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नंदा देवी राज जात यात्रा 2026 : ख़त्म हुआ इंतजार, इस दिन से शुरू होगी यात्रा…..

NANDA DEVI RAJ JAT YATRA 2026: वसंत पंचमी के दिन जारी होगा यात्रा कार्यक्रम, 20 जनवरी से नौटी गाँव में आयोजित होगा महोत्सव
NANDA DEVI RAJ JAT YATRA : साल 2026 उत्तराखंड के लिए कई नए यादगार पल लाएगा। इसी साल हिमालयी महाकुम्भ के नामा से विख्यात नंदा राज जात यात्रा का आयोजन भी होना है। नंदा राजजात यात्रा कुंभ की तरह ही प्रति 12 वर्षों में एक बार आयोजित की जाती है। इस बार 2026 में नंदा राज जात यात्रा के लिए 23 जनवरी को यात्रा कार्यक्रम जारी किया जाएगा।
मुख्य बिंदु
क्या है नंदा राज जात यात्रा 2026 ? ( NANDA DEVI RAJ JAT YATRA SCHEDULE 2026 )
नंदा देवी गढ़वाल ही नहीं बल्कि कुमाऊँ क्षेत्र में भी अत्यंत पूजनीय हैं। जहाँ उन्हें श्रद्धापूर्वक राजराजेश्वरी भी कहा जाता है। मान्यताओं के मुताबिक कुमाऊँ मंडल को माँ नंदा का मायका और गढ़वाल मंडल को उनका ससुराल माना जाता है। जिससे दोनों क्षेत्रों की सांस्कृतिक एकता झलकती है। इसी परंपरा के चलते नंदा देवी राजजात यात्रा सदियों से चली आ रही है। हालांकि ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि ये हिमालयी महाकुंभ वर्ष 1843 से नियमित आयोजित किया जा रहा है। ये यात्रा कुमाऊँ और गढ़वाल के लोगों को एक सूत्र में बाँधते हुए धार्मिक और सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक बनती है।
क्यों मनाई जाती हैं नंदा राज जात यात्रा ? ( NANDA DEVI RAJ JAT YATRA 2026 )
नंदा देवी राज जात यात्रा ( HIMALAYI MAHAKUMBH ) से जुड़ी अनेक लोक मान्यताएं प्रचलित हैं। जिनमें एक लोककथा विशेष रूप से स्वीकार की जाती है। जिसके मुताबिक राजा दक्ष के घर जन्मी माँ नंदा देवी को माता पार्वती का अवतार माना जाता है। जिनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। विवाह के बाद वो भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत स्थित अपने ससुराल चली गईं। जब कई वर्षों बाद उन्हें अपने मायके की याद आई और उन्होंने भगवान शिव से वहां जाने की अनुमति मांगी। जिस पर भगवान शिव ने कहा कि बारह दिन बाद वो अपने दूत को उन्हें वापस लाने के लिए भेजेंगे।

इसके बाद, मायके में बारह दिन पूरे होने पर भगवान शिव ने अपने प्रिय चौसिंघिया खाडू को माँ नंदा को वापस लाने के लिए भेजा। विदाई की सभी तैयारियां पूरी की गईं। यात्रा के दौरान माँ नंदा के परिवार जन भी भावुक मन से उनके साथ चले। मार्ग में जिन स्थानों पर माँ नंदा ने विश्राम किया, वहां आज शक्ति पीठ स्थापित माने जाते हैं। इसी विश्वास के चलते प्रत्येक बारह वर्षों में नंदा देवी राज जात यात्रा आयोजित कर माँ नंदा को प्रतीकात्मक रूप से उनके ससुराल भेजा जाता है।
NANDA DEVI RAJ JAT YATRA में बारह सालों का अंतराल क्यों हैं ?
नंदा राज जात यात्रा ( HIMALAYI MAHAKUMBH ) प्रत्येक बारह सालों में एक बार मनाई जाती हैं। इसीलिए ऐसे हिमालयी महाकुम्भ भी कहते हैं। माँ नंदा और भगवान् शिव की ये लोककथा सतयुग की मानी जाती है। और लोकमान्यताओं के मुताबिक सतयुग का एक दिन कलयुग के एक साल के बर्बर हैं। इसलिए सतयुग में माँ नंदा 12 दिनों के लिए अपने मायके आई थी जिसे आज के समय में 12 सालों के बराबर माना जाता है। इसलिए नंदा राज जात यात्रा प्रत्येक 12 सालों के समय अंतराल पर आयोजित की जाती है।

क्या है नंदा राज जात यात्रा में चौसिंगिया खाडू की मान्यता ( CHAUSINGIYA KHADU )
चौसिंगिया खाडू ( CHAUSINGIYA KHADU ) , नंदा राज जात यात्रा के आयोजन के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। चौसिंगिया खाडू क्षेत्रीय भाषा का एक शब्द है। जिसका हिंदी में अर्थ होता है – चार सींग वाला भेड़ जो कि अत्यंत दुर्लभ है। यही चार सींग वाला भेड़ पूरी यात्रा की अगुवाई करता है। लोकमान्यताओं के मुताबिक यात्रा से कुछ महीनों पहले ही ये चौसिंगिया खाडू यात्रा क्षेत्र के किसी गांव में जन्म लेता है। और ये 12 वर्षों में केवल एक बार होता है। माना जाता है कि ये भेड़ स्वयं भगवान् शिव का ही एक रूप है जो माँ नंदा को लेने आते हैं।

