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14 या 15 जनवरी कब है मकर संक्राति ?, यहां जानें makar sankranti 2026 की सही डेट और मुहूर्त

makar sankranti 2026 date : मकर संक्रांति का त्यौहार नजदीक है लेकिन कई लोगों को इसकी डेट को लेकर क्नफ्यूजन है कि त्यौहार 14 जनवरी को मनाया जा रहा है या फिर 15 जनवरी को मनाया जाएगा। अगर आपको भी है ये कन्फूजन तो हम बताते हैं आपको सही डेट और शुभ मुहूर्त।
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14 या 15 जनवरी कब है मकर संक्राति ?
अलग-अलग पंचांगों में सूर्य के गोचर का समय अलग-अलग दिए जाने के कारण मकर संक्रांति कब है? इसे लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। इसी कारण मकर संक्रांति की तारीख (makar sankranti 2026 date) को लेकर भी कन्फ्यूजन बना हुआ है। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक जब सूर्य देव जब मकर राशि में गोचर करते हैंउस समय सूर्य की मकर संक्रांति मनाई जाती है। ऐसे में 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई जाएगी।

15 जनवरी है makar sankranti 2026 की सही डेट
काशी विश्वनाथ के हृषिकेश पंचांग के मुताबिक सूर्यदेव 14 जनवरी 2026 को रात में 9 बजकर 41 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इस बार रात्रि के समय में ही संक्रांति हो रही है। इसी कारण makar sankranti का पुण्य काल 15 जनवरी को सूर्योदय के बाद से होगा।
निर्णय सिंधु के मुताबिक इस साल मकर संक्रांति का पुण्य काल 15 जनवरी को प्राप्त हो रहा है। क्योंकि सूर्य का प्रवेश मकर राशि में रात के समय हो रहा है। ऐसे में मकर संक्रांति 15 जनवरी गुरुवार को मनाना शास्त्र सम्मत है।

makar sankranti का शुभ मुहूर्त
बात करें मकर संक्रांति पर शुभ मुहूर्त की तो 15 जनवरी को मकर संक्रांति वाले दिन पुण्य काल 2 बजकर 53 मिनट तक है। ऐसे में आप सुबह से लेकर दोपहर दो बजकर 53 मिनट तक स्नान और दान कर सकते हैं। बता दें कि makar sankranti वाले दिन दान का पुण्य मिलता है।
क्यों मनाया जाता है मकर संक्रांति का त्यौहार ?
मकर संक्रांति अलग-अलग नामों से लेकिन पूरे देश में धूमधाम से मनाई जाती है। कहीं इस दिन खिचड़ी बनती है तो कहीं पतंगबाजी देखने को मिलती है। ये एकमात्र ऐसा त्यौहार है जो पूरे देश में एकसाथ मनाया जाता है चाहे इसे मनाने के तरीके और नाम अलग हों।

आमतौर पर ये त्यौहा जनवरी महीने की 14 तारीख को मनाया जाता है। लेकिन कभी-कभी ये त्योहार 12, 13 या 15 तारीख को भी मनाया जाता है। जिसके पीछे का कारण ये है कि जिस दिन सूर्य पूरी तरह से मकर राशि में प्रवेश करते हैं इसे उसी दिन मनाया जाता है। जो कि 12, 13, 14 या 15 तारीख को ही होता है।
हिन्दू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक भगवान विष्णु ने इसी दिन असुरों का अंत कर उनके सिरों को मंदार पर्वत में दबाकर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। इसलिए इस दिन को बुराइयों और नकारात्मकता को समाप्त करने का दिन भी माना जाता है जो कि बेहद ही शुभ होता है।
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कब है Sakat Chauth Vrat 2026 , जानें क्या करें , क्या न करें और पूजा विधि…

