पड़ाव और उनका महत्व
उत्तराखंड के चमोली जिले में आयोजित होने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा के दौरान कई ऐसे प्रमुख पड़ाव आते हैं, जिनका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व विशेष रूप से जुड़ा हुआ है।
- नौटी गांव: यात्रा का प्रारंभिक स्थल होने के कारण यहां सभी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विधिवत पूजा-अर्चना संपन्न की जाती है।
- कोटि गांव: यह एक अहम पड़ाव है, जहां पुजारी और श्रद्धालु पूरी रात भजन-कीर्तन करते हैं।
- बेदनी बुग्याल: यात्रा मार्ग के ऊंचे और रमणीय स्थलों में से एक, जो अपने विस्तृत और सुंदर घास के मैदानों के लिए प्रसिद्ध है।
- रूपकुंड झील (SKELETON LAKE) : ‘कंकाल झील’ के नाम से विख्यात यह स्थान अपने रहस्यमय इतिहास और धार्मिक महत्व के कारण जाना जाता है।
- होमकुंड (Homkund): नौटी गांव से शुरू हुई यात्रा का अंतिम पड़ाव, जहां सभी धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण करने के बाद चौसिंघिया खाडू को विदा किया जाता है। मान्यता है कि इसी के माध्यम से माँ नंदा देवी कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान करती हैं।
साल 2026 के लिए नंदा देवी राजजात यात्रा का कार्यक्रम
वर्ष 2026 में श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा, जिसे हिमालयीय महाकुंभ के नाम से भी जाना जाता है, का भव्य आयोजन किया जाएगा। करीब 280 किलोमीटर लंबी इस पैदल यात्रा में श्रद्धा और आस्था का विशाल सैलाब उमड़ने की उम्मीद है। लगभग 20 दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक आयोजन के दौरान सैकड़ों देवी-देवताओं की डोलियां और छंतोलियां श्रद्धालुओं को दर्शन देंगी। इसी क्रम में बसंत पंचमी के पावन अवसर पर 23 जनवरी को इस महाकुंभ के आयोजन का आधिकारिक कार्यक्रम जारी किया जाएगा।

12 वर्षों बाद होने वाली यात्रा का लंबे समय से इंतजार
गौरतलब है कि श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा प्रत्येक 12 वर्ष के अंतराल पर आयोजित होती है। आमतौर पर अगस्त–सितंबर माह में होने वाली इस यात्रा को लेकर लोगों में लंबे समय से उत्साह बना हुआ है। यात्रा में शामिल होने के लिए हर बार लाखों श्रद्धालु दूर-दराज के क्षेत्रों से पहुंचते हैं। इसी को देखते हुए सरकार और आयोजन समिति पिछले दो वर्षों से तैयारियों में जुटी हुई है।
यात्रा पड़ावों पर बुनियादी सुविधाओं को किया जा रहा मजबूत
इसके साथ ही यात्रा मार्ग पर पड़ने वाले विभिन्न पड़ावों में आधारभूत ढांचे को सुदृढ़ किया जा रहा है। सड़कों के सुधार का कार्य तेजी से चल रहा है, जबकि अन्य आवश्यक सुविधाओं के लिए विस्तृत इस्टीमेट भी तैयार कर लिए गए हैं। वहीं नौटी गांव में यात्रा कार्यक्रम जारी करने को लेकर भव्य महोत्सव की तैयारियां अंतिम चरण में हैं।
23 जनवरी को जारी होगा कार्यक्रम, 20 से महोत्सव की शुरुआत
NANDA DEVI RAJ JAT YATRA SCHEDULE 2026 श्रीनंदा देवी राजजात समिति के महासचिव भुवन नौटियाल ने बताया कि यात्रा की तैयारियां लगातार जारी हैं। उन्होंने कहा कि बसंत पंचमी 23 जनवरी को राजवंशी राजकुंवर द्वारा यात्रा का कार्यक्रम जारी किया जाएगा। इसके लिए 20 जनवरी से नौटी में महोत्सव आयोजित किया जाएगा, जिसमें देवी पूजन के साथ-साथ विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। साथ ही गढ़वाल और कुमाऊं के राजवंशों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की भी प्रबल संभावना है।
Nanda Devi Raj Jat Yatra 2026 कब शुरू होगी?
