Pithoragarh
OM Parvat पर मंडराया जलवायु संकट: जनवरी में बर्फ के बिना दिखा पवित्र ॐ पर्वत, बढ़ी हिमालय की चिंता..

OM Parvat पर जलवायु परिवर्तन की छाया, जनवरी में बर्फ के बिना दिखा पवित्र पर्वत
Pithoragarh : उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित OM Parvat इन दिनों एक अलग ही वजह से चर्चा में है। आमतौर पर जनवरी के महीने में मोटी बर्फ की सफेद चादर ओढ़े रहने वाला यह पवित्र पर्वत इस बार लगभग बर्फविहीन नजर आ रहा है। करीब 15 हजार 700 फीट की ऊंचाई पर स्थित ओम पर्वत का अधिकांश हिस्सा काला पड़ चुका है, जिससे न केवल स्थानीय लोग बल्कि पर्यावरण विशेषज्ञ भी चिंतित हैं।
जनवरी में बर्फ का न होना, बढ़ती चिंता का संकेत
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में पहली बार ऐसा दृश्य देखा है, जब जनवरी के महीने में ओम पर्वत का ज्यादातर हिस्सा बिना बर्फ के दिखाई दे रहा हो। आम तौर पर दिसंबर और जनवरी को ऊंचे हिमालयी इलाकों में भारी बर्फबारी का मौसम माना जाता है, लेकिन इस वर्ष हालात बिल्कुल उलट हैं।
पिछले कुछ वर्षों में अगस्त और सितंबर जैसे महीनों में ओम पर्वत का बर्फविहीन होना लोगों के लिए आश्चर्य का विषय था। लेकिन अब सर्दियों के चरम महीने जनवरी में भी बर्फ का न होना जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकेत देता है।

OM Parvat की तस्वीरें दे रहीं हैं हालात की साफ स्थिति
हाल ही में सामने आई तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि ओम पर्वत के ऊपरी हिस्से में ही हल्की बर्फ जमी हुई है, जबकि निचला हिस्सा लगभग पूरी तरह काला नजर आ रहा है। इस सर्दी के मौसम में तीन से चार बार हल्की बर्फबारी जरूर हुई, लेकिन वह बर्फ टिक नहीं पाई। तेज हवाओं और बढ़ते तापमान के कारण बर्फ जल्द ही पिघल गई।
स्थानीय लोगों की जुबानी बदलता मौसम
धारचूला क्षेत्र के सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों का कहना है कि सामान्य वर्षों में शीतकाल के दौरान ओम पर्वत पूरी तरह बर्फ से ढका रहता था। इस बार बर्फबारी न होना हिमालयी पर्यावरण के लिए खतरे की घंटी है।
90 वर्षीय बुजुर्ग दान सिंह गुंज्याल बताते हैं कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में ऐसा मौसम कभी नहीं देखा। उनके अनुसार, जहां कभी तीन से चार फीट तक बर्फ जमा रहती थी, वे इलाके अब पूरी तरह सूखे पड़े हैं। बर्फीली चोटियों पर भी अब नाम मात्र की बर्फ बची है।