Sakat Chauth Vrat 2026: संतान सुख, विघ्न नाश और रिद्धि-सिद्धि का पावन पर्व
हिंदू धर्म में सकट चौथ व्रत को अत्यंत पुण्यदायी और फलदायी माना जाता है। यह व्रत भगवान श्री गणेश और सकट माता की उपासना का विशेष दिन है, जिसे संतान की लंबी आयु, परिवार की सुख-समृद्धि और जीवन की बाधाओं के नाश से जोड़ा जाता है। वर्ष 2026 में सकट चौथ व्रत 06 जनवरी, मंगलवार को माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मनाया जाएगा। यह पर्व विशेष रूप से माताओं और महिलाओं के बीच गहरी आस्था रखता है, हालांकि पुरुष भी यह व्रत रख सकते हैं।
सनातन परंपरा में माना जाता है कि सकट चौथ के दिन विधि-विधान से पूजा और नियमों का पालन करने पर भगवान गणेश अपने भक्तों के सभी विघ्न हर लेते हैं और जीवन में शुभता का विस्तार होता है।
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Sakat Chauth Vrat का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
सकट चौथ व्रत को कई क्षेत्रों में संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है। “सकट” शब्द का अर्थ संकट से है, यानी यह व्रत संकटों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है। लोक मान्यताओं के अनुसार, सकट माता ने अपने आशीर्वाद से संतान की रक्षा की थी, इसलिए माताएं इस दिन उपवास रखकर अपनी संतान की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं।
यह व्रत मातृत्व, त्याग और श्रद्धा का प्रतीक है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में इस पर्व की परंपराएं थोड़ी-बहुत भिन्न हो सकती हैं, लेकिन मूल भाव एक ही है—भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करना।
सकट चौथ व्रत 2026: तिथि, वार और समय
- तिथि: 06 जनवरी 2026
- वार: मंगलवार
- मास: माघ
- पक्ष: कृष्ण पक्ष
- व्रत पारण: चंद्र दर्शन के बाद
सकट चौथ व्रत में चंद्र दर्शन का विशेष महत्व है। मान्यता है कि चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना व्रत का पारण नहीं करना चाहिए। यही कारण है कि भक्त पूरे दिन उपवास रखकर रात में चंद्रमा निकलने की प्रतीक्षा करते हैं।
सकट चौथ व्रत की पूजा विधि (Step-by-Step)
सफल और पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए Sakat Chauth Vrat की पूजा विधि का पालन करना आवश्यक माना गया है।
- ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- घर के ईशान कोण को साफ कर वहां पूजा स्थान तैयार करें।
- भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र को लाल वस्त्र पर स्थापित करें।
- दीप जलाकर गणपति का ध्यान करें और संकल्प लें।
- दूर्वा, तिल के लड्डू, मोदक, गन्ना और लाल फूल अर्पित करें।
- गणेश मंत्र, स्तोत्र और आरती का पाठ करें।
- शाम को चंद्रमा के दर्शन कर अर्घ्य दें और फिर व्रत का पारण करें।
सकट चौथ व्रत में क्या करें
(What to do on Sakat Chauth Vrat)
- सूर्योदय से पहले उठकर स्नान-ध्यान करें।
- पूजा के समय लाल या पीले रंग के वस्त्र पहनें।
- लाल रंग के ऊनी आसन का प्रयोग करें।
- पूजा करते समय मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
- गणपति को उनकी प्रिय वस्तुएं जैसे दूर्वा और तिल से बने भोग अर्पित करें।
- पूरे दिन मन को शांत और संयमित रखें।
सकट चौथ व्रत में क्या न करें
(What to not do on Sakat Chauth Vrat)
- क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से बचें।
- तामसिक भोजन और नशे से दूरी रखें।
- दिन में सोने से बचें।
- पूजा में तुलसी दल अर्पित न करें।
- चूहों या किसी भी जीव को कष्ट न पहुंचाएं।

