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दिवाली से पहले बार-बार दिखाई दे रही हैं ये चीजें, तो समझिए खुलने वाली है आपकी किस्मत

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diwali

त्यौहारी सीजन शुरू हो गया है और दिवाली की तैयारियां जोरों से चल रही हैं। दीवाली से पहले कुछ चीजों का दिखना काफी शुभ माना जाता है। ऐसे में इन दिनों अगर कुछ चीजें आपको बार-बार दिखाई दे रही हैं तो वो आपको लक्ष्मी जी के आगमन का संकेत देती हैं।

दिवाली से पहले ये चीजें दिखने से खुल जाएगी आपकी किस्मत

दिवाली से पहले लोग कई दिनों पहले से ही सफाई में जुट जाते हैं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि साफ-सफाई से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। अगर ऐसे में आपको घर की सफाई करने के दौरान मोर पंख मिलता है तो ये एक शुभ संकेत है। ये मां लक्ष्मी के आपके घर में आगमन का संकेत देता है। ऐसी मान्यता है कि मोरपंख मिलने का अर्थ ये माना जाता है कि घर के सदस्यों पर माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा बरसने वाली है।

ये जानवर दिखना है बेहद शुभ

दिवाली से पहले कुछ जानवरों का घर आना या घर के आसपास देखा जाना भी बेहद ही शुभ माना जाता है। जिसमें उल्लू, छिपकली, छछूंदर या काली चींटी शामिल हैं। अगर इऩमें से कुछ भी आपके घर आते हैं या आसपास देखे जाते हैं तो इसे मां लक्ष्मी के प्रसन्न होने के रूप में देखा जाता है। अगर इन दिनों में रोजाना आपके घर के बाहर गाय आती है तो इसे भी शुभ संकेत माना जाता है। ऐसे में आपको गौ माता को रोटी जरूर खिलानी चाहिए।

diwali

सपनों में ये दिखना है अच्छा संकेत

diwali से पहले कुछ दिनों में आने वाले सपने भी खास संकेत देते हैं। स्वप्न शास्त्र में माना गया है कि अगर दीवाली से पहले सपने में शंख, ऊं या फिर देवी-देवताओं के दर्शन होना बेहद ही शुभ संकेत है।

इसके साथ ही अगर आप सपने में कोई मंदिर देखते हैं या फिर खुद को किसी मंदिर में जाते हुए देखते हैं तो इसका अर्थ है कि दिवाली पर आपके घर धन की देवी मां लक्ष्मी आने वाली है। आप पर मां लक्ष्मी की कृपा बरसने वाली है।

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मकर संक्रांति पर कुमाऊं में मनाया जाता है घुघुतिया त्यौहार, कौवों को भी जाता है बुलाया, जानें क्यों है ये खास

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Ghughutiya Festival

Ghughutiya Festival : मकर संक्रांति का त्यौहार देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर में प्रवेश करते हैं। इस त्यौहार को देशभर में मनाया जाता है लेकिन तरीके थोड़े अलग-अलग होते हैं। उत्तराखंड में जहां मकर संक्रांति गढ़वाल मंडल में खिचड़ी खाने का रिवाज है तो वहीं कुमाऊं में इसे घुघुतिया त्यौहार के रूप में मनाया जाता है।

मकर संक्रांति पर कुमाऊं में मनाया जाता है घुघुतिया त्यौहार

मकर संक्रांति पर जहां उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में खिचड़ी खाई जाती है। तो वहीं उत्तराखंड में इस दिन घुघुते बनाए जाते हैं। कुमाऊं में मकर संक्रांति पर पवित्र नदियों में स्नान करने के साथ दान तो किया ही जाता है। लेकिन इस दिन कुमाऊं में घुघुते (एक तरह का मीठा पकवान) बनाने का रिवाज है। घुघुते बनाकर कौवों को बुलाकर इन्हें कौवों को खिलाया जाता है।

बता दें कि घुघुतिया को कुमाऊं में दो दिन मनाया जाता है। पिथौरागढ़ के घाट से होकर बहने वाली सरयू नदी के पार वाले यानी कि पिथौरागढ़ और बागेश्वर वाले इसे मासांत को मनाते हैं। जबकि इसके अलावा पूरे कुमाऊं में इसे संक्रांति के दिन मनाया जाता है।

Ghughutiya Festival

पूरे कुमाऊं में देखने को मिलती है घुघुतिया या पुसुड़िया की धूम

Ghughutiya Festival को उत्तरायणी, मकरैणी, मकरौन, घोल्टा, घोल, खिचड़ी संक्रांत, पुसेड़िया और पुसुड़िया के नाम से भी जाना जाता है। इसे उत्तरैणी या उत्तरायणी इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, जिससे सूर्य की गति दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर हो जाती है। इसे ऋतु परिवर्तन का संकेत भी माना जाता है। पहाड़ों पर ऐसी मान्यता है कि इसी दिन से प्रकृति फिर से पहाड़ी इलाकों की ओर रुख करने लगती है।

कब मनाया जाता है Ghughutiya Festival ?