हिमालयी गांवों में बढ़ी मुश्किलें
ओम पर्वत और कैलाश मानसरोवर मार्ग से जुड़े कई हिमालयी गांवों में अब तक हिमपात नहीं हुआ है। तेज हवाओं के कारण बर्फ की जगह धूल उड़ रही है, जिससे ग्रामीणों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
सर्दियों में जिन गांवों में बर्फ के कारण आवाजाही मुश्किल हो जाती थी, वहां अब सूखे रास्ते दिख रहे हैं। यह बदलाव देखने में भले ही आसान लगे, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।
पेयजल और खेती पर भी असर
सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, बारिश और बर्फबारी के अभाव में पेयजल स्रोत तेजी से सूखने लगे हैं। अगर आने वाले दिनों में बारिश नहीं हुई, तो क्षेत्र में पानी का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
ठंड के मौसम में होने वाली बर्फबारी और बारिश को खेती के लिए वरदान माना जाता है। यही पानी धीरे-धीरे पिघलकर नदियों और जलस्रोतों को जीवन देता है। लेकिन इस वर्ष अधिकांश फसलें सूख चुकी हैं, जिससे काश्तकारों की चिंता बढ़ गई है।
वेस्टर्न डिस्टरबेंस की कमजोरी
मौसम विज्ञान विशेषज्ञों के अनुसार, बर्फबारी का सीधा संबंध वेस्टर्न डिस्टरबेंस से होता है। इस बार वेस्टर्न डिस्टरबेंस काफी कमजोर रहा, जिसके कारण ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में सामान्य से बहुत कम हिमपात देखने को मिला।
देहरादून स्थित मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक के अनुसार, जब वेस्टर्न डिस्टरबेंस सक्रिय नहीं होता, तो पहाड़ों में न तो पर्याप्त बर्फ गिरती है और न ही निचली घाटियों में बारिश होती है। यही कारण है कि इस सर्दी में हिमालयी चोटियां भी सूनी नजर आ रही हैं।
जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत
पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि ओम पर्वत पर बर्फ का न होना केवल एक स्थानीय घटना नहीं है। यह वैश्विक जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। तापमान में लगातार हो रही वृद्धि, बदलते मौसम चक्र और अनियमित वर्षा इसके प्रमुख कारण हैं।
अगर यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में हिमालय की बर्फीली चोटियां अपना स्वरूप खो सकती हैं। इसका असर केवल धार्मिक और पर्यटन महत्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नदियों, खेती और करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ेगा।
आस्था, प्रकृति और जिम्मेदारी
ओम पर्वत न केवल एक प्राकृतिक चमत्कार है, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक भी है। पर्वत पर प्राकृतिक रूप से बना ‘ॐ’ का आकार इसे विशेष बनाता है। ऐसे में इसका बर्फविहीन होना लोगों के मन में कई सवाल खड़े कर रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अब समय आ गया है जब जलवायु परिवर्तन को लेकर केवल चर्चा नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने होंगे। हिमालय को बचाना सिर्फ पहाड़ों में रहने वालों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे देश की साझा जिम्मेदारी है।
आने वाले समय की चेतावनी
जनवरी जैसे ठंडे महीने में ओम पर्वत पर बर्फ का न होना भविष्य की एक चेतावनी है। अगर मौसम का यही मिजाज रहा, तो जल संकट, कृषि संकट और पर्यावरण असंतुलन जैसी समस्याएं और गहरी हो सकती हैं।
ओम पर्वत की बदलती तस्वीर हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ का परिणाम अब सामने आने लगा है। जरूरत है समय रहते जागरूक होने की, ताकि हिमालय की बर्फीली पहचान और उससे जुड़ा जीवन सुरक्षित रह सके।
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उत्तराखंड में भांग की खेती पर सख्ती, पिथौरागढ़ में पहला मुकदमा हुआ दर्ज

Pithoragarh News : उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ में भांग की खेती को लेकर पुलिस ने सख्ती बढ़ा दी है। धारचूला के गलाती क्षेत्र में भांग की खेती के मामले में अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। इसे जिले में इस तरह का पहला मामला बताया जा रहा है।
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पिथौरागढ़ में भांग की खेती पर मुकदमा हुआ दर्ज
पिथौरागढ़ में भांग की खेती को लेकर पुलिस ने पहला मुकदमा दर्ज किया है। मिली जानकारी के मुताबिक धारचूला के गलाती क्षेत्र में भांग की खेती किए जाने की शिकायत सामने आई थी। इसके बाद अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 8(बी)/20(क्यू) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। सीमांत पिथौरागढ़ जिले में भांग की खेती को लेकर दर्ज इस मुकदमे को पहला मामला बताया जा रहा है।
गांव-गांव में जाकर अभियान चला रही पुलिस
भांग की खेती और इसके संभावित दुरुपयोग को देखते हुए पुलिस जिले के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चला रही है। पुलिसकर्मी गांवों में पहुंचकर लोगों को नशीले पदार्थों के दुष्प्रभावों और इससे जुड़े कानूनी प्रावधानों की जानकारी दे रहे हैं।
पुलिस का कहना है कि अवैध रूप से भांग की खेती करने और नशीले पदार्थों के कारोबार में शामिल लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। साथ ही ग्रामीणों से अपील की जा रही है कि वे अवैध गतिविधियों की जानकारी पुलिस को दें और अभियान में सहयोग करें।