एशिया की सबसे लम्बी धार्मिक यात्रा ( Asia’s Longest Religious Pilgrimage )
नंदा देवी राज जात यात्रा एशिया की सबसे लम्बी धार्मिक यात्रा ( Longest Religious Pilgrimage of Asia ) है। इस यात्रा का शुभारंभ चमोली जिले के नॉटी गाँव ( NAUTI VILLAGE ) से किया जाता है। जो अपने अंतिम यात्रा पड़ाव होमकुंड ( HOMKUND )पर आम लोगों के लिए समाप्त होती है। इसके बाद माना जाता हैं कि माँ नंदा कैलाश की ओर प्रस्थान करती है। HOMEKUND से आगे रंग-बिरंगे वस्त्रों से सुशोभित चौसिंगिया खाडू को हिमालय के लिए रवाना किया जाता है।
नंदा देवी राज जात यात्रा का रुट मैप ( ROOT OF NANDA DEVI RAJ JAT YATRA 2026 )
( HIMALAYI MAHAKUMBH ) लगभग तीन सप्ताह तक चलने वाली ये करीब 280 किलोमीटर लंबी यात्रा विभिन्न गांवों, विस्तृत घास के मैदानों, घने जंगलों और ऊँचे पहाड़ी मार्गों से गुजरते हुए अपने अंतिम पड़ाव तक पहुँचती है। इस दौरान श्रद्धालुओं को प्रकृति के अनेक अद्भुत और विविध रूप देखने को मिलते हैं। विशेष रूप से ये यात्रा मार्ग रूपकुंड और बेदनी बुग्याल के लिए जाना जाता है। जहां बेदनी बुग्याल अपने दूर-दूर तक फैले हरे-भरे घास के मैदानों के लिए प्रसिद्ध है, वहीं रूपकुंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ ऐतिहासिक रहस्यों के कारण भी पहचान रखता है।

इसी कड़ी में यहां स्थित रूपकुंड झील को SKELETON LAKE और “पातर नचोनिया” जैसे नामों से जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, एक समय एक राजा अपने साथ नर्तकों के दल को इस स्थान पर लेकर आया था। इससे कुपित होकर माँ नंदा की शक्ति से ओलों की वर्षा हुई, जिसमें वे सभी पत्थर में परिवर्तित हो गए। कहा जाता है कि उन्हीं के अवशेष आज भी इस झील के आसपास देखे जा सकते हैं।
नंदा देवी राजजात यात्रा का निर्धारित मार्ग और पड़ाव
Nanda devi raj jat yatra एक निश्चित और पारंपरिक मार्ग से होकर गुजरती है, जिसमें अनेक महत्वपूर्ण पड़ाव शामिल हैं। यह यात्रा चरणबद्ध रूप से गांवों, पर्वतीय क्षेत्रों और उच्च हिमालयी बुग्यालों से होती हुई आगे बढ़ती है। प्रत्येक पड़ाव का अपना धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व है, जहां श्रद्धालु विधि-विधान के साथ यात्रा को आगे बढ़ाते हैं।
यात्रा मार्ग और दूरी
| से | तक | दूरी |
|---|---|---|
| नौटी गांव ( Nauti Village ) | ईडा बधानी | 10 किमी |
| ईडा बधानी | नौटी | 10 किमी |
| नौटी | कांसुवा | 10 किमी |
| कांसुवा | सेम | 12 किमी |
| सेम | कोटि | 10 किमी |
| कोटि | भगोती | 12 किमी |
| भगोती | कुलसारी | 12 किमी |
| कुलसारी | चेपड़ों | 10 किमी |
| चेपड़ों | नंद केसरी | 11 किमी |
| नंद केसरी | फल्दिया | 8 किमी |
| फल्दिया | मुंडोली | 10 किमी |
| मुंडोली | वाण | 15 किमी |
| वाण | गेरोली पातल | 10 किमी |
| गेरोली पातल | बेदनी बुग्याल (Bedni bugyal) | 9 किमी |
| बेदनी बुग्याल (Bedni bugyal) | पातर नाचोनिया | 5 किमी |
| पातर नाचोनिया (SKELETON LAKE) | सिला समुंद्र | 15 किमी |
| सिला समुंद्र | चंदनिया घाट | 16 किमी |
| चंदनिया घाट | सुतोल | 18 किमी |
| सुतोल | घाट | 32 किमी |
| घाट | नौटी | 40 किमी |
| नौटी गांव ( Nauti Village ) | — | — |
यात्रा के प्रमुख पड़ाव और उनका महत्व
उत्तराखंड के चमोली जिले में आयोजित होने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा के दौरान कई ऐसे प्रमुख पड़ाव आते हैं, जिनका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व विशेष रूप से जुड़ा हुआ है।
- नौटी गांव: यात्रा का प्रारंभिक स्थल होने के कारण यहां सभी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विधिवत पूजा-अर्चना संपन्न की जाती है।
- कोटि गांव: यह एक अहम पड़ाव है, जहां पुजारी और श्रद्धालु पूरी रात भजन-कीर्तन करते हैं।
- बेदनी बुग्याल: यात्रा मार्ग के ऊंचे और रमणीय स्थलों में से एक, जो अपने विस्तृत और सुंदर घास के मैदानों के लिए प्रसिद्ध है।
- रूपकुंड झील (SKELETON LAKE) : ‘कंकाल झील’ के नाम से विख्यात यह स्थान अपने रहस्यमय इतिहास और धार्मिक महत्व के कारण जाना जाता है।
- होमकुंड (Homkund): नौटी गांव से शुरू हुई यात्रा का अंतिम पड़ाव, जहां सभी धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण करने के बाद चौसिंघिया खाडू को विदा किया जाता है। मान्यता है कि इसी के माध्यम से माँ नंदा देवी कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान करती हैं।
साल 2026 के लिए नंदा देवी राजजात यात्रा का कार्यक्रम
वर्ष 2026 में श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा, जिसे हिमालयीय महाकुंभ के नाम से भी जाना जाता है, का भव्य आयोजन किया जाएगा। करीब 280 किलोमीटर लंबी इस पैदल यात्रा में श्रद्धा और आस्था का विशाल सैलाब उमड़ने की उम्मीद है। लगभग 20 दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक आयोजन के दौरान सैकड़ों देवी-देवताओं की डोलियां और छंतोलियां श्रद्धालुओं को दर्शन देंगी। इसी क्रम में बसंत पंचमी के पावन अवसर पर 23 जनवरी को इस महाकुंभ के आयोजन का आधिकारिक कार्यक्रम जारी किया जाएगा।

