Uttarakhand
उत्तराखंड का गौरवशाली इतिहास: पढ़िए ऋषि-मुनियों से लेकर आज तक की पूरी यात्रा..

उत्तराखंड का इतिहास: देवभूमि की गौरवशाली यात्रा और अनछुए रहस्य (History of Uttarakhand in Hindi)
उत्तराखंड, जिसे हम प्यार से ‘देवभूमि’ (ब्रह्मांड के देवताओं की भूमि) कहते हैं, केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और बर्फीली चोटियों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने हज़ारों साल पुराने गौरवशाली इतिहास के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है। यदि आप History of Uttarakhand को गहराई से समझना चाहते हैं, तो आपको इसके पौराणिक काल से लेकर आधुनिक राज्य गठन के संघर्ष तक की यात्रा करनी होगी।
2025-26 के नए डिजिटल युग में, जहाँ पर्यटक और इतिहास प्रेमी प्रामाणिक जानकारी खोज रहे हैं, यह लेख आपको उत्तराखंड के उन पन्नों से रूबरू कराएगा जो आज भी हिमालय की कंदराओं में जीवंत हैं।
Table of Contents
History of Uttarakhand & Dynasty
1. पौराणिक काल: वेदों और पुराणों में उत्तराखंड
उत्तराखंड का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि मानव सभ्यता। हिंदू धर्मग्रंथों में इस क्षेत्र का वर्णन ‘केदारखंड’ (वर्तमान गढ़वाल) और ‘मानसखंड’ (वर्तमान कुमाऊं) के रूप में मिलता है।
- महाभारत काल: माना जाता है कि महर्षि व्यास ने इसी भूमि पर महाभारत की रचना की थी। पांडवों ने अपने स्वर्गारोहण के लिए इसी हिमालयी मार्ग को चुना था।
- ऋषियों की तपोभूमि: सप्तऋषियों से लेकर आदि शंकराचार्य तक, यह भूमि आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रही है। ऋषिकेश और हरिद्वार को ‘मोक्ष के द्वार’ के रूप में प्राचीन काल से ही मान्यता प्राप्त है।
2. प्राचीन राजवंश: उत्तराखंड के पहले शासक
उत्तराखंड की राजनीतिक नींव प्राचीन राजवंशों द्वारा रखी गई थी। यहाँ के प्रमुख ऐतिहासिक शासनकाल निम्नलिखित हैं:
कुणिन्द राजवंश (Kuninda Dynasty)
यह उत्तराखंड पर शासन करने वाला पहला महत्वपूर्ण राजवंश माना जाता है। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में कुणिन्द शासकों का दबदबा था। उनके द्वारा जारी किए गए तांबे और चांदी के सिक्के आज भी इतिहासकारों के लिए शोध का विषय हैं।
कत्यूरी राजवंश (Katyuri Dynasty)
मध्यकाल के दौरान, कत्यूरी राजाओं ने उत्तराखंड को एक सूत्र में पिरोने का काम किया। इन्होंने अपनी राजधानी जोशीमठ से बाद में बैजनाथ (बागेश्वर) स्थानांतरित की।
- योगदान: उत्तराखंड के प्रसिद्ध मंदिर समूह, जैसे जागेश्वर और बैजनाथ, कत्यूरी वास्तुकला के बेजोड़ उदाहरण हैं।
3. मध्यकालीन इतिहास: चंद और पंवार वंश का उदय
मध्यकाल में उत्तराखंड दो प्रमुख हिस्सों में विभाजित हो गया: कुमाऊं में चंद वंश और गढ़वाल में पंवार (परमार) वंश।
| कालखंड | क्षेत्र | राजवंश | प्रमुख शासक |
| 700 – 1790 ई. | कुमाऊं | चंद राजवंश | सोम चंद, रुद्र चंद, बाज बहादुर चंद |
| 888 – 1949 ई. | गढ़वाल | पंवार राजवंश | कनकपाल, अजयपाल, सुदर्शन शाह |
अजयपाल का गढ़वाल एकीकरण
पंवार वंश के राजा अजयपाल को ‘गढ़वाल का अशोक’ कहा जाता है। उन्होंने 52 अलग-अलग गढ़ों (किलों) को जीतकर एक विशाल गढ़वाल राज्य की स्थापना की और श्रीनगर को अपनी राजधानी बनाया।
