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दीपावली क्यों मनाते हैं? जानिए इस पर्व की अद्भुत कहानी….

हिंदी समाचार में आपका स्वागत है! आज हम चर्चा करेंगे दीपावली के त्योहार के महत्व और इसे मनाने के कारणों के बारे में। यह त्योहार भारत में सबसे प्रिय और लोकप्रिय त्योहारों में से एक है।
दीपावली का अर्थ
दीपावली, जिसे दीपों का त्योहार भी कहा जाता है, हर साल कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। यह त्योहार अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का प्रतीक है।
रामायण से जुड़ी परंपरा
दीपावली क्यों मनाया जाता है इसका प्रमुख कारण है रामायण की कथा। मान्यता है कि भगवान श्रीराम, माता सीता और भाई लक्ष्मण के अयोध्या लौटने के उपलक्ष्य में यह त्योहार मनाया जाता है। जब श्रीराम 14 वर्षों का वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे, तब नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया।
देवी लक्ष्मी का पूजन
दीपावली के दौरान माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन माता लक्ष्मी घरों में आती हैं और समृद्धि व खुशहाली लेकर आती हैं। लोग अपने घरों की सफाई करते हैं और उन्हें दीपों से सजाते हैं ताकि मां लक्ष्मी का स्वागत किया जा सके।
आतिशबाजी और मिठाइयाँ
दीपावली पर आतिशबाजी और मिठाइयाँ बांटने की परंपरा भी है। लोग एक-दूसरे को मिठाइयाँ और उपहार देते हैं, जिससे प्रेम और भाईचारे की भावना को बढ़ावा मिलता है।
समाजिक और सांस्कृतिक महत्व
दीपावली का त्योहार सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। यह परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर जश्न मनाने का एक अवसर है, जो हमें एकता और सामंजस्य का संदेश देता है।
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बेटी पैदा होने से नाराज हुआ पिता, 15 दिन की नवजात बच्ची को जहर देकर उतारा मौत के घाट

Karnataka : देश में जहां एक ओर नवरात्रि का पावन पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। तो वहीं कर्नाटक से शर्मसार कर देने वाली खबर सामने आई है। यहां बेटी पैदा होने से नाराज एक पिता ने 15 दिन की मासूम को जहर देकर मौत के घाट उतार दिया।
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बेटी पैदा होने से नाराज पिता ने अपनी ही बेटी को मार डाला
कर्नाटक के बेलगावी जिले के उक्कड़ गांव से मानवता को शर्मसार करने नाली घटना सामने आई है। यहां एक शख्स ने अपनी ही 15 दिन की बेटी को जहर देकर मार डाला। जब इस मामले की जांच हुई तो सामने आया कि बेटे की चाहत में वो अपनी ही बेटी का दुश्मन बन गया था। इसलिए उसने नवजात मासूम को मार डाला।
दूध पीने वाली बोतल के ऊपरी हिस्से में लगाया जहर
मिली जानकारी के मुताबिक 17 मार्च को आरोपी भीमराय चिप्पडी उक्कड़ गांव में अपने ससुराल पहुंचा। जहां वो अपनी पत्नी और नवजात बच्ची से मिलने के लिए पहुंचा था। दिन में भारी बारिश हो रही थी जिस कारण बच्ची की मां सो रही थी। इसी मौके का फायदा उठाकर उसने बच्ची की दूध की बोतल के ऊपरी हिस्से पर जहर लगा दिया और उसे पिला दिया।

लड़की होने के कारण मासूम की हत्या से सनसनी
बच्ची के दूध पीते ही जहर उसके शरीर में फैलने लगा जिस से वो जोर-जोर से रोने लगी। जिस कारण मां की नींद खुल गई। जैसे ही उसने बच्ची के मुंह से झाग निकलता हुआ देखा तो आरोपी भीमराय वहां से फरार हो गया। मासूम ने रोते-रोते मां की गोद में ही दम तोड़ दिया। इस घटना के बाद से इलाके में हड़कंप मच गया है।
पुलिस कमिश्नर भूषण बोरसे के अनुसार, आरोपी भीमराय अपनी पत्नी शीला पर लगातार ये दबाव डाल रहा था कि वह नवजात बच्ची को मायके में छोड़कर अकेले उसके साथ घर लौट आए। उसे बेटी का जन्म स्वीकार नहीं था। शुरुआती जांच में सामने आया है कि मासूम की हत्या सिर्फ इसलिए की गई, क्योंकि वो लड़की थी।
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Navratri day 2 : ऐसे करें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, बदल जाएगी आपकी किस्मत!, ये भोग चढ़ाने से मां हो जाएंगी खुश