Sakat Chauth Vrat की पौराणिक कथा
प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक अत्यंत गरीब ब्राह्मणी अपने छोटे से पुत्र के साथ रहती थी। उसका जीवन अत्यंत कष्टों से भरा हुआ था। भोजन और वस्त्र तक का प्रबंध बड़ी कठिनाई से होता था, लेकिन वह स्त्री अत्यंत धार्मिक और संस्कारी थी। वह प्रतिदिन भगवान की पूजा करती और अपने पुत्र के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती।
एक वर्ष माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि आई। उसी दिन नगर की सभी महिलाएं सकट चौथ व्रत रख रही थीं। ब्राह्मणी भी व्रत रखना चाहती थी, लेकिन उसके पास न तो पूजा की सामग्री थी और न ही भोग चढ़ाने के लिए कुछ। फिर भी उसने मन में ठान लिया कि वह श्रद्धा से व्रत रखेगी।
ब्राह्मणी ने पूरे दिन उपवास रखा। शाम को जब चंद्रमा निकलने का समय हुआ, तो उसके घर में दीपक जलाने के लिए तेल तक नहीं था। वह बहुत दुखी हुई, लेकिन उसने मन में भगवान से प्रार्थना की और चंद्रमा को मन ही मन अर्घ्य अर्पित किया।
उसी रात उसके पुत्र को अचानक तेज बुखार आ गया और उसकी स्थिति गंभीर हो गई। ब्राह्मणी भयभीत हो उठी और रोते-रोते भगवान गणेश और सकट माता से अपने पुत्र की रक्षा की गुहार लगाने लगी।
उसकी सच्ची भक्ति और मातृत्व की पुकार सुनकर भगवान गणेश प्रकट हुए। उन्होंने सकट माता के साथ मिलकर बालक को जीवनदान दिया। बालक का बुखार उतर गया और वह स्वस्थ हो गया।
भगवान गणेश ने ब्राह्मणी से कहा,
“हे माता, तुमने बिना किसी दिखावे और स्वार्थ के श्रद्धा से सकट चौथ व्रत रखा है। आज से यह व्रत संतान की रक्षा, दीर्घायु और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाएगा।”
इसके बाद ब्राह्मणी का जीवन बदल गया। उसके घर में कभी अभाव नहीं रहा और उसका पुत्र दीर्घायु व यशस्वी बना।
Sakat Chauth Vrat की दूसरी लोकप्रचलित कथा
एक अन्य कथा के अनुसार, एक राजा की रानी के कई पुत्र थे, लेकिन सभी अल्पायु में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे। दुखी रानी ने एक वृद्धा से अपने कष्ट का कारण पूछा। वृद्धा ने बताया कि रानी ने कभी सकट चौथ व्रत नहीं रखा है।
रानी ने विधि-विधान से सकट चौथ व्रत रखा, चंद्र दर्शन किया और कथा सुनी। इसके बाद उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जो दीर्घायु और पराक्रमी बना। तभी से यह व्रत संतान की रक्षा से जुड़ गया।
किन गलतियों से लगता है दोष या पाप
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार Sakat Chauth Vrat में कुछ गलतियां पुण्य के स्थान पर दोष का कारण बन सकती हैं।
- टूटे हुए अक्षत या बासी फूल चढ़ाना।
- केतकी का फूल या तुलसी दल अर्पित करना।
- सफेद वस्त्र, सफेद आसन या सफेद चंदन का प्रयोग करना।
- पूजा के दौरान श्रद्धा का अभाव या जल्दबाजी दिखाना।
इनसे बचकर ही व्रत का पूर्ण फल प्राप्त किया जा सकता है।
सकट चौथ व्रत का आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश
यह व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। Sakat Chauth Vrat आत्मसंयम, अनुशासन और सकारात्मक सोच का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि आस्था और नियमों के पालन से जीवन की कठिनाइयों को भी सरल बनाया जा सकता है।
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FAQs
प्रश्न 2: सकट चौथ व्रत 2026 कब है?
6 जनवरी 2025 को ।
प्रश्न 2: सकट चौथ व्रत कौन-कौन रख सकता है?
यह व्रत महिलाएं, पुरुष और युवा सभी रख सकते हैं।
प्रश्न 3: क्या बिना चंद्र दर्शन व्रत खोला जा सकता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार चंद्र दर्शन के बिना व्रत का पारण नहीं करना चाहिए।
प्रश्न 4: सकट चौथ व्रत से क्या लाभ होते हैं?
संतान सुख, परिवार में शांति और जीवन की बाधाओं से मुक्ति।
निष्कर्ष
Sakat Chauth Vrat 2026 आस्था, श्रद्धा और संयम का पर्व है। सही विधि, नियम और शुद्ध भाव से किया गया यह व्रत जीवन में सुख-समृद्धि, सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति प्रदान करता है। यदि आप संतान के मंगल और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं, तो यह व्रत आपके लिए विशेष फलदायी सिद्ध हो सकता है।
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नंदा देवी राज जात यात्रा 2026 : ख़त्म हुआ इंतजार, इस दिन से शुरू होगी यात्रा…..