Nanda Devi Raj Jat Yatra 2026 Schedule के अनुसार, यात्रा का आधिकारिक कार्यक्रम 23 January 2026 को Basant Panchami के दिन जारी किया जाएगा।
Nanda Devi Raj Jat Yatra कहां से शुरू होती है?
यात्रा की शुरुआत Nauti Village, Chamoli (Uttarakhand) से होती है।
Nanda Devi Raj Jat Yatra कितने दिन चलती है?
यह यात्रा लगभग 20–21 Days तक चलती है।
Chausingiya Khadu क्या है? (Chausingiya Khadu Meaning)
Chausingiya Khadu एक चार सींग वाला दुर्लभ भेड़ है, जिसे भगवान शिव का दूत माना जाता है और यह पूरी यात्रा की अगुवाई करता है।
क्या आम श्रद्धालु Nanda Devi Raj Jat Yatra में शामिल हो सकते हैं?
हाँ, प्रशासनिक दिशा-निर्देशों के अनुसार Common Devotees भी इस यात्रा में भाग ले सकते हैं।
नंदा देवी राजजात यात्रा कितने वर्षों में होती है?
यह यात्रा हर 12 years में एक बार आयोजित की जाती है, इसलिए इसे Himalayan MahaKumbh भी कहा जाता है।
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माँ पूर्णागिरि मंदिर : इतिहास, महत्व, यात्रा मार्ग और दर्शन गाइड – संपूर्ण जानकारी 2026

🌺 Purnagiri Mandir : दर्शन गाइड
पूर्णागिरि मंदिर (Purnagiri Mandir) उत्तराखंड के टनकपुर क्षेत्र में स्थित देवी शक्ति का अत्यंत प्राचीन और सिद्ध शक्तिपीठ है। इसे माँ पूर्णागिरि, पूर्णा शक्ति, माँ पूर्णा देवी के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर शारदा नदी के तट पर स्थित पहाड़ी के शीर्ष पर बना है और अपनी अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा, सिद्धि, पूर्णता और शक्तिपूजन के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहाँ आने वाले भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं, इसलिए इसे “पूर्ण करने वाली शक्ति” भी कहा जाता है।
Table of Contents
🕉️ पूर्णागिरि मंदिर कहाँ स्थित है? (purnagiri mandir Location)
पूर्णागिरि मंदिर उत्तराखंड राज्य के चंपावत ज़िले के टनकपुर के पास स्थित है।
- समुद्र तल से ऊँचाई लगभग – 3000 मीटर (लगभग)
- शारदा नदी और काली नदी के संगम के निकट
- भारत–नेपाल सीमा के पास
- टनकपुर से दूरी – लगभग 20–22 किलोमीटर

🛕 पूर्णागिरि मंदिर का इतिहास (History of Purnagiri Mandir)
पूर्णागिरि मंदिर का इतिहास सती के 51 शक्तिपीठों से जुड़ा है।
पुराणों में कथा
- भगवान शिव और माता सती का विवाह हुआ
- दक्ष प्रजापति ने यज्ञ किया, लेकिन शिव को आमंत्रित नहीं किया
- अपमान से आहत सती ने यज्ञ कुंड में देह त्याग दी
- शोकाकुल शिव सती के शरीर को लेकर तांडव करने लगे
- ब्रह्मांड की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए
👉 जहाँ-जहाँ टुकड़े गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने
👉 पूर्णागिरि में माता सती का नाभि भाग गिरा
इसलिए इसे परिपूर्ण शक्ति का स्थान माना जाता है।