12 वर्षों बाद होने वाली यात्रा का लंबे समय से इंतजार
गौरतलब है कि श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा प्रत्येक 12 वर्ष के अंतराल पर आयोजित होती है। आमतौर पर अगस्त–सितंबर माह में होने वाली इस यात्रा को लेकर लोगों में लंबे समय से उत्साह बना हुआ है। यात्रा में शामिल होने के लिए हर बार लाखों श्रद्धालु दूर-दराज के क्षेत्रों से पहुंचते हैं। इसी को देखते हुए सरकार और आयोजन समिति पिछले दो वर्षों से तैयारियों में जुटी हुई है।
यात्रा पड़ावों पर बुनियादी सुविधाओं को किया जा रहा मजबूत
इसके साथ ही यात्रा मार्ग पर पड़ने वाले विभिन्न पड़ावों में आधारभूत ढांचे को सुदृढ़ किया जा रहा है। सड़कों के सुधार का कार्य तेजी से चल रहा है, जबकि अन्य आवश्यक सुविधाओं के लिए विस्तृत इस्टीमेट भी तैयार कर लिए गए हैं। वहीं नौटी गांव में यात्रा कार्यक्रम जारी करने को लेकर भव्य महोत्सव की तैयारियां अंतिम चरण में हैं।
23 जनवरी को जारी होगा कार्यक्रम, 20 से महोत्सव की शुरुआत
NANDA DEVI RAJ JAT YATRA SCHEDULE 2026 श्रीनंदा देवी राजजात समिति के महासचिव भुवन नौटियाल ने बताया कि यात्रा की तैयारियां लगातार जारी हैं। उन्होंने कहा कि बसंत पंचमी 23 जनवरी को राजवंशी राजकुंवर द्वारा यात्रा का कार्यक्रम जारी किया जाएगा। इसके लिए 20 जनवरी से नौटी में महोत्सव आयोजित किया जाएगा, जिसमें देवी पूजन के साथ-साथ विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। साथ ही गढ़वाल और कुमाऊं के राजवंशों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की भी प्रबल संभावना है।
Nanda Devi Raj Jat Yatra 2026 कब शुरू होगी?
Nanda Devi Raj Jat Yatra 2026 Schedule के अनुसार, यात्रा का आधिकारिक कार्यक्रम 23 January 2026 को Basant Panchami के दिन जारी किया जाएगा।
Nanda Devi Raj Jat Yatra कहां से शुरू होती है?
यात्रा की शुरुआत Nauti Village, Chamoli (Uttarakhand) से होती है।
Nanda Devi Raj Jat Yatra कितने दिन चलती है?
यह यात्रा लगभग 20–21 Days तक चलती है।
Chausingiya Khadu क्या है? (Chausingiya Khadu Meaning)
Chausingiya Khadu एक चार सींग वाला दुर्लभ भेड़ है, जिसे भगवान शिव का दूत माना जाता है और यह पूरी यात्रा की अगुवाई करता है।
क्या आम श्रद्धालु Nanda Devi Raj Jat Yatra में शामिल हो सकते हैं?
हाँ, प्रशासनिक दिशा-निर्देशों के अनुसार Common Devotees भी इस यात्रा में भाग ले सकते हैं।
नंदा देवी राजजात यात्रा कितने वर्षों में होती है?
यह यात्रा हर 12 years में एक बार आयोजित की जाती है, इसलिए इसे Himalayan MahaKumbh भी कहा जाता है।
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Uttarakhand
Kedarkantha Trek 2026 : बर्फीले हिमालय में नौसिखियों से लेकर अनुभवी ट्रेकर्स तक का सपना

