Uttarakhand
एक नहीं साल में तीन बार मनाया जाता है हरेला, जानिए उत्तराखंड की इस परंपरा का असली महत्व

Harela 2026 : उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति का ऐसा पर्व है, जो प्रकृति, पर्यावरण और कृषि से लोगों के गहरे जुड़ाव का प्रतीक है। ‘हरेला’ का शाब्दिक अर्थ है हरियाली का आगमन। ये पर्व मानसून के स्वागत, धरती की उर्वरता और कृषि संस्कृति के महत्व को दर्शाता है।
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कैसे मनाया जाता है हरेला?
हरेला पर्व से नौ दिन पहले घरों में मिट्टी से भरी टोकरी या बांस की डलिया में पांच या सात प्रकार के अनाज जैसे जौ, गेहूं, मक्का, उड़द, गहत, भट्ट, धान, सरसों आदि बोए जाते हैं। नौ दिनों तक इन अंकुरित पौधों की पूजा की जाती है।
सावन के पहले दिन इन हरे अंकुरों को काटकर सबसे पहले इष्ट देवता और कुल देवता को अर्पित किया जाता है।इसके बाद परिवार के बुजुर्ग हरेला बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों के सिर पर रखकर उनके सुख, समृद्धि, लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद देते हैं। यही इस पर्व की सबसे सुंदर परंपराओं में से एक है।
एक नहीं साल में तीन बार मनाया जाता है हरेला
बहुत कम लोग जानते हैं कि हरेला केवल सावन में ही नहीं, बल्कि वर्ष में तीन बार मनाया जाता है। चैत्र माह, श्रावण माह और आश्विन
चैत्र हरेला – चैत्र माह के प्रथम दिन बोया जाता है और नवमी को काटा जाता है। यह गर्मी के आगमन का संकेत देता है।
श्रावण हरेला – सावन शुरू होने से नौ दिन पहले बोया जाता है और श्रावण के प्रथम दिन काटा जाता है। यही सबसे प्रमुख और व्यापक रूप से मनाया जाने वाला हरेला है।
आश्विन हरेला – नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरे के दिन काटा जाता है। यह शीत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है।

उत्तराखंड में क्यों मनाया जाता है हरेला ?
हरेला किसानों के लिए नई फसल और समृद्धि की कामना का पर्व है। ये धरती, जल, जंगल और जैव विविधता के संरक्षण का संदेश देता है। इस अवसर पर पूरे उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर पौधारोपण अभियान चलाए जाते हैं। हरेला अच्छी फसल का सूचक होता है। हरेला इस कामना के साथ बोया जाता है कि इस साल फसलों को किसी दैवीय आपदा से नुकसान न हो।
ये भी मान्यता है कि जिसका हरेला जितना बड़ा होगा उसे खेती-बाड़ी में उतना ही फायदा होगा । वैसे तो हरेला हर घर में बोया जाता है लेकिन किसी-किसी गांव में हरेला पर्व को सामूहिक रूप से स्थानीय ग्राम देवता के मंदिर में भी मनाया जाता है। गांव के लोगों द्वारा मिलकर मन्दिर में हरेला बोया जाता है, उसकी देखभाल की जाती है और सभी लोगों द्वारा इस पर्व को हर्षोल्लास से मनाया जाता है ।

उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का सबसे सुंदर प्रतीक है हरेला
“जी रया, जागि रया…” के पारंपरिक आशीर्वाद के साथ मनाया जाने वाला हरेला, उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत और हरियाली के प्रति लोगों की आस्था का सबसे सुंदर प्रतीक है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब हरेला पर्व हमें प्रकृति के संरक्षण का संदेश देता है। ये हमें याद दिलाता है कि अगर धरती हरी-भरी रहेगी, तभी मानव जीवन सुरक्षित और समृद्ध रहेगा। हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ, सुरक्षित और हरित भविष्य का संकल्प है।