🙏 धार्मिक महत्व (Spiritual Importance)
- यह 108 सिद्ध शक्तिपीठों में से एक
- मनोकामना पूर्ण करने वाला धाम
- नवदुर्गा का विशेष पूजा स्थल
- कुमाऊँ और तराई क्षेत्र का सबसे बड़ा शक्ति स्थल
- यहाँ नवरात्रि के दौरान लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं
भक्त यहाँ आकर:
- ध्वज चढ़ाते हैं
- मनौती मांगते हैं
- प्रसाद चढ़ाते हैं
- गर्भगृह में दर्शन करते हैं

🧭 पूर्णागिरि मंदिर कैसे पहुँचें? (How to Reach Purnagiri Mandir)
🚆 रेल मार्ग से
सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन – टनकपुर रेलवे स्टेशन
- यहाँ से मंदिर दूरी – लगभग 20–22 किमी
- टैक्सी/जीप आसानी से उपलब्ध
✈️ हवाई मार्ग से
नजदीकी हवाई अड्डा – पंतनगर एयरपोर्ट
- दूरी – लगभग 120 किमी
- पंतनगर से टनकपुर होते हुए मंदिर पहुँचा जाता है
🚌 सड़क मार्ग से
सीधे बसें उपलब्ध:
- हल्द्वानी
- बनबसा
- नैनीताल
- पिथौरागढ़
- खटीमा
- किच्छा
टनकपुर से:
- टैक्सी
- जीप
- साझा मैक्सी कैब
🚶 पैदल चढ़ाई
- टनकपुर से पर्वत तक सड़क
- इसके बाद लगभग 3–5 किमी पैदल ट्रेक
- मार्ग पर रेलिंग, सीढ़ियाँ, दुकानें, चाय-पकौड़े, प्रसाद की दुकानें
🧗 यात्रा रूट संक्षेप में
टनकपुर → ठूलीगाड़ → बाणबसा → शारदा नदी → पूर्णागिरि मंदिर

🕓 दर्शन और खुलने का समय
- सुबह: 5:00 बजे – 12:00 बजे
- शाम: 4:00 बजे – 9:00 बजे
- नवरात्रि में समय बढ़ा दिया जाता है
🌸 पूर्णागिरि मेला (Navratri Mela)
नवरात्रि के समय:
- भव्य मेला लगता है
- लाखों श्रद्धालु आते हैं
- नेपाल से भी भक्त आते हैं
- 2–3 सप्ताह का विशाल पर्व
मेले में:
- झूले
- प्रसाद
- धार्मिक भजन
- धर्म-प्रवचन

🌄 पूर्णागिरि ट्रेकिंग अनुभव
- प्राकृतिक पहाड़
- हरे जंगल
- नदी का नज़ारा
- ठंडी हवा का स्पर्श
- अद्भुत आध्यात्मिक शांति
⚠️ सुरक्षा व यात्रा टिप्स
- सीढ़ियों पर ध्यान से चलें
- बरसात के समय विशेष सावधानी
- नदी के किनारे सेल्फी से बचें
- बुजुर्गों के लिए डांडी-कांडी उपलब्ध
- ऊँचाई पर ठंड बढ़ जाती है – गर्म कपड़े रखें
- पानी और हल्का भोजन साथ रखें
🛍️ आसपास घूमने की जगहें
- टनकपुर शारदा घाट
- बनबसा बैराज
- चंपावत
- पूरनपुर
- पूर्णा नदी तट
💡 पूर्णागिरि मंदिर से जुड़ी रोचक तथ्य
- यह सिद्ध शक्तिपीठ है
- नेपाल सीमा के निकट स्थित
- सती का नाभि भाग यहाँ गिरा माना जाता है
- शारदा नदी के किनारे स्थित
- यहाँ साधना करने वाले अनेक संतों ने सिद्धियाँ प्राप्त की
🌞 आने का सबसे अच्छा समय
- फरवरी से जून
- अक्टूबर से दिसंबर
- नवरात्रि में विशेष भीड़
बरसात में यात्रा कठिन हो सकती है।
🛌 ठहरने की सुविधा
- टनकपुर में होटल
- धर्मशाला
- गेस्ट हाउस
- सरल बजट विकल्प
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🙋 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
❓ पूर्णागिरि मंदिर कहाँ है?