लोकेशन: केदारकांठा, उत्तरकाशी ज़िला, उत्तराखंड
अगर आप 2026 में हिमालय की पहली “समिट ट्रेक” की तलाश कर रहे हैं—जहाँ बर्फ़, जंगल, खुले बुग्याल, साफ़ आसमान और दमदार शिखर दृश्य एक साथ मिलें—तो Kedarkantha Trek 2026 आपकी सूची में सबसे ऊपर होना चाहिए। यह ट्रेक भारत के उन चुनिंदा ट्रेक्स में है जो नौसिखियों के लिए भी सुरक्षित, संरचित और रोमांचक माने जाते हैं, और अनुभवी ट्रेकर्स के लिए भी उतना ही संतोषजनक अनुभव देते हैं।
Kedarkantha Trek 2026 क्यों है भारत का सबसे लोकप्रिय विंटर ट्रेक?
केदारकांठा को अक्सर “भारत का बेस्ट विंटर ट्रेक” कहा जाता है—और इसके ठोस कारण हैं।
- सर्दियों में खुला रहने वाला शिखर ट्रेक
जब दिसंबर–फरवरी में हिमालय के ज़्यादातर ट्रेक बंद हो जाते हैं, केदारकांठा तब भी ट्रेकर्स का स्वागत करता है। - नौसिखियों के लिए परफेक्ट समिट अनुभव
12,500 फीट की ऊँचाई तक पहुँचने का रोमांच, तकनीकी पर्वतारोहण के बिना। - हर मौसम में अलग रंग
बर्फ़ीली सर्दी, खिले रोडोडेंड्रोन वाला बसंत, हरे-भरे ग्रीष्म और सुनहरा पतझड़—चारों मौसमों में यह ट्रेक अलग कहानी सुनाता है। - 360-डिग्री हिमालयन पैनोरमा
शिखर से स्वर्गारोहिणी, बंदरपूंछ, कालानाग और गंगोत्री रेंज की भव्य झलक।
और पढ़े – केदारकंठा ट्रेक बनाम ब्रह्मताल ट्रेक
Kedarkantha Trek का भूगोल और प्राकृतिक सौंदर्य
केदारकांठा एक स्वतंत्र शिखर (Free-Standing Peak) है। यही वजह है कि ट्रेक के शुरुआती दिनों से ही आपको शिखर दिखाई देता रहता है—जो हर कदम पर मोटिवेशन देता है।
जंगल जो इस ट्रेक को खास बनाते हैं
- चीड़, देवदार, बलूत और मेपल के घने जंगल
- सर्दियों में बर्फ़ से ढकी शाखाएँ और काई—एक परीकथा जैसा दृश्य
- बसंत में पक्षियों की चहचहाहट और रोडोडेंड्रोन के लाल फूल
खुले बुग्याल और कैंपसाइट
- खुजाई, भोजा ढाड़ी, पुखरोला जैसे विस्तृत खुले मैदान
- सूर्यास्त और सूर्योदय के लिए फेमस स्पॉट
- तंबू से बाहर निकलते ही हिमालय की दीवार-सी चोटियाँ

Kedarkantha Trek 2026: हर मौसम का अलग अनुभव
❄️ सर्दी (दिसंबर–फरवरी)
- तापमान: दिन 8–10°C | रात 0 से –10°C
- अनुभव: घुटनों तक बर्फ़, स्नो-कैंपिंग, हार्ड-पैक्ड स्नो पर समिट क्लाइम्ब
- क्यों जाएँ: भारत का #1 विंटर ट्रेक, खासकर पहली बर्फ़ीली समिट के लिए
नोट: 15 दिसंबर से जनवरी के मध्य तक भीड़ अधिक रहती है—अग्रिम बुकिंग ज़रूरी।
🌸 बसंत (मार्च–अप्रैल)
- अनुभव: पिघलती बर्फ़, खिले रोडोडेंड्रोन, साफ़ आसमान
- क्यों जाएँ: फोटोग्राफी और नेचर-लवर्स के लिए बेस्ट
☀️ गर्मी (मई–जून)
- अनुभव: हरे-भरे जंगल, रंगीन जंगली फूल
- क्यों जाएँ: आरामदायक तापमान, कम भीड़
🍁 पतझड़ (मध्य सितंबर–नवंबर)
- अनुभव: सुनहरे-लाल जंगल, क्रिस्टल-क्लियर व्यू
- क्यों जाएँ: सबसे साफ़ समिट व्यू और शांति
Kedarkantha Trek 2026 का पूरा यात्रा कार्यक्रम (दो प्रमुख मार्ग)