Harela Festival FAQs
1. हरेला क्या है?
हरेला उत्तराखंड का एक प्रमुख लोकपर्व है, जो हरियाली, प्रकृति, कृषि और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना के साथ मनाया जाता है।
2. हरेला कैसे मनाया जाता है?
हरेला से नौ दिन पहले घरों में मिट्टी से भरी टोकरी या बांस की डलिया में जौ, गेहूं, धान, मक्का, सरसों, गहत, भट्ट आदि पांच या सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। नौ दिनों तक इनकी पूजा की जाती है और सावन के पहले दिन इन्हें काटकर भगवान को अर्पित करने के बाद परिवार के सदस्यों को आशीर्वाद स्वरूप सिर पर रखा जाता है।
3. हरेला साल में कितनी बार मनाया जाता है?
हरेला वर्ष में तीन बार मनाया जाता है—
- चैत्र हरेला
- श्रावण हरेला
- आश्विन हरेला
4. हरेला में कौन-कौन से अनाज बोए जाते हैं?
हरेला में आमतौर पर जौ, गेहूं, धान, मक्का, उड़द, गहत, भट्ट और सरसों जैसे पांच या सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं।
5. हरेला का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व क्या है?
हरेला को इष्ट देवता और कुल देवता की पूजा से जोड़ा जाता है। यह पर्व परिवार की सुख-समृद्धि, लंबी आयु, अच्छी फसल और प्रकृति के प्रति आस्था का प्रतीक माना जाता है।
6. उत्तराखंड में हरेला क्यों मनाया जाता है?
यह पर्व किसानों की अच्छी फसल, वर्षा, धरती की उर्वरता और पर्यावरण संरक्षण की कामना के लिए मनाया जाता है। साथ ही यह उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाता है।
7. हरेला पर पौधारोपण क्यों किया जाता है?
हरेला प्रकृति और हरियाली का पर्व है। इसलिए इस अवसर पर पूरे उत्तराखंड में बड़े स्तर पर पौधारोपण अभियान चलाए जाते हैं, ताकि पर्यावरण संरक्षण का संदेश समाज तक पहुंचे।
8. हरेला पर ‘जी रया, जागि रया’ का क्या अर्थ है?
यह उत्तराखंड का पारंपरिक आशीर्वाद है, जिसका अर्थ है कि व्यक्ति स्वस्थ रहे, दीर्घायु हो, जीवन में खुशहाल और समृद्ध बने।
9. क्या हरेला केवल उत्तराखंड में ही मनाया जाता है?
हरेला मुख्य रूप से उत्तराखंड, विशेषकर कुमाऊं क्षेत्र का प्रमुख लोकपर्व है। हालांकि राज्य के बाहर रहने वाले उत्तराखंड मूल के लोग भी इसे पूरे उत्साह के साथ मनाते हैं।
10. हरेला पर्व का पर्यावरण से क्या संबंध है?
हरेला प्रकृति, जल, जंगल और जैव विविधता के संरक्षण का संदेश देता है। यह पर्व लोगों को अधिक से अधिक पेड़ लगाने और पर्यावरण बचाने के लिए प्रेरित करता है।
इनपुट – ललित जोशी (संवाददाता नैनीताल)
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Politics
ग्राम पंचायतों में उप प्रधान चुनाव के लिए मतदान जारी, आज शाम ही 4 बजे से होगी मतगणना

Uttarakhand Politics : उत्तराखंड में हरिद्वार जिले को छोड़कर शेष सभी जिलों की ग्राम पंचायतों में उप प्रधान के 7,466 पदों के लिए आज मतदान हो रहा है। राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव प्रक्रिया को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष ढंग से संपन्न कराने के लिए पूरे इंतजाम किए हैं।
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ग्राम पंचायतों में उप प्रधान चुनाव के लिए मतदान जारी
प्रदेश में ग्राम पंचायतों में उप प्रधान चुनाव के लिए मतदान जारी है। बता दें कि उप प्रधान के लिए मतदान दोपहर 1:30 बजे से 3:30 बजे तक होगा। जबकि मतदान समाप्त होने के तुरंत बाद शाम 4 बजे से मतगणना शुरू होगी। दोपहर डेढ़ बजे से मतदान शुरू हो गया है जो कि अभी जारी है।

आज ही चुनाव परिणाम आज ही किए जाएंगे घोषित
चुनाव आयोग के अनुसार मतों की गिनती पूरी होने के बाद आज ही चुनाव परिणाम घोषित कर दिए जाएंगे। जिससे सभी ग्राम पंचायतों में उप प्रधान पदों पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की तस्वीर साफ हो जाएगी।
मतदान केंद्रों पर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम
चुनाव प्रक्रिया को सुचारु रूप से संपन्न कराने के लिए मतदान केंद्रों पर सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्थाएं भी सुनिश्चित की गई हैं। निर्वाचन आयोग ने सभी संबंधित अधिकारियों को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से मतदान और मतगणना संपन्न कराने के निर्देश दिए हैं।
Accident
बड़ी खबर : चमोली में तेज रफ्तार ट्रक ने बाइक सवार का कुचला, युवक की मौके पर ही मौत