उत्तराखंड के चंपावत जिले के टनकपुर के पास पहाड़ी पर।
❓ यह किस लिए प्रसिद्ध है?
सिद्ध शक्तिपीठ और मनोकामना पूर्ण करने के लिए।
❓ किसका अंग यहाँ गिरा था?
माता सती का नाभि भाग।
❓ कौन सा महीना सबसे अच्छा है?
नवरात्रि और मार्च–अप्रैल।
❓ क्या बच्चे और बुजुर्ग जा सकते हैं?
हाँ, डांडी-कांडी सुविधा उपलब्ध है।
✨ समापन
Purnagiri Mandir केवल धार्मिक स्थान नहीं, बल्कि आस्था, ऊर्जा और प्रकृति का अद्भुत संगम है।
यहाँ आने वाला प्रत्येक भक्त माँ पूर्णागिरि की शक्तिमय उपस्थिति का अनुभव करता है और अपने भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार महसूस करता है।
यदि आप आध्यात्मिक शांति, प्राकृतिक सौंदर्य और शक्तिपूजा का अद्भुत अनुभव लेना चाहते हैं, तो जीवन में एक बार पूर्णागिरि धाम की यात्रा अवश्य करें।
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कौन थी सावित्रीबाई फुले , क्यों मनाई जाती है उनकी जयंती , जानें उनकी प्रेरणादायक कहानी…

Savitribai Phule: भारत की पहली महिला शिक्षिका की प्रेरणादायक कहानी
भारत के सामाजिक और शैक्षिक इतिहास में savitribai phule का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। वे न केवल भारत की पहली महिला शिक्षिका थीं, बल्कि महिला शिक्षा, दलित उत्थान और सामाजिक समानता की मजबूत आवाज़ भी थीं। जिस दौर में महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी पाप समझा जाता था, उस समय उन्होंने शिक्षा को अपना हथियार बनाया और समाज की जड़ों में जमी कुरीतियों को चुनौती दी।
Table of Contents
Savitribai Phule कौन थीं? (Who is She?)
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में हुआ था। वे एक समाज सुधारक, कवयित्री, शिक्षिका और नारी अधिकारों की प्रबल समर्थक थीं।
उनका विवाह बहुत कम उम्र में ज्योतिराव फुले से हुआ, जिन्होंने उनके जीवन को शिक्षा और सामाजिक सुधार की दिशा दी। पति के सहयोग से सावित्रीबाई ने खुद पढ़ाई की और फिर दूसरों को पढ़ाने का साहसिक निर्णय लिया।
सावित्रीबाई फुले जयंती क्यों मनाई जाती है? (Why We Celebrate Her Jayanti?)
हर साल 3 जनवरी को सावित्रीबाई फुले जयंती इसलिए मनाई जाती है क्योंकि यह दिन भारतीय समाज में महिला शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की लड़ाई का प्रतीक है।
जयंती मनाने के प्रमुख कारण:
- महिला शिक्षा की नींव रखने के लिए
- जाति और लिंग भेदभाव के खिलाफ संघर्ष को याद करने के लिए
- सामाजिक सुधार आंदोलन में उनके योगदान को सम्मान देने के लिए
- नई पीढ़ी को शिक्षा और समानता का महत्व समझाने के लिए
आज देश के कई हिस्सों में स्कूल, कॉलेज, सामाजिक संगठन और सरकारी संस्थान उनकी जयंती पर कार्यक्रम आयोजित करते हैं।