घुघुतिया त्यौहार मकर संक्रांति के दौरान मनाया जाता है। इसी दिन हिंदू पंचांग के मुताबिक माघ महीने की शुरुआत होती है। बता दें कि उत्तराखंड के कुमाऊं में माघ महीने के पहले दिन को माघ संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सूर्य भगवान उत्तरायण हो जाते हैं इसीलिए इसे उत्तरायणी या उत्तरायण भी कहा जाता है। इसी दिन बागेश्वर जिले में बहुत बड़ा मेला लगता है। पूरे कुमाऊं से इस मेले में लोग जुटते हैं। इसके साथ ही देश के कोने-कोने से लोग इस मेले को देखने के लिए पहुंचते हैं।

Ghughutiya Festival

कैसे मनाया जाता है घुघुतिया त्यौहार ?

मकर संक्रांति पर कुमाऊं में लोग खिचड़ी का दान करते हैं। जो कि दाल और चावल का मिश्रण होता है जो कि कोरा (यानी की बिना पका हुआ) होता है। इसके साथ ही इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और घुघुते बनाते हैं और कौवों को बुलाते हैं।

घुघुते एक प्रकार के मीठे पकवान हैं जिन्हें बनाने के लिए आटा, सूजी, सौंफ, गुड़ आदि का प्रयोग किया जाता है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले आटे और सूजी को मिलाया जाता है। इसके बाद इसमें सौंफ, कसा हुआ नारियल डालकर मिलाया जाता है। इसके बाद गुड़ के पानी से इसे गूंथा जाता है और आटा तैयार किया जाता है।

Ghughutiya Festival

इसके बाद बनाए घुघुते, तलवारें, डमरू आदि अलग-अलग आकृतियां बनाई जाती हैं। जिसके बाद इन्हें सुखाया जाता है और रात को तला जाता है। घुघुते त्यौहार के एक दिन पहले ही बनाए जाते हैं। त्यौहार वाले दिन इनकी मालाएं बनाई जाती हैं और बच्चे इन्हें गले में डालकर कौवों के बुलाते हैं। कौवों को बुलाते हुए बच्चे ये गीत जोर-जोर से गातें हैं —

  •    काले कौआ काले घुघुित माला खाले,
                                                      ले कौआ बड़, मकें दिजा सुनक घड़।
                                                      काले कौआ काले घुघुित माला खाले॥
                                                      ले कौआ पूरी, मकें दिजा सुन छुरी,
                                                      काले कौआ काले घुघुित माला खाले॥
                                                      ले कौआ डमरू मकें दिजा सुनक घुॅघंरू,
                                                      काले कौआ काले घुघुित माला खाले ।।
    • ले कौआ ढाल मकें दिजा सुनक थाल,
                                                        काले कौआ काले घुघुित माला खाले॥

क्यों मनाया जाता है घुघुतिया त्यौहार क्या है इसका इतिहास ?

Ghughutiya Festival तो पुराने जमाने से मनाया जा रहा है। इसके इतिहास की बात करें तो घुघुतिया को लेकर कई किवदंतिया हैं। कहा जाता है कि चंद वंश के राजा कल्याण चंद पत्नी के साथ एक बार बागेश्वर के बागनाथ मंदिर गए थे। उनकी कोई संतान नहीं थी इसलिए उन्होंने बागनाथ से संतान के लिए प्रार्थना की और बाघनाथ की कृपा से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई। जिसका नाम निर्भयचंद रखा गया लेकिन रानी उसे प्यार से घुघुति बुलाया करती थी।

Ghughutiya Festival

घुघुति के गले में गले में एक घुंघुरू लगी मोती की माला थी, जिसे पहनकर घुघुति खुश रहता था। जब भी कभी को जिद करता तो मां उसे डराने के लिए कहती थे कि इसे कौवा खा जाएगा और आवाज लगाती ‘काले कौवा काले घुघुति माला खा ले’ इसे सुनकर कौवे कई बार आ भी जाते। ऐसे करते-करते घुघुति की कौवों के साथ दोस्ती हो गई। एक दिन राजा का मंत्री गलत नीयत से घुघुति को जंगल की ओर ले जा रहा था। इसी दौरान रास्ते में एक कौवे ने ये देख लिया और जोर से कांव-कांव करने लगा। उसकी आवाज सुनकर घुघुति रोने लगा और अपनी माला दिखाने लगा।