📍 कोटगाँव मार्ग (क्लासिक और लोकप्रिय)
दिन 1: देहरादून → कोटगाँव
- दूरी: 195 किमी | समय: 10–11 घंटे
दिन 2: कोटगाँव → खुजाई
- दूरी: 5.3 किमी | समय: ~5 घंटे
- ऊँचाई: 6,400 → 9,460 फीट
दिन 3: खुजाई → भोजा ढाड़ी
- दूरी: 3 किमी | समय: ~3.5 घंटे
दिन 4: भोजा ढाड़ी → केदारकांठा शिखर → खुजाई
- दूरी: 9 किमी | समय: 7–8 घंटे
- समिट ऊँचाई: 12,500 फीट
दिन 5: खुजाई → कोटगाँव
- दूरी: 5.3 किमी | समय: 4–5 घंटे
दिन 6: कोटगाँव → देहरादून
📍 गाईचावां गाँव मार्ग (कम भीड़, ज़्यादा शांत)
दिन 1: देहरादून → गाईचावां
दिन 2: गाईचावां → जुलोटा
दिन 3: जुलोटा → पुखरोला
दिन 4: पुखरोला → शिखर → अखोटी थाच
दिन 5: अखोटी थाच → गाईचावां
दिन 6: गाईचावां → देहरादून
Kedarkantha Trek कितना कठिन है? (Difficulty Analysis)
⛰️ भूभाग
- अंतिम दिन 5 घंटे की लगातार चढ़ाई
- सर्दियों में हार्ड स्नो और खड़ी ढलान
🌦️ मौसम
- अचानक बर्फ़बारी या बारिश ट्रेक को चुनौतीपूर्ण बना सकती है
🧗 ऊँचाई
- 6,400 → 12,500 फीट (लगभग 6,100 फीट गेन)
- AMS का हल्का जोखिम—सही एक्लिमेटाइज़ेशन ज़रूरी
👉 निष्कर्ष: यह ट्रेक Moderate श्रेणी में आता है और सही तैयारी के साथ नौसिखियों के लिए भी सुरक्षित है।
Kedarkantha Trek 2026 के लिए तैयारी कैसे करें?
फिटनेस
- 5 किमी जॉगिंग (30–35 मिनट)
- स्क्वैट्स, लंजेस, प्लैंक्स
- ट्रेक से 4–6 हफ्ते पहले ट्रेनिंग शुरू करें
ज़रूरी गियर
- 5-लेयर विंटर क्लोदिंग
- वाटरप्रूफ ट्रेकिंग शूज़
- ट्रेकिंग पोल, माइक्रोस्पाइक्स (सर्दियों में)
सुरक्षा, आपातकाल और नज़दीकी अस्पताल
- आपात निकास: कोटगाँव, सांकरी, गाईचावां
- नज़दीकी मेडिकल सहायता: मोरी, पुरोला
- गंभीर स्थिति: मसूरी / देहरादून (8–9 घंटे)
Kedarkantha Trek 2026: क्यों इसे अपनी बकेट-लिस्ट में डालें?
- यह सिर्फ़ एक ट्रेक नहीं, पहली समिट की कहानी है
- यहाँ रोमांच है, पर डर नहीं
- प्रकृति है, पर असहजता नहीं
- और सबसे बढ़कर—यह ट्रेक आपको आत्मविश्वास देता है कि आप हिमालय के लिए बने हैं
अगर 2026 में हिमालय आपको बुला रहा है, तो Kedarkantha Trek उसका सबसे खूबसूरत जवाब है।
FAQs
❓ Kedarkantha Trek 2026 कहाँ है?
उत्तर: केदारकांठा ट्रेक उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले में स्थित है। यह गोविंद वन्यजीव विहार क्षेत्र के अंतर्गत आता है और सांकरी, कोटगाँव या गाईचावां गाँव से शुरू होता है।
❓ Kedarkantha Trek 2026 की ऊँचाई कितनी है?
उत्तर: केदारकांठा शिखर की अधिकतम ऊँचाई लगभग 12,500 फीट है।
❓ क्या Kedarkantha Trek 2026 नौसिखियों के लिए सही है?
उत्तर: हाँ। Kedarkantha Trek 2026 को भारत का सबसे लोकप्रिय Beginner-Friendly Winter Trek माना जाता है।
❓ Kedarkantha Trek 2026 कितने दिनों का होता है?
उत्तर: यह ट्रेक आमतौर पर 6 दिनों का होता है, जिसमें देहरादून से आने-जाने का समय शामिल है।
❓ Kedarkantha Trek 2026 का बेस्ट टाइम क्या है?
उत्तर:
- दिसंबर–फरवरी: बर्फ़ और विंटर ट्रेकिंग
- मार्च–अप्रैल: रोडोडेंड्रोन और साफ़ मौसम
- मई–जून: हरियाली
- सितंबर–नवंबर: क्लियर माउंटेन व्यू
(जुलाई–अगस्त में ट्रेक बंद रहता है)
❓ Kedarkantha Trek 2026 कितना कठिन है?
उत्तर: यह ट्रेक Moderate Difficulty श्रेणी में आता है। अंतिम दिन 7–8 घंटे की खड़ी चढ़ाई सबसे चुनौतीपूर्ण होती है।
❓ Kedarkantha Trek 2026 में बर्फ़ कब मिलती है?
उत्तर: आमतौर पर दिसंबर के अंत से मार्च तक पूरे ट्रेक पर बर्फ़ देखने को मिलती है।
❓ Kedarkantha Trek 2026 के लिए फिटनेस कैसी होनी चाहिए?
उत्तर: ट्रेकर्स को 5 किमी जॉगिंग, बेसिक कार्डियो और पैरों की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग पहले से करनी चाहिए।
❓ Kedarkantha Trek 2026 में AMS का खतरा है क्या?
उत्तर: 12,000 फीट से ऊपर जाने पर हल्का AMS हो सकता है, लेकिन सही एक्लिमेटाइज़ेशन से जोखिम कम रहता है।
❓ Kedarkantha Trek 2026 क्यों इतना लोकप्रिय है?
उत्तर:
- भारत का सबसे प्रसिद्ध विंटर ट्रेक
- शुरुआती ट्रेकर्स के लिए पहली समिट
- घने जंगल, खुले बुग्याल और 360° हिमालयन व्यू
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Kedarkantha Trek vs Brahmatal Trek : आपके लिए कौन सा विंटर ट्रेक सबसे बेहतर है?