NANDA DEVI RAJ JAT YATRA 2026: वसंत पंचमी के दिन जारी होगा यात्रा कार्यक्रम, 20 जनवरी से नौटी गाँव में आयोजित होगा महोत्सव
NANDA DEVI RAJ JAT YATRA : साल 2026 उत्तराखंड के लिए कई नए यादगार पल लाएगा। इसी साल हिमालयी महाकुम्भ के नामा से विख्यात नंदा राज जात यात्रा का आयोजन भी होना है। नंदा राजजात यात्रा कुंभ की तरह ही प्रति 12 वर्षों में एक बार आयोजित की जाती है। इस बार 2026 में नंदा राज जात यात्रा के लिए 23 जनवरी को यात्रा कार्यक्रम जारी किया जाएगा।
मुख्य बिंदु
क्या है नंदा राज जात यात्रा 2026 ? ( NANDA DEVI RAJ JAT YATRA SCHEDULE 2026 )
नंदा देवी गढ़वाल ही नहीं बल्कि कुमाऊँ क्षेत्र में भी अत्यंत पूजनीय हैं। जहाँ उन्हें श्रद्धापूर्वक राजराजेश्वरी भी कहा जाता है। मान्यताओं के मुताबिक कुमाऊँ मंडल को माँ नंदा का मायका और गढ़वाल मंडल को उनका ससुराल माना जाता है। जिससे दोनों क्षेत्रों की सांस्कृतिक एकता झलकती है। इसी परंपरा के चलते नंदा देवी राजजात यात्रा सदियों से चली आ रही है। हालांकि ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि ये हिमालयी महाकुंभ वर्ष 1843 से नियमित आयोजित किया जा रहा है। ये यात्रा कुमाऊँ और गढ़वाल के लोगों को एक सूत्र में बाँधते हुए धार्मिक और सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक बनती है।
क्यों मनाई जाती हैं नंदा राज जात यात्रा ? ( NANDA DEVI RAJ JAT YATRA 2026 )
नंदा देवी राज जात यात्रा ( HIMALAYI MAHAKUMBH ) से जुड़ी अनेक लोक मान्यताएं प्रचलित हैं। जिनमें एक लोककथा विशेष रूप से स्वीकार की जाती है। जिसके मुताबिक राजा दक्ष के घर जन्मी माँ नंदा देवी को माता पार्वती का अवतार माना जाता है। जिनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। विवाह के बाद वो भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत स्थित अपने ससुराल चली गईं। जब कई वर्षों बाद उन्हें अपने मायके की याद आई और उन्होंने भगवान शिव से वहां जाने की अनुमति मांगी। जिस पर भगवान शिव ने कहा कि बारह दिन बाद वो अपने दूत को उन्हें वापस लाने के लिए भेजेंगे।

इसके बाद, मायके में बारह दिन पूरे होने पर भगवान शिव ने अपने प्रिय चौसिंघिया खाडू को माँ नंदा को वापस लाने के लिए भेजा। विदाई की सभी तैयारियां पूरी की गईं। यात्रा के दौरान माँ नंदा के परिवार जन भी भावुक मन से उनके साथ चले। मार्ग में जिन स्थानों पर माँ नंदा ने विश्राम किया, वहां आज शक्ति पीठ स्थापित माने जाते हैं। इसी विश्वास के चलते प्रत्येक बारह वर्षों में नंदा देवी राज जात यात्रा आयोजित कर माँ नंदा को प्रतीकात्मक रूप से उनके ससुराल भेजा जाता है।
NANDA DEVI RAJ JAT YATRA में बारह सालों का अंतराल क्यों हैं ?
नंदा राज जात यात्रा ( HIMALAYI MAHAKUMBH ) प्रत्येक बारह सालों में एक बार मनाई जाती हैं। इसीलिए ऐसे हिमालयी महाकुम्भ भी कहते हैं। माँ नंदा और भगवान् शिव की ये लोककथा सतयुग की मानी जाती है। और लोकमान्यताओं के मुताबिक सतयुग का एक दिन कलयुग के एक साल के बर्बर हैं। इसलिए सतयुग में माँ नंदा 12 दिनों के लिए अपने मायके आई थी जिसे आज के समय में 12 सालों के बराबर माना जाता है। इसलिए नंदा राज जात यात्रा प्रत्येक 12 सालों के समय अंतराल पर आयोजित की जाती है।