4. गोरखा शासन और ब्रिटिश काल: एक कठिन दौर
18वीं शताब्दी के अंत में, नेपाल के गोरखाओं ने कुमाऊं (1790) और फिर गढ़वाल (1804) पर आक्रमण कर अपना क्रूर शासन स्थापित किया, जिसे स्थानीय भाषा में ‘गोरख्याणी’ कहा जाता है।
संगौली की संधि (Treaty of Sagauli)
गोरखाओं के अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए राजा सुदर्शन शाह ने अंग्रेजों से मदद मांगी। 1815 में ब्रिटिश सेना और गोरखाओं के बीच युद्ध हुआ, जिसके बाद संगौली की संधि हुई। इसके परिणामस्वरूप:
- कुमाऊं और पूर्वी गढ़वाल अंग्रेजों के अधीन (ब्रिटिश गढ़वाल) आ गया।
- पश्चिमी गढ़वाल ‘टिहरी रियासत’ के रूप में राजा के पास रहा।
5. उत्तराखंड राज्य आंदोलन: बलिदान की गाथा
स्वतंत्रता के बाद, उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा बना। लेकिन भौगोलिक विषमताओं और विकास की अनदेखी के कारण एक अलग राज्य की मांग उठने लगी।
- 1994 के आंदोलन: खटीमा, मसूरी और मुजफ्फरनगर (रामपुर तिराहा) कांड ने इस आंदोलन को और तेज कर दिया। महिलाओं और युवाओं ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
- 9 नवंबर 2000: लंबे संघर्ष के बाद भारत के 27वें राज्य के रूप में ‘उत्तरांचल’ का गठन हुआ, जिसे 2007 में आधिकारिक रूप से ‘उत्तराखंड’ नाम दिया गया।
6. ऐतिहासिक पर्यटन स्थल जो आपको जरूर देखने चाहिए
यदि आप उत्तराखंड के इतिहास को करीब से देखना चाहते हैं, तो इन स्थानों की यात्रा अवश्य करें:
- कालसी (देहरादून): यहाँ सम्राट अशोक का शिलालेख है जो पाली भाषा में लिखा गया है।
- जागेश्वर धाम (अल्मोड़ा): 100 से अधिक मंदिरों का समूह जो कत्यूरी काल की याद दिलाता है।
- टिहरी बांध: पुरानी टिहरी का गौरवशाली इतिहास अब इस झील के नीचे समाहित है।
- बद्रिकाश्रम और केदारनाथ: आदि शंकराचार्य द्वारा पुनर्जीवित किए गए सनातन धर्म के स्तंभ।
क्यों खास है उत्तराखंड का इतिहास?
उत्तराखंड का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के साथ मनुष्य के सामंजस्य और अपनी पहचान के लिए किए गए संघर्ष की मिसाल है। History of Uttarakhand in Hindi को पढ़ना हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है।
2025 में, जब हम एक विकसित उत्तराखंड की ओर बढ़ रहे हैं, हमें अपनी ऐतिहासिक धरोहरों को संजोने की आवश्यकता है। यह भूमि न केवल तीर्थयात्रियों के लिए है, बल्कि उन शोधकर्ताओं के लिए भी है जो प्राचीन वास्तुकला और हिमालयी संस्कृति को समझना चाहते हैं।
2025-26 अपडेटेड : उत्तराखंड के इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण FAQs
1. उत्तराखंड का प्राचीन नाम क्या है?
पौराणिक ग्रंथों और वेदों में उत्तराखंड के दो प्रमुख भाग बताए गए हैं। गढ़वाल क्षेत्र को ‘केदारखंड’ और कुमाऊं क्षेत्र को ‘मानसखंड’ के नाम से जाना जाता था। पूरे क्षेत्र को संयुक्त रूप से ‘ब्रह्मपुर’ या ‘खसदेश’ भी कहा गया है।
2. उत्तराखंड राज्य का गठन कब हुआ?
उत्तराखंड राज्य का गठन 9 नवंबर 2000 को हुआ था। यह भारत का 27वां राज्य बना। शुरुआत में इसका नाम ‘उत्तरांचल’ था, जिसे 1 जनवरी 2007 को बदलकर ‘उत्तराखंड’ कर दिया गया।
3. गढ़वाल के 52 गढ़ों को किसने एकीकृत किया था?