Kedarkantha Trek vs Brahmatal Trek
उत्तराखंड की हसीन वादियों में जब सर्दियों की चादर बिछती है, तो हर एडवेंचर प्रेमी के मन में एक ही सवाल होता है— केदारकांठा (Kedarkantha) या ब्रह्मताल (Brahmatal)? दोनों ही ट्रेक अपनी खूबसूरती के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं, लेकिन आपकी पसंद और अनुभव के हिसाब से कौन सा ट्रेक “परफेक्ट” है, यह जानना बहुत जरूरी है।
इस ब्लॉग में हम इन दोनों दिग्गज विंटर ट्रेक्स की गहराई से तुलना करेंगे ताकि आप 2026 की अपनी अगली हिमालयी यात्रा का सही फैसला ले सकें।
केदारकांठा ट्रेक (Kedarkantha Trek): विंटर ट्रेकिंग की रानी
केदारकांठा ट्रेक को भारत का सबसे लोकप्रिय विंटर ट्रेक माना जाता है। उत्तरकाशी जिले के गोविंद वन्यजीव अभयारण्य (Govind Wildlife Sanctuary) में स्थित यह ट्रेक अपनी ‘क्लासिक समिट’ (Summit) के लिए जाना जाता है।
मुख्य आकर्षण:
- 360 डिग्री हिमालयी दृश्य: समिट पर पहुँचते ही आपको स्वर्गारोहिणी, बंदरपूंछ और ब्लैक पीक जैसी चोटियों का अद्भुत नज़ारा मिलता है।
- जुडा का तालाब (Juda Ka Talab): चीड़ के घने जंगलों के बीच स्थित यह जमी हुई झील किसी सपने जैसी लगती है।
- शुरुआती लोगों के लिए आसान: अगर आप पहली बार ट्रेकिंग कर रहे हैं, तो यह ट्रेक आपके लिए सबसे सुरक्षित और बेहतरीन अनुभव होगा।

ब्रह्मताल ट्रेक (Brahmatal Trek): झीलों और रिज का जादुई सफर
चमोली जिले में स्थित ब्रह्मताल ट्रेक उन लोगों के लिए है जो भीड़भाड़ से दूर शांति और प्राकृतिक सुंदरता की तलाश में हैं। यह ट्रेक अपनी बर्फीली झीलों और लंबी ‘रिज वॉक’ (Ridge Walk) के लिए मशहूर है।
मुख्य आकर्षण:
- जमी हुई झीलें: यहाँ आपको बेकल ताल और ब्रह्मताल जैसी दो खूबसूरत झीलें देखने को मिलती हैं।
- त्रिशूल और नंदा घुंटी के नज़ारे: इस ट्रेक के दौरान माउंट त्रिशूल और नंदा घुंटी चोटियाँ इतनी करीब महसूस होती हैं कि लगता है आप उन्हें छू लेंगे।
- एकांत और शांति: केदारकांठा के मुकाबले यहाँ भीड़ कम होती है, जो इसे फोटोग्राफर्स और शांति पसंद लोगों की पहली पसंद बनाता है।