क्या है नंदा राज जात यात्रा में चौसिंगिया खाडू की मान्यता ( CHAUSINGIYA KHADU )
चौसिंगिया खाडू ( CHAUSINGIYA KHADU ) , नंदा राज जात यात्रा के आयोजन के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। चौसिंगिया खाडू क्षेत्रीय भाषा का एक शब्द है। जिसका हिंदी में अर्थ होता है – चार सींग वाला भेड़ जो कि अत्यंत दुर्लभ है। यही चार सींग वाला भेड़ पूरी यात्रा की अगुवाई करता है। लोकमान्यताओं के मुताबिक यात्रा से कुछ महीनों पहले ही ये चौसिंगिया खाडू यात्रा क्षेत्र के किसी गांव में जन्म लेता है। और ये 12 वर्षों में केवल एक बार होता है। माना जाता है कि ये भेड़ स्वयं भगवान् शिव का ही एक रूप है जो माँ नंदा को लेने आते हैं।

एशिया की सबसे लम्बी धार्मिक यात्रा ( Asia’s Longest Religious Pilgrimage )
नंदा देवी राज जात यात्रा एशिया की सबसे लम्बी धार्मिक यात्रा ( Longest Religious Pilgrimage of Asia ) है। इस यात्रा का शुभारंभ चमोली जिले के नॉटी गाँव ( NAUTI VILLAGE ) से किया जाता है। जो अपने अंतिम यात्रा पड़ाव होमकुंड ( HOMKUND )पर आम लोगों के लिए समाप्त होती है। इसके बाद माना जाता हैं कि माँ नंदा कैलाश की ओर प्रस्थान करती है। HOMEKUND से आगे रंग-बिरंगे वस्त्रों से सुशोभित चौसिंगिया खाडू को हिमालय के लिए रवाना किया जाता है।
नंदा देवी राज जात यात्रा का रुट मैप ( ROOT OF NANDA DEVI RAJ JAT YATRA 2026 )
( HIMALAYI MAHAKUMBH ) लगभग तीन सप्ताह तक चलने वाली ये करीब 280 किलोमीटर लंबी यात्रा विभिन्न गांवों, विस्तृत घास के मैदानों, घने जंगलों और ऊँचे पहाड़ी मार्गों से गुजरते हुए अपने अंतिम पड़ाव तक पहुँचती है। इस दौरान श्रद्धालुओं को प्रकृति के अनेक अद्भुत और विविध रूप देखने को मिलते हैं। विशेष रूप से ये यात्रा मार्ग रूपकुंड और बेदनी बुग्याल के लिए जाना जाता है। जहां बेदनी बुग्याल अपने दूर-दूर तक फैले हरे-भरे घास के मैदानों के लिए प्रसिद्ध है, वहीं रूपकुंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ ऐतिहासिक रहस्यों के कारण भी पहचान रखता है।