chaitra navratri day 2 पर होती है मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, जानें पूजा विधि और भोग की हर जानकारी
chaitra navratri day 2 : नवरात्रि के दूसरे दिन मां मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। नवरात्रि के नौ स्वरूपों में देवी ब्रह्मचारिणी का स्थान दूसरा है, जो तप, साधना और संयम का प्रतीक है।
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नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को है समर्पित
‘ब्रह्मचारिणी’ शब्द दो भागों से मिलकर बना है—‘ब्रह्म’, जिसका अर्थ कठोर तपस्या से है, और ‘चारिणी’, जिसका मतलब आचरण या जीवनशैली से होता है। यानी ये स्वरूप उस शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जो तप और अनुशासन के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
ऐसे करें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा
मांं ब्रह्मचारिणी की पूजा के लिए सबसे पहले मंदिर को साफ कर लें और मां की मूर्ति को स्थापित करें। पूजा के दौरान पीले या सफेद कपड़े पहनें। इसके बाद मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर, पंचामृत और मिश्री जैसी चीजें अर्पित करें। मां का मंत्र और व्रत कथा पढ़ने के बाद आरती करें।

मां ब्रह्मचारिणी की व्रत कथा (Maa Brahmacharini Vrat Katha )
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी पार्वती ने दक्ष प्रजापति के घर ब्रह्मचारिणी रूप में जन्म लिया। उनका यह स्वरूप अत्यंत सरल, तपस्विनी और संत समान माना जाता है। बचपन से ही उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने का संकल्प लिया और इसके लिए कठोर तपस्या करने का निश्चय किया।
देवी ने अपनी साधना को इतना दृढ़ बनाया कि हजारों वर्षों तक तप में लीन रहीं। तपस्या के दौरान उन्होंने मौसम की कठोर परिस्थितियों—भीषण गर्मी, सर्दी और वर्षा—को भी अपने संकल्प के आगे कमजोर नहीं पड़ने दिया। ऐसा कहा जाता है कि प्रारंभ में देवी केवल फल, फूल और बेलपत्र ग्रहण कर जीवित रहीं।

ब्रह्मचारिणी माता को अर्पणा भी है कहा जाता
जब उनका तप और अधिक कठोर हुआ, तो उन्होंने भोजन और जल तक का त्याग कर दिया। यहां तक कि पत्तों का सेवन भी छोड़ दिया, जिसके कारण उनका एक नाम ‘अर्पणा’ भी प्रसिद्ध हुआ। उनकी इस अटूट भक्ति और कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर अंततः भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। मां ब्रह्मचारिणी का यह स्वरूप हमें धैर्य, त्याग और दृढ़ निश्चय की शक्ति का संदेश देता है।
मां ब्रह्मचारिणी को बेहद प्रिय हैं ये भोग
नवरात्रि के इस दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा सफेद वस्त्र धारण करके करना शुभ माना जाता है। साथ ही सफेद रंग से जुड़ी चीजों का भोग अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन खास तौर पर चीनी, उससे बनी मिठाइयां या पंचामृत का भोग लगाना अत्यंत शुभ फल देने वाला माना जाता है। पंचामृत एक पवित्र प्रसाद है, जिसे गाय का दूध, दही, शहद, देसी घी और चीनी से तैयार किया जाता है।

प्रसाद के लिए पंचामृत बनाने की विधि
- 1. सबसे पहले अपने हाथ अच्छी तरह से धो लें और साफ बर्तन का उपयोग करें।
- 2. एक साफ कटोरे में एक कटोरी गाय का दूध डालें।
- 3. अब इसमें आधी कटोरी दही मिलाएं और हल्के से चलाएं।
- 4. इसके बाद 1 टीस्पून शहद और 1 टीस्पून देसी घी डालें।
- 5. सभी सामग्री को अच्छे से मिलाएं, ताकि मिश्रण एकसार हो जाए।
- 6. सबसे आखिर में 1 चम्मच चीनी डालकर अच्छी तरह घोल लें। अब आपका पवित्र पंचामृत तैयार है
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हिंदू नववर्ष 2026 आज से शुरू, इस साल 12 नहीं होंगे 13 महीने, जानें ये शुभ संकेत या अशुभ