Kedarkantha Trek vs Brahmatal Trek : तुलनात्मक तालिका (Comparison Table)
| विशेषता | केदारकांठा ट्रेक (Kedarkantha) | ब्रह्मताल ट्रेक (Brahmatal) |
| अधिकतम ऊंचाई | 12,500 फीट | 12,250 फीट |
| कठिनाई स्तर | आसान से मध्यम (Beginner Friendly) | मध्यम (Moderate) |
| कुल दूरी | लगभग 20 किमी | लगभग 24 किमी |
| समय अवधि | 5 दिन | 6 दिन |
| बेस कैंप | सांकरी (Sankri) | लोहाजंग (Lohajung) |
| सबसे अच्छा समय | दिसंबर से अप्रैल | दिसंबर से मार्च |
| मुख्य अनुभव | समिट क्लाइम्ब और सनराइज | जमी हुई झीलें और रिज वॉक |
गहराई से तुलना: आपको क्या चुनना चाहिए?
1. ट्रेक की कठिनाई और शारीरिक क्षमता
केदारकांठा का रास्ता काफी सुगम है और इसमें चढ़ाव धीरे-धीरे आता है। केवल समिट वाले दिन आपको थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है। वहीं, ब्रह्मताल में आपको ज्यादा दूरी तय करनी होती है और बर्फीले रास्तों पर चलने के लिए थोड़ी ज्यादा स्टैमिना (Stamina) की जरूरत होती है।
2. दृश्यों का अंतर (Landscapes)
केदारकांठा घने देवदार और ओक के जंगलों से घिरा हुआ है। यहाँ की कैंपिंग साइट्स बहुत जादुई होती हैं। दूसरी ओर, ब्रह्मताल में आप जंगलों से बाहर निकलकर ऊंचे ‘रिज’ (पहाड़ की धार) पर चलते हैं, जहाँ से विशाल हिमालयी पर्वतमालाएं आपके साथ-साथ चलती हैं।
3. भीड़ और माहौल
यदि आप नए लोगों से मिलना और कैंपफायर के साथ रौनक पसंद करते हैं, तो केदारकांठा बेस्ट है। लेकिन अगर आप अपनी तन्हाई और पहाड़ों की खामोशी को महसूस करना चाहते हैं, तो ब्रह्मताल की ओर रुख करें।
जरूरी तैयारी और टिप्स (2026 अपडेट)
- रजिस्ट्रेशन: उत्तराखंड सरकार के नियमों के अनुसार अपना ऑनलाइन ई-पास और रजिस्ट्रेशन पहले ही करा लें।
- गियर: विंटर ट्रेक के लिए वाटरप्रूफ ट्रेकिंग शूज, कम से कम 3 लेयर के गर्म कपड़े और माइक्रो-स्पाइक्स (Micro-spikes) साथ रखें।
- फिटनेस: ट्रेक पर जाने से कम से कम 1 महीना पहले कार्डियो एक्सरसाइज शुरू कर दें।
निष्कर्ष (Final Verdict)
- केदारकांठा चुनें यदि: आप पहली बार पहाड़ों पर जा रहे हैं और कम समय में एक महान समिट का अनुभव करना चाहते हैं।
- ब्रह्मताल चुनें यदि: आप पहले एक-दो ट्रेक कर चुके हैं और आपको जमी हुई झीलों और शांत रास्तों से प्यार है।
उत्तराखंड के ये दोनों ही ट्रेक आपको जीवनभर की यादें देंगे। तो आप इस साल कहाँ जा रहे हैं? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं!
आपके पाठकों के मन में केदारकांठा और ब्रह्मताल ट्रेक को लेकर कई सवाल हो सकते हैं। लेख की Google रैंकिंग सुधारने के लिए ये FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न) सेक्शन बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह Google के “People Also Ask” सेक्शन में आने में मदद करता है।
यहाँ आपके आर्टिकल के लिए सबसे महत्वपूर्ण FAQ दिए गए हैं:
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. केदारकांठा और ब्रह्मताल में से कौन सा ट्रेक शुरुआती (Beginners) के लिए बेहतर है?
उत्तर: केदारकांठा ट्रेक शुरुआती लोगों के लिए थोड़ा बेहतर माना जाता है। इसका रास्ता अच्छी तरह से चिह्नित है और चढ़ाई ब्रह्मताल की तुलना में थोड़ी कम थकाऊ है। हालांकि, अगर आपकी फिटनेस अच्छी है, तो आप ब्रह्मताल से भी अपनी शुरुआत कर सकते हैं।
Q2. क्या इन ट्रेक्स पर जाने के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट की जरूरत होती है?
उत्तर: हाँ, उत्तराखंड में उच्च हिमालयी ट्रेक्स के लिए वन विभाग (Forest Department) द्वारा अधिकृत डॉक्टर से हस्ताक्षरित मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट अनिवार्य है। इसके बिना आपको बेस कैंप से आगे जाने की अनुमति नहीं मिलेगी।
Q3. क्या सर्दियों में इन झीलों (Juda Ka Talab या Brahmatal) का पानी पीने लायक होता है?
उत्तर: सर्दियों में ये झीलें पूरी तरह जम जाती हैं। ट्रेक के दौरान गाइड बर्फ पिघलाकर पानी तैयार करते हैं या झरनों के बहते पानी का उपयोग करते हैं। हमेशा क्लोरीन टैबलेट या फिल्टर बोतल साथ रखने की सलाह दी जाती है।
Q4. केदारकांठा या ब्रह्मताल ट्रेक के लिए सबसे अच्छा महीना कौन सा है?
उत्तर: यदि आप भारी बर्फबारी देखना चाहते हैं, तो दिसंबर के अंतिम सप्ताह से फरवरी के मध्य तक का समय सबसे अच्छा है। यदि आप खिले हुए बुरांश (Rhododendron) के फूल देखना चाहते हैं, तो मार्च का महीना उत्तम है।
Q5. क्या इन ट्रेक्स पर मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध है?
उत्तर: सांकरी (केदारकांठा बेस) और लोहाजंग (ब्रह्मताल बेस) में BSNL और Jio का नेटवर्क सीमित रूप से मिलता है। लेकिन जैसे ही आप ट्रेक पर ऊपर चढ़ते हैं, नेटवर्क पूरी तरह चला जाता है। अपने परिवार को पहले ही सूचित कर दें कि आप कुछ दिनों के लिए “ऑफ-ग्रिड” रहेंगे।
Q6. क्या मैं बिना गाइड के केदारकांठा या ब्रह्मताल ट्रेक कर सकता हूँ?
उत्तर: सुरक्षा कारणों और स्थानीय नियमों के अनुसार, उत्तराखंड में बिना स्थानीय गाइड के ट्रेकिंग करना अब प्रतिबंधित और असुरक्षित है। स्थानीय गाइड न केवल रास्ता जानते हैं, बल्कि वे मौसम और आपातकालीन स्थिति में आपकी सुरक्षा भी सुनिश्चित करते हैं।
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Border 2 में किस किरदार मे नज़र आए दिलजीत दोसांझ जाने उस परमवीर चक्र विजेता की विजय गाथा…