Chamoli News : चमोली जिले के गोपेश्वर में आज दर्दनाक सड़क हादसा हो गया। तेज रफ्तार ट्रक ने बाइक सवार को टक्कर मार दी। जिस से उसकी मौके मौके पर ही मौत हो गई।
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चमोली में तेज रफ्तार ट्रक ने बाइक सवार का कुचला
चमोली जिले के गोपेश्वर में मंगलवार को एक दर्दनाक सड़क हादसे में एक युवक की जान चली गई। यह हादसा लीसा फैक्ट्री बाईपास मोड़ के पास हुआ, जहां तेज रफ्तार ट्रक ने बाइक सवार को टक्कर मार दी। दुर्घटना इतनी गंभीर थी कि युवक ट्रक के नीचे फंस गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गई।
बाइक सहित ट्रक के नीचे बुरी तरह फंसा युवक
पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार मृतक की पहचान मुकेश नेगी, पुत्र कलम सिंह, निवासी लॉ कॉलेज के समीप, गोपेश्वर के रूप में हुई है। हादसे की सूचना मिलते ही पुलिस और राहत दल मौके पर पहुंचे। युवक बाइक सहित ट्रक के नीचे बुरी तरह फंसा हुआ था। जिसे जेसीबी की सहायता से बाहर निकाला गया। इसके बाद उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
ट्रक चालक की लापरवाही के कारण हुआ हादसा
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि ट्रक चालक गवीलो गांव के पास सड़क किनारे खड़े कई वाहनों को टक्कर मारते हुए गोपेश्वर की ओर तेजी से बढ़ रहा था। रास्ते में पटियालधार पुलिस चौकी पर पुलिस ने उसे रोकने का प्रयास भी किया, लेकिन चालक बैरिकेड्स तोड़कर फरार हो गया।

बताया जा रहा है कि भागने के दौरान लीसा फैक्ट्री बाईपास मोड़ पर ट्रक ने मुकेश नेगी की बाइक को जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर के बाद युवक ट्रक के नीचे आ गया, जिससे उसकी घटनास्थल पर ही मौत हो गई।
पुलिस ने ट्रक चालक को किया गिरफ्तार
घटना के बाद पुलिस ने ट्रक चालक को हिरासत में लेकर गिरफ्तार कर लिया है। मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है और दुर्घटना के सभी पहलुओं की जांच जारी है।
हादसे के बाद मृतक के परिवार में शोक की लहर है। वहीं स्थानीय लोगों ने घटना को लेकर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि क्षेत्र में खनन सामग्री लेकर चलने वाले तेज रफ्तार ट्रकों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होने के कारण इस तरह की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं।
Dehradun
मसूरी-हाथीपांव रोड पर जंगल में युवक का शव मिलने से सनसनी, जांच में जुटी पुलिस

Mussoorie News : मसूरी-देहरादून मार्ग पर हाथीपांव मंदिर के समीप जंगल में मंगलवार को एक 22 वर्षीय युवक का शव संदिग्ध परिस्थितियों में मिलने से क्षेत्र में सनसनी फैल गई। सूचना मिलते ही मसूरी पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
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मसूरी हाथीपांव रोड पर जंगल में युवक का शव मिलने से सनसनी
मसूरी-देहरादून मार्ग पर हाथीपांव मंदिर के समीप जंगल में युवक का शव मिलने से सनसनी मच गई। पुलिस के अनुसार मृतक की पहचान सुमित पाल (22), निवासी देहरादून के रूप में हुई है। सुमित 10 जुलाई से लापता था और उसकी गुमशुदगी नेहरू कॉलोनी थाने देहरादून में दर्ज कराई गई थी।
10 जुलाई से लापता था मृतक
प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक वह अपनी बाइक से मसूरी आया था, लेकिन इसके बाद उसका कोई पता नहीं चल सका। बुधवार को हाथीपांव रोड नाग मंदिर के पास जंगल में उसका शव मिलने के बाद पुलिस ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण कर साक्ष्य जुटाए।
शव को जंगली जानवरों ने नोंचा
शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। जिसकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। वहीं शव को जगली जानवारों ने नुकसान पहुंचाया है। सड़ी-गली हालत में शव बरामद किया गया है। पुलिस का कहना है कि फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि मामला दुर्घटना, आत्महत्या या हत्या का है। सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर पुलिस मामले की जांच में जुट गई है।
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