गढ़वाल के छोटे-छोटे 52 गढ़ों (किलों) को पंवार वंश के 37वें राजा अजयपाल ने 14वीं शताब्दी के अंत में जीतकर एक अखंड गढ़वाल राज्य की स्थापना की थी। इसी कारण उन्हें ‘गढ़वाल का अशोक’ कहा जाता है।
4. उत्तराखंड में ‘गोरख्याणी’ शासन क्या था?
1790 (कुमाऊं) और 1804 (गढ़वाल) में नेपाल के गोरखाओं ने इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था। उनके शासनकाल को स्थानीय लोग ‘गोरख्याणी’ कहते हैं, जो अपने कठोर करों और दमनकारी नीतियों के कारण अत्यंत क्रूर माना जाता था।
5. चिपको आंदोलन (Chipko Movement) का इतिहास क्या है?
यह उत्तराखंड का एक विश्व प्रसिद्ध पर्यावरण संरक्षण आंदोलन है। इसकी शुरुआत 1973 में चमोली जिले के ‘रेणी गांव’ से हुई थी। गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाओं ने पेड़ों को कटने से बचाने के लिए उनसे चिपक कर विरोध प्रदर्शन किया था।
6. उत्तराखंड की पहली राजधानी कहाँ थी?
प्राचीन काल में कत्यूरी राजवंश की राजधानी जोशीमठ थी, जिसे बाद में कत्यूर घाटी (बैजनाथ) स्थानांतरित किया गया। मध्यकाल में कुमाऊं की राजधानी अल्मोड़ा और गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर रही। वर्तमान में देहरादून इसकी शीतकालीन और गैरसैंण ग्रीष्मकालीन राजधानी है।
7. कुमाऊं में चंद राजवंश की स्थापना किसने की थी?
इतिहासकारों के अनुसार, कुमाऊं में चंद वंश की नींव सोम चंद ने रखी थी। इस राजवंश ने कुमाऊं में कला, संस्कृति और हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
8. संगौली की संधि (Treaty of Sagauli) क्या थी?
यह संधि 1815 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के गोरखा राजा के बीच हुई थी। इस संधि के बाद गोरखाओं को उत्तराखंड छोड़ना पड़ा और यहाँ ब्रिटिश शासन (ब्रिटिश गढ़वाल/कुमाऊं) व टिहरी रियासत का उदय हुआ।
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उत्तराखंड BJP में कांग्रेसियों का बोलबाला, धामी कैबिनेट में आधे से ज्यादा मंत्री पूर्व कांग्रेसी, कार्यकर्ताओं की बढ़ेगी नाराजगी ?

Uttarakhand Politics: उत्तराखंड में कैबिनेट विस्तार हो गया है और आज सीएम धामी ने विभागों का भी बंटवारा कर दिया है। पहले जहां कैबिनेट विस्तार ना होने को लेकर चर्चाएं हो रहीं थी तो वहीं अब चर्चाएं धामी कैबिनेट में पूर्व कांग्रेसियों की संख्या को लेकर हो रही है।
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उत्तराखंड BJP में कांग्रेसियों का बोलबाला
उत्तराखंड की सियासत में इन दिनों विकास की चर्चाएं कम और गोत्र की ज्यादा हो रहीं हैं। आप सोच रहे होंगे कि ये गोत्र कौन सा है तो ये गोत्र है कांग्रेस का। हाल ही में धामी कैबिनेट ने अपना कोरम पूरा करते हुए मंत्रिमंडल के पांच रिक्त पदों को भर लिया। जिस पर विकास की बातें कम गोत्र की बातें ज्यादा हो रही हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने मुख्यमंत्री धामी का शुक्रिया अदा किया। अपने बयान में गणेश गोदियाल ने कहा कि मुख्यमंत्री धामी कांग्रेस गोत्र के नेताओं का खूब ख्याल रख रहे हैं।

धामी कैबिनेट में आधे से ज्यादा मंत्री पूर्व कांग्रेसी
दरअसल धामी कैबिनेट में कांग्रेस छोड़ बीजेपी में आए मंत्रियों की संख्या के कारण ये चर्चाएं हो रही हैं। हाल ही में कैबिनेट विस्तार के बाद बनाए गए पांच मंत्रियों में से तीन मंत्री कांग्रेस गोत्र के बनाए गए हैं। यानी कि वो विधायक पहले कांग्रेस में थे और अब बीजेपी में आ गए हैं।