सावित्रीबाई फुले के प्रमुख कार्य (Her Major Works)
1. भारत का पहला बालिका विद्यालय
1848 में पुणे के भिड़े वाड़ा में savitribai phule और ज्योतिराव फुले ने भारत का पहला बालिका विद्यालय शुरू किया। यह उस समय एक क्रांतिकारी कदम था।
2. महिला शिक्षा का विस्तार
उन्होंने महाराष्ट्र में कई लड़कियों के स्कूल खोले और विधवाओं, दलितों और वंचित वर्ग की महिलाओं को शिक्षा से जोड़ा।
3. विधवा पुनर्विवाह और बाल विवाह विरोध
सावित्रीबाई ने:
- विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया
- बाल विवाह का खुलकर विरोध किया
- गर्भवती विधवाओं के लिए आश्रय गृह चलाए
4. कवयित्री और लेखिका
उनकी प्रसिद्ध काव्य रचनाएँ:
- काव्यफुले
- बावनकशी सुबोध रत्नाकर
इन रचनाओं में सामाजिक असमानता, शिक्षा और नारी स्वतंत्रता की गूंज सुनाई देती है।
संघर्ष और चुनौतियां (Struggles & Challenges)
Savitribai Phule का जीवन संघर्षों से भरा रहा।
उन्हें किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
- स्कूल जाते समय लोग उन पर कीचड़ और गोबर फेंकते थे
- समाज ने उन्हें चरित्रहीन और विद्रोही कहा
- महिलाओं के पढ़ाने को धर्म के खिलाफ बताया गया
लेकिन सावित्रीबाई रोज़ एक अतिरिक्त साड़ी लेकर जाती थीं ताकि गंदी हो जाने पर बदल सकें। यह उनके अटूट संकल्प का प्रतीक था।
सामाजिक सुधार आंदोलन में योगदान
उन्होंने:
- सत्यशोधक समाज के कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई
- छुआछूत और जातिवाद के खिलाफ आवाज़ उठाई
- अनाथ बच्चों और विधवाओं के लिए आश्रय खोले
वे सिर्फ शिक्षिका नहीं, बल्कि एक समाज निर्माता थीं।
आधुनिक भारत में Savitribai Phule की प्रासंगिकता
आज जब:
- महिला शिक्षा को अधिकार माना जाता है
- बेटियाँ हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं
तो इसके पीछे savitribai phule जैसी महान विभूतियों का संघर्ष छिपा है। वे आज भी:
- नारी सशक्तिकरण की प्रेरणा हैं
- सामाजिक समानता की मिसाल हैं
- शिक्षा को परिवर्तन का माध्यम मानने की सीख देती हैं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. Savitribai Phule क्यों प्रसिद्ध हैं?
वे भारत की पहली महिला शिक्षिका और महिला शिक्षा की अग्रदूत थीं।
Q2. Savitribai Phule Jayanti कब मनाई जाती है?
हर साल 3 जनवरी को।
Q3. उनका सबसे बड़ा योगदान क्या था?
लड़कियों और वंचित वर्गों के लिए शिक्षा की शुरुआत।
Q4. उन्होंने किन सामाजिक बुराइयों का विरोध किया?
जातिवाद, बाल विवाह, सती प्रथा और महिला उत्पीड़न।
Q5. Savitribai Phule का निधन कैसे हुआ?
1897 में प्लेग पीड़ितों की सेवा करते हुए उनका निधन हुआ।
Q6. आज उनकी विरासत क्या है?