Nirmal Jit Singh Sekhon : परमवीर चक्र विजेता भारतीय वायु सेना का एक मात्र अधिकारी
Nirmal Jit Singh Sekhon: 23 जनवरी 2026 को रिलीज हुई फिल्म Border 2 ने 1971 के भारत-पाक युद्ध से जुड़े कई वीरों की कहानियों को दोबारा सामने रखा। इन्हीं में एक नाम था Nirmal Jit Singh Sekhon, जिनका किरदार फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने निभाया। ये भूमिका सिर्फ एक सैनिक की नहीं, बल्कि भारतीय वायुसेना के अद्वितीय साहस और सर्वोच्च बलिदान की कहानी को दर्शाती है।
मुख्य बिंदु
Nirmal Jit Singh Sekhon: वायुसेना के इतिहास का विशेष नाम
Nirmal Jit Singh Sekhon भारतीय वायुसेना में फ्लाइंग ऑफिसर के पद पर तैनात थे। उन्हें अनुशासित, निडर और तेज निर्णय लेने वाले पायलट के रूप में जाना जाता था। देश के लिए उनका योगदान इतना असाधारण रहा कि वे भारतीय वायुसेना के इतिहास में परमवीर चक्र से सम्मानित होने वाले एकमात्र अधिकारी बने।
1971 का युद्ध: जब अकेले आसमान में डट गए सेखों
1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान दिसंबर का महीना चल रहा था। 14 दिसंबर 1971 को श्रीनगर एयरबेस पर अचानक हालात बदल गए। पाकिस्तानी वायुसेना ने हवाई हमले की कोशिश की, जबकि उस समय भारतीय एयरबेस पर सुरक्षा संसाधन बेहद सीमित थे।
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इसी नाजुक स्थिति में Flying Officer Nirmal Jit Singh Sekhon ने बिना किसी हिचक के अपने Gnat फाइटर जेट को उड़ाने का फैसला लिया। ये फैसला आसान नहीं था। सामने कई दुश्मन विमान थे और समर्थन लगभग ना के बराबर था।
Nirmal Jit Singh ने आसमान में अकेले ही मोर्चा संभाला
सेखों ने पीछे हटने के बजाय आसमान में अकेले ही मोर्चा संभाला। उन्होंने दुश्मन विमानों को श्रीनगर एयरबेस के करीब आने से रोकने की कोशिश की और अंतिम क्षण तक लड़ते रहे। ये मुकाबला किसी रणनीतिक जीत से ज्यादा कर्तव्य और साहस का प्रतीक बन गया।
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इस संघर्ष में वे वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन उनका यह बलिदान भारतीय सैन्य इतिहास में अमर हो गया। बाद में भारत सरकार ने उनके अद्वितीय साहस को सम्मान देते हुए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया।

Border 2 में दिलजीत दोसांझ की भूमिका
फिल्म Border 2 में दिलजीत दोसांझ ने Nirmal Jit Singh Sekhon का किरदार निभाया, जिसे दर्शकों ने गंभीर और भावनात्मक रूप में देखा। यह भूमिका उनके अब तक के करियर की सबसे अलग और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में गिनी गई।
फिल्म में दिलजीत का किरदार युद्ध के शोर से ज्यादा उस पल के फैसले पर केंद्रित रहा, जब एक पायलट ने जान की परवाह किए बिना अपने एयरबेस और देश की रक्षा को प्राथमिकता दी।
क्यों खास रहा ये किरदार
- ये किरदार किसी काल्पनिक कहानी पर नहीं, बल्कि वास्तविक इतिहास पर आधारित रहा
- 1971 युद्ध की हवाई लड़ाई का दुर्लभ चित्रण दिखाया गया
- भारतीय वायुसेना के सर्वोच्च बलिदान को सम्मान मिला
- नई पीढ़ी को एक भूले-बिसरे नायक से परिचय कराया गया
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फिल्म और दर्शकों की प्रतिक्रिया
Border 2 के रिलीज के बाद इस किरदार को लेकर खास चर्चा हुई। दर्शकों और समीक्षकों ने माना कि Nirmal Jit Singh Sekhon की कहानी फिल्म का सबसे भावनात्मक और प्रभावशाली हिस्सा रही। दिलजीत दोसांझ के अभिनय को संयमित और सम्मानजनक बताया गया।

निष्कर्ष
Nirmal Jit Singh Sekhon सिर्फ एक युद्ध नायक नहीं थे, बल्कि वह उदाहरण थे कि संकट के समय एक निर्णय इतिहास बन सकता है। Border 2 के जरिए उनकी कहानी एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श में आई और यह याद दिलाया कि 1971 के युद्ध में सिर्फ ज़मीन पर नहीं, बल्कि आसमान में भी भारत के वीरों ने इतिहास रचा था।
Who was Nirmal Jit Singh Sekhon?
Nirmal Jit Singh Sekhon भारतीय वायुसेना के फ्लाइंग ऑफिसर थे, जिन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान श्रीनगर एयरबेस की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। वे भारतीय वायुसेना के एकमात्र अधिकारी हैं जिन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
Why is Nirmal Jit Singh Sekhon famous?
Nirmal Jit Singh Sekhon इसलिए प्रसिद्ध हैं क्योंकि उन्होंने 14 दिसंबर 1971 को दुश्मन वायुसेना के कई विमानों का सामना अकेले किया और अंतिम सांस तक लड़ते हुए देश की रक्षा की।
Did Nirmal Jit Singh Sekhon receive the Param Vir Chakra?
Yes. Nirmal Jit Singh Sekhon को उनके अद्वितीय साहस और बलिदान के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
Is Border 2 based on real war stories?
Yes. Border 2 1971 के भारत-पाक युद्ध से जुड़े वास्तविक सैन्य नायकों और उनके बलिदान पर आधारित फिल्म है।
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