जिसके बाद अब धामी कैबिनेट में अच्छा खासा दबदबा कांग्रेस गोत्र के मंत्रियों का हो गया है। इनकी संख्या धामी कैबिनेट में 7 हो गई है। इस पर तंज कसते हुए कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने चुटकी ली है। उन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं पर तंज करते हुए कहा कि वो इसी तरह दरी बिछाने का काम जारी रखें। सीटें और बड़े पद दूसरे दलों से आए नेता ले जाएंगे।

मथुरा दत्त जोशी हरक रावत के गोत्र पर उठाए सवाल
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के इस बयान पर कांग्रेस को छोड़कर भाजपा में शामिल हुए मथुरादत जोशी ने पलटवार किया है। मथुरा दत्त जोशी ने कहा कि प्रीतम सिंह, हरक सिंह रावत और यशपाल आर्य किस गोत्र के हैं वो स्पष्ट करें। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भाजपा ने किसी पाकिस्तानी को तो मंत्री नहीं बनाया।
धामी कैबिनेट में 12 में सात मंत्री पूर्व कांग्रसी
धामी सरकार में अब ऐसे नेताओं की संख्या बढ़ गई है, जिनकी राजनीतिक शुरुआत कभी कांग्रेस से हुई थी। हाल ही में कैबिनेट में शामिल किए गए पांच विधायकों में से केवल मदन कौशिक और खजान दास का राजनीतिक आधार पूरी तरह भाजपा से जुड़ा रहा है। वहीं, भरत सिंह चौधरी, राम सिंह कैड़ा और प्रदीप बत्रा पहले कांग्रेस से जुड़े रहे हैं, हालांकि ये लंबे समय से भाजपा में सक्रिय हैं।
अगर पहले से मौजूद मंत्रियों पर नजर डालें, तो सतपाल महाराज, सुबोध उनियाल, सौरभ बहुगुणा और रेखा आर्य जैसे नाम भी ऐसे हैं, जिनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि कांग्रेस से रही है, लेकिन वर्तमान में वे भाजपा का हिस्सा हैं।
Dehradun
23 मार्च को देहरादून धामी सरकार का “चार साल बेमिसाल” कार्यक्रम, ये रूट रहेंगे डायवर्ट, देखें ट्रैफिक प्लान

DEHRADUN ROOT PLAN 23 MARCH: 23 मार्च को देहरादून में ट्रैफिक अलर्ट, जानें नया रूट प्लान
DEHRADUN ROOT PLAN 23 MARCH: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के परेड़ ग्राउंड में 23 मार्च को धामी सरकार के चार साल पूरे होने पर कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है. परेड ग्राउंड में आयोजित “चार साल बेमिसाल” कार्यक्रम को देखते हुए ट्रैफिक पुलिस ने व्यापक रूट प्लान तैयार किया है.
मुख्य बिंदु
घर से निकलने से पहले देख लें रूट प्लान
🔹 1. मसूरी और राजपुर रोड से आने वाले वाहन
- सबसे पहले, इन वाहनों को मसूरी डायवर्जन से डायवर्ट किया जाएगा।
- इसके बाद रूट रहेगा: ग्रेट वैल्यू → बहल चौक → सर्वे चौक → कन्वेंट तिराहा।
- कन्वेंट तिराहे पर यात्रियों को उतारा जाएगा (ड्रॉप प्वाइंट)।
- वहीं, वाहनों की पार्किंग बन्नू स्कूल में सुनिश्चित की गई है।
- इसके अतिरिक्त, आईआरडीटी (सर्वे चौक के पास) को पिकअप प्वाइंट बनाया गया है।
🔹 2. विकासनगर–चकराता से आने वाले वाहन
- इन वाहनों को बल्लूपुर चौक से शहर में प्रवेश कराया जाएगा।
- इसके बाद रूट रहेगा: किशन नगर चौक → बिंदाल → घंटाघर → दर्शन लाल चौक → लैंसडाउन चौक।
- लैंसडाउन चौक पर यात्रियों को ड्रॉप किया जाएगा।
- इसके बाद वाहनों को बन्नू स्कूल में पार्क किया जाएगा।
- कनक चौक को पिकअप प्वाइंट के रूप में तय किया गया है।