पहाड़ की पारंपरिक चटनी भी चर्चा में
भांग की खेती पर कार्रवाई के बीच पहाड़ के पारंपरिक खानपान को लेकर भी चर्चा हो रही है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में भांग के बीजों से तैयार होने वाली चटनी लंबे समय से स्थानीय भोजन का हिस्सा रही है। खासकर सर्दियों में भुने और पीसे हुए भांग के बीजों से बनी चटनी को काफी पसंद किया जाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि भांग के बीजों का पारंपरिक खाद्य उपयोग और नशीले पदार्थों के लिए इसका दुरुपयोग अलग-अलग विषय हैं। ऐसे में जरूरी है कि अवैध नशे के कारोबार पर रोक लगाने के साथ पारंपरिक उपयोग को लेकर भी स्पष्टता बनी रहे।
लाइसेंस और बीजों की उपलब्धता भी अहम मुद्दा
भांग की नियंत्रित खेती के लिए निर्धारित नियमों के तहत अनुमति का प्रावधान है। हालांकि, मानकों के अनुरूप बीज उपलब्ध नहीं होने से खेती करने के इच्छुक लोगों को परेशानी होने की बात सामने आती रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नियमानुसार ऐसी खेती में टीएचसी यानी नशीले प्रभाव के लिए जिम्मेदार तत्व की मात्रा 0.3 प्रतिशत या इससे कम होनी चाहिए।
फिलहाल पिथौरागढ़ में पुलिस की कार्रवाई के बाद भांग की खेती को लेकर निगरानी बढ़ गई है। अब यह देखना अहम होगा कि अवैध खेती और नशीले पदार्थों के कारोबार पर रोक लगाने के लिए अभियान किस तरह आगे बढ़ता है।
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पिथौरागढ़ में उफनाए बरसाती नाले में बही स्कूटी, एक युवक की मौत, दूसरे को ग्रामीणों ने बचाया

Pithoragarh News : पिथौरागढ़ में बरसाती गदेरे में बहने से एक युवक की मौत हो गई। जबकि एक युवक गंभीर रूप से घायल हो गया। एसडीआरएफ ने घायल युवक को रेस्क्यू कर अस्पताल पहुंचा दिया है।
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पिथौरागढ़ में उफनाए बरसाती नाले में बही स्कूटी
पिथौरागढ़ जिले में बारिश के दौरान उफनाए बरसाती नाले में स्कूटी बहने से एक युवक की मौत हो गई, जबकि दूसरा गंभीर रूप से घायल हो गया। हादसा थल-बेरीनाग सड़क पर बरड़ के पास हुआ। सूचना मिलने पर स्थानीय ग्रामीणों ने रेस्क्यू कर घायल युवक को बाहर निकाला, जबकि दूसरे युवक का शव सोमवार सुबह पुलिस और एसडीआरएफ की टीम ने बरामद किया।
एक युवक की मौत, दूसरे को ग्रामीणों ने बचाया
जानकारी के मुताबिक, अल्मोड़ा जिले के नैनोली भगतोला निवासी 18 वर्षीय गौरव कुमार और तिल गांव निवासी हिमांशु नयाल धारचूला की दारमा वैली घूमने गए थे। रविवार रात करीब 9 बजे दोनों स्कूटी से अल्मोड़ा लौट रहे थे। इस दौरान थल से करीब चार किलोमीटर दूर बरड़ के पास बारिश के कारण बरसाती नाला उफान पर था।
नाला पार करते समय उनकी स्कूटी अनियंत्रित होकर पानी के तेज बहाव में बह गई और सड़क से कई फीट नीचे गदेरे में जा गिरी। हादसे के बाद दोनों युवक पानी में बह गए।