महिला शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय।
निष्कर्ष (Conclusion)
Savitribai Phule सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि विचारधारा हैं। उन्होंने साबित किया कि शिक्षा सबसे बड़ा हथियार है, जो समाज को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जा सकता है। आज जब हम शिक्षित भारत की बात करते हैं, तो उसकी नींव सावित्रीबाई फुले जैसे महापुरुषों और महावीरांगनाओं ने रखी है।
उनका जीवन हमें सिखाता है —
संघर्ष से मत डरिए, क्योंकि बदलाव वहीं से शुरू होता है।
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उत्तराखंड में बर्फ़बारी का आनंद लेने के लिए शानदार हिल स्टेशन्स, दिल्ली से मात्र इतनी है दूरी…

Snowfall Places in Uttarakhand : ये उत्तराखंड के बेस्ट Snowfall Destination
Snowfall Places in Uttarakhand : उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता है। जैसे ही सर्दियों का मौसम दस्तक देता है, ये राज्य किसी जादुई दुनिया में बदल जाता है। पहाड़ों की चोटियों, देवदार के पेड़ों और घरों पर जमी बर्फ इस प्रदेश को बेहद आकर्षक बना देती है। यही कारण है कि सर्दियों में उत्तराखंड बर्फबारी देखने के शौकीनों के लिए एक खूबसूरत पर्यटन स्थल बन जाता है।
मुख्य बिंदु
Best Destination in Uttarakhand for Snowfall
इसके अलावा, जब चारों ओर बर्फ की सफेद चादर बिछ जाती है, तो पूरा वातावरण मन को मोह लेने वाला हो जाता है। यदि आप भी सर्दियों में उत्तराखंड घूमने का मन बना रहे हैं, तो यहां की बर्फबारी आपकी यात्रा को यादगार बना सकती है।
उत्तराखंड का नाम आते ही मन में खूबसूरत घाटियों, शांत हिल स्टेशनों और पवित्र नदियों की इमेज उभरने लगती है। लेकिन सर्दियों में ये राज्य अपनी अलग ही छटा बिखेरता है। हल्की-हल्की गिरती बर्फ, शांत वातावरण और पहाड़ों की नीरवता मन को गहरी शांति देती है। उत्तराखंड की ये जगहें आपकी फैमिली या दोस्तों के साथ परफेक्ट विंटर डेस्टिनेशन हो सकती हैं। तो अगर आप भी इस बार बर्फ़बारी का आनंद लेना चाहते हैं तो ये जगहें आपके लिए ख़ास बन सकती हैं।
औली (Auli snowfall)
औली (Auli snowfall) सर्दियों के मौसम में एक मनमोहक बर्फीले स्वर्ग में तब्दील हो जाता है। जैसे ही दिसंबर का महीना शुरू होता है, औली बर्फ की सफ़ेद चादर ओढ़े नजर आता है। जो आमतौर पर मार्च तक जारी रहता है। इसी दौरान औली में भारी बर्फ गिरने से स्कीइंग और स्नोबोर्डिंग जैसे शीतकालीन खेलों की रौनक बढ़ जाती है। जबकि, कुछ वर्षों में बर्फबारी थोड़ी देर से होती है। जिससे पर्यटकों को इंतजार करना पड़ता है, लेकिन जैसे ही बर्फ गिरती है, ये हिल स्टेशन सैलानियों से गुलजार हो जाता है। इस दौरान औली का तापमान अक्सर शून्य से नीचे चला जाता है, जो खासतौर पर कपल्स और एडवेंचर लवर्स को आकर्षित करता है।

How to Reach Auli
दिल्ली से औली पहुंचने के लिए पहले हरिद्वार या ऋषिकेश तक बस या ट्रेन से जाया जा सकता है। वहां से टैक्सी या बस के जरिए जोशीमठ पहुंचा जाता है। इसके बाद जोशीमठ से औली के लिए टैक्सी या प्रसिद्ध केबल कार (Ropeway) का विकल्प उपलब्ध है।
चकराता ( Snowfall in chakrata )