🔹 3. रुड़की–आईएसबीटी से आने वाले वाहन
- इन वाहनों का रूट रहेगा: आईएसबीटी → कारगी चौक → पुरानी बाईपास चौकी → धर्मपुर → बुद्धा चौक।
- बुद्धा चौक पर यात्रियों को उतारा जाएगा।
- पार्किंग के लिए रेसकोर्स मैदान निर्धारित किया गया है।
- साथ ही, बुद्धा चौक को ही पिकअप प्वाइंट बनाया गया है।
🔹 4. रायपुर से आने वाले वाहन
- इन वाहनों को चूना भट्टा से डायवर्ट किया जाएगा।
- इसके बाद उन्हें आईआरडीटी (सर्वे चौक के पास) तक लाया जाएगा।
- यहां यात्रियों को ड्रॉप करने के बाद वाहन ईसी रोड से बन्नू स्कूल में पार्क किए जाएंगे।
- पिकअप प्वाइंट भी आईआरडीटी (सर्वे चौक के पास) ही रहेगा।
🔹 5. डोईवाला से आने वाले वाहन
- इनका रूट होगा: रिस्पना → धर्मपुर → सीएमआई → बुद्धा चौक → लैंसडाउन चौक।
- यहां यात्रियों को ड्रॉप किया जाएगा।
- लैंसडाउन चौक के आसपास वन-साइड पार्किंग की व्यवस्था की गई है।
- पिकअप प्वाइंट: लैंसडाउन चौक।
🔹 6. रायपुर और सहस्त्रधारा रोड से आने वाले वाहन
- इन वाहनों को सहस्त्रधारा क्रॉसिंग से डायवर्ट किया जाएगा।
- आगे का रूट: सर्वे चौक → कन्वेंट तिराहा।
- कन्वेंट तिराहे पर ड्रॉप किया जाएगा।
- पार्किंग के लिए रेसकोर्स और बन्नू स्कूल निर्धारित हैं।
- पिकअप प्वाइंट: कन्वेंट तिराहा।
🚖 7. विक्रम (शेयर ऑटो) के लिए डायवर्जन व्यवस्था
- रायपुर रूट (नंबर 2): सभी विक्रम सहस्त्रधारा क्रॉसिंग से वापस भेजे जाएंगे।
- धर्मपुर रूट (नंबर 3): विक्रमों को तहसील चौक → दून चौक → एमकेपी चौक की ओर मोड़ा जाएगा।
- आईएसबीटी रूट (नंबर 5) और कांवली रूट (नंबर 8): रेलवे गेट से ही वापस भेज दिए जाएंगे।
- प्रेमनगर रूट: प्रभात कट से डायवर्ट किया जाएगा।
- राजपुर रूट: ग्लोब चौक → पैसिफिक तिराहा → बैनी बाजार होते हुए वापस राजपुर रोड भेजा जाएगा।
🚌 8. सिटी बसों के लिए ट्रैफिक प्लान
- आईएसबीटी से राजपुर रोड जाने वाली बसें: दर्शन लाल चौक → घंटाघर होते हुए जाएंगी।
- रिस्पना से आने वाली बसें: तहसील चौक से वापस दून चौक → एमकेपी चौक → आराघर की ओर मोड़ी जाएंगी।
- रायपुर रोड की बसें: सहस्त्रधारा क्रॉसिंग → आईटी पार्क → राजपुर रोड → घंटाघर के रास्ते जाएंगी।
🅿️ 9. पार्किंग व्यवस्था
- बसों के लिए पार्किंग:
- गुरुद्वारा ग्राउंड (रेसकोर्स)
- रेंजर्स ग्राउंड
- गुरु नानक स्कूल ग्राउंड
- कार और दोपहिया वाहनों के लिए पार्किंग
- रेंजर्स ग्राउंड
- काबुल हाउस
- परेड ग्राउंड का खेल मैदान
🚧 10. बैरियर और सुरक्षा व्यवस्था
- ट्रैफिक कंट्रोल के लिए आउटर और इनर मिलाकर कुल 9 बैरियर लगाए जाएंगे।
🔸 आउटर बैरियर प्वाइंट:
- ईसी रोड (सर्वे चौक)
- मनोज क्लिनिक
- बुद्धा चौक
- दर्शन लाल चौक
- ओरियंट चौक
- पैसिफिक तिराहा
🔸 इनर बैरियर प्वाइंट:
- रोजगार तिराहा
- कनक चौक
- डूंगा हाउस
- लैंसडाउन चौक
- कन्वेंट तिराहा
🚶 11. आम जनता के लिए विशेष निर्देश
- सबसे महत्वपूर्ण बात, इनर बैरियर से आगे केवल पासधारक और वीवीआईपी वाहन ही जा सकेंगे।
- आम नागरिकों को निर्धारित ड्रॉप प्वाइंट पर उतरकर पैदल कार्यक्रम स्थल तक जाना होगा।
- प्रवेश के लिए पवेलियन ग्राउंड और बीजेपी कार्यालय के पास बनाए गए गेट का उपयोग करना होगा।
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बड़ी खबर : सीएम धामी ने किया विभागों का बंटवारा, जानें किसके हिस्से आया कौन सा विभाग ?