Hindu Nav Varsh 2026 : सनातन परंपरा में हिंदू नववर्ष का विशेष महत्व माना जाता है। प्रत्येक वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ होता है और इसी दिन से नए साल की शुरुआत भी मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी तिथि पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना आरंभ की थी। इस वर्ष भी आज से हिंदू नववर्ष का आगमन हो चुका है।
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आज से शुरू हुआ हिंदू नववर्ष 2026
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिस दिन हिंदू नववर्ष प्रारंभ होता है, उस दिन का स्वामी ग्रह पूरे वर्ष का राजा माना जाता है। इस बार नववर्ष गुरुवार को शुरू हुआ है, जो बृहस्पति देव का दिन होता है, इसलिए इस साल के राजा गुरु बृहस्पति माने जा रहे हैं। वहीं, ग्रहों के सेनापति के रूप में मंगल का प्रभाव रहेगा।
यह नववर्ष विक्रम संवत 2083 के रूप में जाना जाएगा और इसे ‘रौद्र संवत्सर’ कहा जा रहा है। ऐसे में अब जानना दिलचस्प होगा कि यह संवत्सर लोगों के जीवन, देश और दुनिया के लिए कैसा प्रभाव लेकर आएगा।
‘रौद्र संवत्सर’ को लेकर ये हैं भविष्यवाणी
इस वर्ष हिंदू नववर्ष 19 मार्च से शुरू होकर 7 अप्रैल 2027 तक रहेगा। ज्योतिष के अनुसार ‘रौद्र संवत्सर’ को उथल-पुथल और चुनौतियों वाला समय माना जाता है। माना जाता है कि ऐसा संवत्सर लगभग 60 साल पहले 1966 के आसपास भी आया था।

देश की राजनीति में देखने को मिल सकते हैं बदलाव
इस दौरान वैश्विक और देश की राजनीति में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। कुछ बड़े फैसले, नेतृत्व परिवर्तन और महत्वपूर्ण घटनाएं संभव हैं। भारत में नीतिगत स्तर पर अहम निर्णय लिए जा सकते हैं। इसके साथ ही मौसम में अस्थिरता के कारण प्राकृतिक आपदाओं और खेती पर असर पड़ने की आशंका है। जिससे महंगाई और आर्थिक उतार-चढ़ाव भी बढ़ सकते हैं। वहीं पड़ोसी देशों के साथ तनाव बढ़ने की संभावनाएं भी जताई गई है।
इस साल 12 नहीं होंगे 13 महीने, जानें ये शुभ संकेत या अशुभ
इस वर्ष के हिंदू नववर्ष की एक खास बात ये है कि इसमें सामान्य 12 महीनों की जगह 13 महीने होंगे। इसका कारण ज्येष्ठ माह में अधिकमास का जुड़ना है। अधिकमास को पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है, जिसे धार्मिक दृष्टि से बेहद पुण्यदायी माना जाता है।
जब किसी माह में अधिकमास जुड़ता है, तो उसकी तिथियों का क्रम थोड़ा अलग हो जाता है। पहले उस माह का कृष्ण पक्ष आता है, फिर अधिकमास का शुक्ल पक्ष 15 दिनों तक चलता है। इसके बाद अधिकमास का कृष्ण पक्ष होता है, और अंत में मुख्य माह का शुक्ल पक्ष पूरा होता है।

इस बार ज्येष्ठ माह के साथ अधिकमास जुड़ रहा है। इसकी शुरुआत 2 मई से ज्येष्ठ के कृष्ण पक्ष से होगी। इसके बाद 17 मई से अधिकमास का शुक्ल पक्ष आरंभ होगा, जो 31 मई को अधिक पूर्णिमा के साथ समाप्त होगा। फिर अधिकमास का कृष्ण पक्ष चलेगा, जिसकी अमावस्या 15 जून को होगी। इसके बाद 16 जून से ज्येष्ठ माह का शुक्ल पक्ष शुरू होगा और 29 जून को पूर्णिमा के साथ ज्येष्ठ माह का समापन हो जाएगा।
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