चकराता उत्तराखंड के देहरादून जिले में स्थित एक शांत और खूबसूरत हिल स्टेशन है, जो सर्दियों में बर्फबारी के कारण खास आकर्षण बन जाता है। दिसंबर से मार्च के बीच यहां ठंड का असर बढ़ जाता है और ऊँचाई वाले इलाकों में अच्छी बर्फ देखने को मिलती है, खासकर जनवरी के महीने में। बर्फ से ढके देवदार के जंगल, ऊँचे पहाड़ और शांत वातावरण चकराता को एक आदर्श snowfall destination बनाते हैं। टाइगर फॉल्स और मोयला टॉप जैसे स्थान सर्दियों में और भी मनमोहक नजर आते हैं। हालांकि, यह एक कैंटोनमेंट क्षेत्र है, इसलिए कुछ स्थानों पर प्रतिबंध लागू रहते हैं, लेकिन फिर भी प्रकृति प्रेमियों और एडवेंचर चाहने वालों के लिए यह जगह बेहद खास है।

How to Reach Chakrata
चकराता पहुंचने के लिए सड़क मार्ग सबसे सुविधाजनक विकल्प है। देहरादून से चकराता की दूरी लगभग 87–90 किलोमीटर है, जिसे टैक्सी या बस से आसानी से तय किया जा सकता है। ट्रेन से यात्रा करने वालों के लिए देहरादून रेलवे स्टेशन सबसे नजदीकी स्टेशन है, जबकि हवाई मार्ग से आने वाले पर्यटक देहरादून के जॉली ग्रांट एयरपोर्ट तक पहुंच सकते हैं, जो चकराता से करीब 113 किलोमीटर दूर है। इसके बाद एयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन से टैक्सी या बस के जरिए चकराता पहुंचना सरल रहता है।
हर्षिल (Snowfall in Harsil)
हर्षिल (Harsil) उत्तराखंड की एक खूबसूरत घाटी है, जहां दिसंबर से फरवरी के बीच अच्छी बर्फबारी देखने को मिलती है। इस दौरान पूरी घाटी बर्फ की सफेद चादर में ढक जाती है और यह क्षेत्र एक मनमोहक विंटर वंडरलैंड का रूप ले लेता है। बर्फबारी के समय यहां का तापमान आमतौर पर 0°C के आसपास रहता है, जबकि रात में पारा और भी नीचे चला जाता है। दिसंबर और जनवरी के महीनों में बर्फबारी अपने चरम पर होती है, जिससे शांत वातावरण और बर्फ से ढके पहाड़ पर्यटकों को खास तौर पर आकर्षित करते हैं। यही वजह है कि सर्दियों में हर्षिल ठंडे मौसम और प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने वालों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बन जाता है।

How to Reach Harsil
हर्षिल पहुँचने के लिए सड़क मार्ग सबसे सुविधाजनक ऑप्शन है। आप निकटम रेलवे स्टेशन देहरादून तक ट्रेन या निकटतम एयरपोर्ट जौलीग्रांट तक हवाई यात्रा कर के आ सकते हैं। जहाँ से आगे का सफर आपको सड़क मार्ग से तय करना होगा। इसके लिए आप देहरादून, ऋषिकेश या हरिद्वार से शेयर टैक्सी या रोडवेज की बसों के माध्यम से हर्षिल पहुँच सकते हैं।
दिल्ली/मैदान से: हरिद्वार/ऋषिकेश -> देहरादून -> उत्तरकाशी -> हर्षिल (एनएच 34/108 पर)
धनौल्टी ( Snowfall in Dhanaulti )
धनौल्टी उत्तराखंड का एक बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन है। जिसकी समुद्र तल ऊंचाई 2286 मीटर है। वैसे तो साल भर यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता देखने लायक होती है। और पर्यटक देश-विदेश से यहां घूमने आते हैं। लेकिन सर्दियों में यहाँ का दृश्य और भी रमणीय हो जाता है। उत्तराखण्ड में बर्फ़बारी का आनंद लेने के लिए धनौल्टी एक परफेक्ट विंटर डेस्टिनेशन है। यहाँ आप फैमिली या दोस्तों के साथ घूमने और बर्फ़बार का आनंद लेने के लिए आ सकते हैं। दिसंबर से फरवरी यहाँ पर बर्फ़बारी का आनंद लेने के लिए सबसे बेस्ट टाइम है।

How Reach Dhanaulti