अंधेरा होने के कारण एक युवक का नहीं चल सका पता
युवकों के चिल्लाने की आवाज सुनकर आसपास के ग्रामीण मदद के लिए पहुंचे। उन्होंने गौरव कुमार को घायल अवस्था में गदेरे से बाहर निकाला और उपचार के लिए थल अस्पताल पहुंचाया। वहीं, हिमांशु नयाल का रात में पता नहीं चल सका। अंधेरा होने के कारण रात में तलाश अभियान नहीं चलाया जा सका।
सोमवार सुबह बरामद हुआ युवक का शव
सोमवार सुबह पुलिस और एसडीआरएफ की टीम ने घटनास्थल पर पहुंचकर खोजबीन शुरू की। इस दौरान हिमांशु का शव गदेरे में मिला। पुलिस ने घटना की सूचना दोनों युवकों के परिजनों को दे दी है। परिजनों के पहुंचने के बाद शव का पोस्टमार्टम कर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
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पिथौरागढ़ की दारमा घाटी में बर्फ पर फिसला पैर, खाई में गिरने से युवक की मौत

Pithoragarh News : पिथौरागढ़ के धारचूला की दारमा घाटी में बकरियां चराने गए 22 वर्षीय युवक की खाई में गिरने से मौत हो गई। हादसा बोन गांव के पास चगदंग बुग्याल क्षेत्र में हुआ। बताया जा रहा है कि बर्फ पर पैर फिसलने के कारण युवक संतुलन खो बैठा और गहरी खाई में जा गिरा।
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पिथौरागढ़ में बर्फ में फिसलकर युवक की मौत
पिथौरागढ़ के बोन गांव निवासी आर्यन सिंह, पुत्र पुष्कर सिंह, 26 सितंबर को गांव से करीब तीन किलोमीटर दूर चगदंग बुग्याल में बकरियां चराने गया था। इसी दौरान बर्फ पर पैर फिसलने से वह खाई में जा गिरा। घटना की जानकारी मिलने के बाद उसकी तलाश शुरू की गई। काफी खोजबीन के बाद युवक का शव खाई से बरामद किया गया।
रेस्क्यू अभियान चलाकर शव को खाई से निकाला बाहर
ग्राम प्रधान भीम सिंह बोनाल ने हादसे की सूचना प्रशासन को दी। इसके बाद प्रशासन की टीम ने रेस्क्यू अभियान चलाकर शव को खाई से बाहर निकाला और गांव पहुंचाया। 29 सितंबर को डॉ. राजेश गुंज्याल और राजस्व उपनिरीक्षक तनुज चन्याल की टीम पोस्टमार्टम के लिए बोन गांव पहुंची। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया।

घटना के बाद पूरे गांव में पसरा मातम
ग्राम प्रधान भीम सिंह बोनाल के मुताबिक, युवक का अंतिम संस्कार गांव में ही कर दिया गया है। हादसे के बाद मृतक के परिवार में मातम पसरा है, वहीं घटना से पूरे गांव में भी शोक का माहौल है।
गौरतलब है कि इन दिनों आदि कैलाश क्षेत्र में भी बर्फ जमी हुई है। ऊंचाई वाले इलाकों में मौसम और बर्फबारी के कारण आवाजाही के दौरान अतिरिक्त सतर्कता की जरूरत बनी हुई है।
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