इसी कड़ी में यहां स्थित रूपकुंड झील को SKELETON LAKE और “पातर नचोनिया” जैसे नामों से जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, एक समय एक राजा अपने साथ नर्तकों के दल को इस स्थान पर लेकर आया था। इससे कुपित होकर माँ नंदा की शक्ति से ओलों की वर्षा हुई, जिसमें वे सभी पत्थर में परिवर्तित हो गए। कहा जाता है कि उन्हीं के अवशेष आज भी इस झील के आसपास देखे जा सकते हैं।
नंदा देवी राजजात यात्रा का निर्धारित मार्ग और पड़ाव
Nanda devi raj jat yatra एक निश्चित और पारंपरिक मार्ग से होकर गुजरती है, जिसमें अनेक महत्वपूर्ण पड़ाव शामिल हैं। यह यात्रा चरणबद्ध रूप से गांवों, पर्वतीय क्षेत्रों और उच्च हिमालयी बुग्यालों से होती हुई आगे बढ़ती है। प्रत्येक पड़ाव का अपना धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व है, जहां श्रद्धालु विधि-विधान के साथ यात्रा को आगे बढ़ाते हैं।
यात्रा मार्ग और दूरी
| से | तक | दूरी |
|---|---|---|
| नौटी गांव ( Nauti Village ) | ईडा बधानी | 10 किमी |
| ईडा बधानी | नौटी | 10 किमी |
| नौटी | कांसुवा | 10 किमी |
| कांसुवा | सेम | 12 किमी |
| सेम | कोटि | 10 किमी |
| कोटि | भगोती | 12 किमी |
| भगोती | कुलसारी | 12 किमी |
| कुलसारी | चेपड़ों | 10 किमी |
| चेपड़ों | नंद केसरी | 11 किमी |
| नंद केसरी | फल्दिया | 8 किमी |
| फल्दिया | मुंडोली | 10 किमी |
| मुंडोली | वाण | 15 किमी |
| वाण | गेरोली पातल | 10 किमी |
| गेरोली पातल | बेदनी बुग्याल (Bedni bugyal) | 9 किमी |
| बेदनी बुग्याल (Bedni bugyal) | पातर नाचोनिया | 5 किमी |
| पातर नाचोनिया (SKELETON LAKE) | सिला समुंद्र | 15 किमी |
| सिला समुंद्र | चंदनिया घाट | 16 किमी |
| चंदनिया घाट | सुतोल | 18 किमी |
| सुतोल | घाट | 32 किमी |
| घाट | नौटी | 40 किमी |
| नौटी गांव ( Nauti Village ) | — | — |
यात्रा के प्रमुख पड़ाव और उनका महत्व
उत्तराखंड के चमोली जिले में आयोजित होने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा के दौरान कई ऐसे प्रमुख पड़ाव आते हैं, जिनका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व विशेष रूप से जुड़ा हुआ है।
- नौटी गांव: यात्रा का प्रारंभिक स्थल होने के कारण यहां सभी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विधिवत पूजा-अर्चना संपन्न की जाती है।
- कोटि गांव: यह एक अहम पड़ाव है, जहां पुजारी और श्रद्धालु पूरी रात भजन-कीर्तन करते हैं।
- बेदनी बुग्याल: यात्रा मार्ग के ऊंचे और रमणीय स्थलों में से एक, जो अपने विस्तृत और सुंदर घास के मैदानों के लिए प्रसिद्ध है।
- रूपकुंड झील (SKELETON LAKE) : ‘कंकाल झील’ के नाम से विख्यात यह स्थान अपने रहस्यमय इतिहास और धार्मिक महत्व के कारण जाना जाता है।
- होमकुंड (Homkund): नौटी गांव से शुरू हुई यात्रा का अंतिम पड़ाव, जहां सभी धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण करने के बाद चौसिंघिया खाडू को विदा किया जाता है। मान्यता है कि इसी के माध्यम से माँ नंदा देवी कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान करती हैं।
साल 2026 के लिए नंदा देवी राजजात यात्रा का कार्यक्रम
वर्ष 2026 में श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा, जिसे हिमालयीय महाकुंभ के नाम से भी जाना जाता है, का भव्य आयोजन किया जाएगा। करीब 280 किलोमीटर लंबी इस पैदल यात्रा में श्रद्धा और आस्था का विशाल सैलाब उमड़ने की उम्मीद है। लगभग 20 दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक आयोजन के दौरान सैकड़ों देवी-देवताओं की डोलियां और छंतोलियां श्रद्धालुओं को दर्शन देंगी। इसी क्रम में बसंत पंचमी के पावन अवसर पर 23 जनवरी को इस महाकुंभ के आयोजन का आधिकारिक कार्यक्रम जारी किया जाएगा।