धनौल्टी पहुँचने के लिए सबसे अच्छा है सड़क मार्ग (बस, टैक्सी, कार) जो देहरादून या ऋषिकेश से मसूरी होते हुए या सीधे चंबा-ऋषिकेश रूट से जाता है। निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट एयरपोर्ट (देहरादून) और निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून/ऋषिकेश हैं। जहाँ से आगे बस या टैक्सी लेनी पड़ती है, और दिल्ली से ये लगभग 300-325 किमी दूर है।
मुक्तेश्वर ( Snowfall in Mukteshwar )
मुक्तेश्वर उत्तराखंड के नैनीताल जिले में एक फेमस हिल स्टेशन है। जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और बर्फबारी के लिए प्रसिद्ध है। मुक्तेश्वर में बर्फबारी (Snowfall Destination) देखने के लिए दिसंबर के अंत से फरवरी तक का समय सबसे अच्छा होता है, जब यहाँ का तापमान शून्य से नीचे चला जाता है और घाटियाँ बर्फ से ढक जाती हैं, जिससे यह स्थान सर्दियों में बेहद खूबसूरत और दर्शनीय बन जाता है।
How to Reach Mukteshwar
मुक्तेश्वर पहुँचने के लिए सबसे पहले आप पंतनगर एयरपोर्ट (लगभग 110 किमी) हवाई जहाज़ से या काठगोदाम/हल्द्वानी रेलवे स्टेशन से ट्रेन द्वारा आएं। इसके बाद नैनीताल या भवाली तक टैक्सी या बस लें और फिर स्थानीय बस या टैक्सी से मुक्तेश्वर पहुँचें (नैनीताल से लगभग 51 किमी, भवाली से 40 किमी)। रास्ता देवदार के जंगलों और फलों के बगीचों से होकर गुजरता है, जिससे यात्रा और भी खूबसूरत बन जाती है।
रानीखेत (Ranikhet in Winters)
रानीखेत उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित एक खूबसूरत पर्यटक स्थल है। जो सर्दियों में अपने साथ बर्फबारी भी लेकर आता है। दिसंबर और जनवरी के महीनों में ये Snowfall Destination पूरी तरह बर्फ की चादर से ढक जाता है। जिससे तापमान काफी गिर जाता है। बर्फीले परिदृश्य और ठंडी हवाओं के बीच रानीखेत का नजारा पर्यटकों को एक जादुई अनुभव प्रदान करता है, जो इसे सर्दियों में घूमने के लिए एक अच्छी जगह बनती है। ये एक छावनी ऐरा भी है। इसे अंग्रेजों ने बसाया था बर्फ़बारी के साथ आप यहां पर स्थानीय व्यंजनों का स्वाद भी ले सकते हैं।
How to Reach Ranikhet
रानीखेत पहुँचने के लिए आप टैक्सी या बस से सुंदर पहाड़ियों से होते हुए अंतिम 2–4 घंटे का सफर तय कर सकते हैं, क्योंकि यहाँ कोई सीधा हवाई अड्डा या प्रमुख रेलवे स्टेशन नहीं है। दिल्ली जैसे प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग से भी यात्रा की जा सकती है, जो लगभग 350 किमी/8–10 घंटे का है। निकटतम हवाई अड्डों में पंतनगर हवाई अड्डा (PNQ) लगभग 110–119 किमी दूर है, जहाँ दिल्ली से उड़ानें उपलब्ध हैं और हवाई अड्डे से कैब आसानी से मिल जाती है। इसके अलावा, जॉली ग्रांट एयरपोर्ट (DED), देहरादून लगभग 150 किमी दूर है।
उत्तराखंड में Snowfall देखने के लिए Best Places कौन से हैं?
सबसे लोकप्रिय Snowfall Places हैं: Auli, Harsil, Dhanaulti, Mukteshwar, Ranikhet, Chakrata।
Snowfall Destination तक पहुँचने के लिए नज़दीकी Airport कौन सा है?
निकटतम Airports: Pantnagar Airport, Jolly Grant Airport (Dehradun), और Indira Gandhi Airport (Delhi)।
Auli में Snowfall देखने के लिए कैसे पहुँचे?
पहले Haridwar/Rishikesh तक ट्रेन या बस लें, फिर Joshimath तक टैक्सी या बस, और अंत में Auli के लिए Ropeway या टैक्सी लें।
उत्तराखंड में Snowfall का Best Time कब है?
Best Time है December से February, जब पहाड़ और घाटियाँ बर्फ से ढक जाती हैं और दृश्य बेहद मनोरम बन जाते हैं।
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