Uttarakhand Politics : मुख्यमंत्री धामी ने बांटे विभाग, जानें किसे मिला कौन सा विभाग ?
Uttarakhand Politics : मुख्यमंत्री ने मंत्रिमंडल विस्तार के बाद मंत्रियों के बीच विभागों का बहुप्रतीक्षित बंटवारा कर दिया है। हाल ही में पाँच नए मंत्रियों के शपथ ग्रहण के बाद किए गए।
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सीएम धामी ने किया विभागों का बंटवारा
सीएम धामी ने विभागों का बंटवारा कर दिया है। इस आवंटन में मुख्यमंत्री ने कई महत्वपूर्ण और संवेदनशील प्रशासनिक विभाग अपने पास ही रखे हैं। अब तक मुख्यमंत्री के पास 35 से अधिक विभागों का दायित्व था।
जारी सूची के अनुसार मुख्यमंत्री सामान्य प्रशासन, गृह, कार्मिक, सतर्कता, नियुक्ति एवं प्रशिक्षण तथा सूचना एवं जनसंपर्क जैसे प्रमुख विभाग खुद देखेंगे। इन विभागों को शासन संचालन की रीढ़ माना जाता है, जिनके माध्यम से प्रशासनिक फैसलों और कानून-व्यवस्था पर सीधा नियंत्रण सुनिश्चित किया जाता है।

नवनियुक्त मंत्रियों में किसके हिस्से आया कौन सा विभाग ?
सीएम धामी ने इन 25 विभागों के अलावा विभागों का बंटवारा मंत्रियों के बीच करते हुए उन्हें उनके-उनके दायित्व सौंपे गए हैं। ताकि विभागीय कार्यों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो सके। सूत्रों के अनुसार इस नए बंटवारे से कार्यों में बेहतर समन्वय स्थापित होगा और विकास योजनाओं को तेजी से धरातल पर उतारा जा सकेगा।
हाल ही में किया गया था कैबिनेट का विस्तार
बता दें कि हाल ही में मुख्यमंत्री धामी ने कैबिनेट का विस्तार करते हुए विधायक खजान दास, मदन कौशिक, भरत सिंह चौधरी, प्रदीप बत्रा और राम सिंह कैड़ा को मंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी है। दरअसल, मंत्रिमंडल में पाँच पद लंबे समय से रिक्त चल रहे थे, जिनमें तीन पद पहले से खाली थे, एक पद पूर्व मंत्री चंदन राम दास के निधन के बाद रिक्त हुआ था, जबकि एक पद प्रेम चंद अग्रवाल के इस्तीफे के कारण खाली हुआ। इन परिस्थितियों में संबंधित विभागों का दायित्व भी मुख्यमंत्री के पास ही था।

ये बंटवारा संतुलन साधने की कोशिश
राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से ये बंटवारा संतुलन साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन के साथ-साथ प्रशासनिक दक्षता को ध्यान में रखते हुए विभागों का पुनर्गठन किया गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री द्वारा प्रमुख प्रशासनिक विभाग अपने पास रखना एक रणनीतिक कदम है, जिससे शासन की मुख्य कमान उनके नियंत्रण में बनी रहेगी, वहीं अन्य विभाग मंत्रियों को सौंपकर कार्यों का प्रभावी वितरण सुनिश्चित किया गया है।
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