12 वर्षों बाद होने वाली यात्रा का लंबे समय से इंतजार
गौरतलब है कि श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा प्रत्येक 12 वर्ष के अंतराल पर आयोजित होती है। आमतौर पर अगस्त–सितंबर माह में होने वाली इस यात्रा को लेकर लोगों में लंबे समय से उत्साह बना हुआ है। यात्रा में शामिल होने के लिए हर बार लाखों श्रद्धालु दूर-दराज के क्षेत्रों से पहुंचते हैं। इसी को देखते हुए सरकार और आयोजन समिति पिछले दो वर्षों से तैयारियों में जुटी हुई है।
यात्रा पड़ावों पर बुनियादी सुविधाओं को किया जा रहा मजबूत
इसके साथ ही यात्रा मार्ग पर पड़ने वाले विभिन्न पड़ावों में आधारभूत ढांचे को सुदृढ़ किया जा रहा है। सड़कों के सुधार का कार्य तेजी से चल रहा है, जबकि अन्य आवश्यक सुविधाओं के लिए विस्तृत इस्टीमेट भी तैयार कर लिए गए हैं। वहीं नौटी गांव में यात्रा कार्यक्रम जारी करने को लेकर भव्य महोत्सव की तैयारियां अंतिम चरण में हैं।
23 जनवरी को जारी होगा कार्यक्रम, 20 से महोत्सव की शुरुआत
NANDA DEVI RAJ JAT YATRA SCHEDULE 2026 श्रीनंदा देवी राजजात समिति के महासचिव भुवन नौटियाल ने बताया कि यात्रा की तैयारियां लगातार जारी हैं। उन्होंने कहा कि बसंत पंचमी 23 जनवरी को राजवंशी राजकुंवर द्वारा यात्रा का कार्यक्रम जारी किया जाएगा। इसके लिए 20 जनवरी से नौटी में महोत्सव आयोजित किया जाएगा, जिसमें देवी पूजन के साथ-साथ विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। साथ ही गढ़वाल और कुमाऊं के राजवंशों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की भी प्रबल संभावना है।
Nanda Devi Raj Jat Yatra 2026 कब शुरू होगी?
Nanda Devi Raj Jat Yatra 2026 Schedule के अनुसार, यात्रा का आधिकारिक कार्यक्रम 23 January 2026 को Basant Panchami के दिन जारी किया जाएगा।
Nanda Devi Raj Jat Yatra कहां से शुरू होती है?
यात्रा की शुरुआत Nauti Village, Chamoli (Uttarakhand) से होती है।
Nanda Devi Raj Jat Yatra कितने दिन चलती है?
यह यात्रा लगभग 20–21 Days तक चलती है।
Chausingiya Khadu क्या है? (Chausingiya Khadu Meaning)
Chausingiya Khadu एक चार सींग वाला दुर्लभ भेड़ है, जिसे भगवान शिव का दूत माना जाता है और यह पूरी यात्रा की अगुवाई करता है।
क्या आम श्रद्धालु Nanda Devi Raj Jat Yatra में शामिल हो सकते हैं?
हाँ, प्रशासनिक दिशा-निर्देशों के अनुसार Common Devotees भी इस यात्रा में भाग ले सकते हैं।
नंदा देवी राजजात यात्रा कितने वर्षों में होती है?
यह यात्रा हर 12 years में एक बार आयोजित की जाती है, इसलिए इसे Himalayan MahaKumbh भी कहा जाता है।
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Tulsi Pujan Diwas क्यों मनाया जाता है ?, इस दिन सही पूजा से बदल सकती है आपकी किस्मत

Tulsi Pujan Diwas 2025 : हर साल 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस मनाया जाता है। इस दिन अगर आप सही विधि से मां तुलसी की पूजा करेंगे तो आपकी किस्मत भी बदल सकती है। इसके साथ ही आप पर मां तुलसी और भगवान विष्णु की कृपा बरसेगी।
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Tulsi Pujan Diwas क्यों मनाया जाता है ?
तुलसी के पौधे को हिंदू धर्म में माता लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। इस लिए इसकी पूजा करने से स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। यूं तो सालभर तुलसी माता की पूजा की जाती है। लेकिन हर साल 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस (Tulsi Pujan Diwas 2025) मनाया जाता है। तुलसी पूजन दिवस तुलसी के धार्मिक और औषधीय महत्व को दिखाता है।

साल 2014 से हुई थी इसे मनाने की शुरूआत
आपको बता दें कि Tulsi Pujan Diwas मनाने की शुरूआत साल 2014 में हुई थी। देश के कई साधु-संतों ने 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस मनाने का फैसला लिया था। तभी से इसे आज के दिन मनाया जाता है। इस साल यानी कि 25 दिसंबर 2025 को तुलसी पूजन दिवस का शुभ मुहूर्त सुबह आठ बजे से 10 बजे तक रहेगा। वहीं की पूजा का मुहूर्त 5:30 बजे से सात बजे तक रहेगा।

इस दिन सही पूजा से बदल सकती है आपकी किस्मत
तुलसी पूजन दिवस पर अगर आप सही विधि से पूजा करते हैं तो आप पर मां तुलसी और भगवान विष्णु की कृपा हमेशा बनी रहेगी। तुलसी पूजन दिवस पूजा विधि (Tulsi Pujan Diwas Puja Vidhi) शुरू करने से पहले सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लें।

पूजा को शुरू करते हुए स्नान के बाद तुलसी के पौधे में जल अर्पित करें। इसके बाद मां तुलसी को अक्षत, चंदन और रोली चढ़ाएं। फिर अपनी श्रद्धानुसार तुलसी की 7, 11, 21 या 111 परिक्रमा करें। परिक्रमा के दौरान तुलसी माता के मंत्रों का जाप करें। परिवार के साथ तुलसी माता की आरती करें और मां को भोग लगाकर प्रसाद सभी में बांटें। इस दिन शाम को पूजा के बाद तुलसी के पास गाय.
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