घुघुतिया त्यौहार

देखते ही देखते बहुत सारे कौवे इकट्ठा हो गए। एक कौवा माला ले उड़ा और बाकी के कौवों ने मंत्री व उसके साथियों पर हमला कर दिया, जिससे वे डरकर भाग गए। कौवों की मदद से घुघुति सुरक्षित घर लौट आया। उसकी मां ने पकवान बनाकर कौवों को खिलाने को कहा। ऐसा कहा जाता है कि तभी से ये परंपरा धीरे-धीरे बच्चों के त्योहार में बदल गई, जिसे आज भी हर साल उत्साह से मनाया जाता है।

FAQs : घुघुतिया (Ghughutiya Festival)

Q1. घुघुतिया त्यौहार क्या है?
घुघुतिया उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में मकर संक्रांति पर मनाया जाने वाला पारंपरिक लोक पर्व है, जिसमें घुघुते बनाकर कौवों को खिलाए जाते हैं।

Q2. घुघुतिया त्यौहार कब मनाया जाता है?
यह पर्व मकर संक्रांति के दिन मनाया जाता है। कुमाऊं में इसे माघ महीने के पहले दिन यानी माघ संक्रांति के रूप में भी जाना जाता है।

Q3. घुघुतिया त्यौहार किन क्षेत्रों में मनाया जाता है?
यह मुख्य रूप से उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में मनाया जाता है। पिथौरागढ़ और बागेश्वर के कुछ क्षेत्रों में इसे मासांत के दिन भी मनाने की परंपरा है।

Q4. घुघुतिया को और किन नामों से जाना जाता है?
घुघुतिया को उत्तरायणी, उत्तरैणी, मकरैणी, मकरौन, घोल, घोल्टा, खिचड़ी संक्रांत, पुसेड़िया और पुसुड़िया जैसे नामों से भी जाना जाता है।

Q5. घुघुते क्या होते हैं?
घुघुते एक प्रकार के पारंपरिक मीठे पकवान होते हैं, जिन्हें आटा, सूजी, गुड़, सौंफ और नारियल से बनाकर तला जाता है।

Q6. घुघुतिया पर्व में कौवों को क्यों खिलाया जाता है?
लोककथा के अनुसार कौवों ने चंद वंश के राजकुमार घुघुति की जान बचाई थी। इसी स्मृति में कौवों को घुघुते खिलाने की परंपरा चली आ रही है।

Q7. घुघुतिया त्यौहार का बच्चों से क्या संबंध है?
यह पर्व खासतौर पर बच्चों से जुड़ा होता है। बच्चे घुघुतों की माला गले में डालकर कौवों को बुलाते हैं और पारंपरिक गीत गाते हैं।

Q8. घुघुतिया पर्व का धार्मिक महत्व क्या है?
इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तरायण होता है, जिसे शुभ माना जाता है। साथ ही पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है।

Q9. बागेश्वर का उत्तरायणी मेला क्यों प्रसिद्ध है?
मकर संक्रांति के दिन बागेश्वर में लगने वाला उत्तरायणी मेला कुमाऊं का सबसे बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक मेला माना जाता है, जिसमें दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।

Q10. घुघुतिया पर्व का सांस्कृतिक महत्व क्या है?
यह पर्व कुमाऊं की लोकसंस्कृति, लोकगीतों, परंपराओं और प्रकृति से जुड़ाव को दर्शाता है तथा सामूहिक उत्सव की भावना को मजबूत करता है।

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Happy Lohri 2026 Images: भेजें बेहतरीन कोट्स और फोटोज

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HAPPY LOHRI 2026 IMAGES

HAPPY LOHRI 2026 IMAGES: दोस्तों और परिवार को भेजें ये बेहतरीन कोट्स और फोटोज

HAPPY LOHRI 2026 IMAGES: कड़कड़ाती सर्द रातों में जब ढोल-नगाड़ों की थाप और लोकगीतों की मधुर धुन सुनाई दे, तो समझ लीजिए कि लोहड़ी का त्योहार मनाया जा रहा है। खासकर पंजाब और उत्तर भारत में लोग आग के चारों ओर इकट्ठा होकर रेवड़ी, मूंगफली और गजक चढ़ाते हैं और खुशी के साथ नाच-गाना करते हैं। यह त्योहार न सिर्फ फसल कटाई और नए मौसम के स्वागत का प्रतीक है।

बल्कि परिवार और समुदाय को करीब लाने का भी अवसर देता है। माना जाता है कि लोहड़ी की परंपरा प्राचीन काल से जुड़ी है, जब लोग सूर्य के उत्तरायण होने पर प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते थे। धीरे-धीरे यह त्योहार लोककथाओं, वीरता की कहानियों और सामाजिक एकता का उत्सव बन गया। आज भी लोहड़ी लोगों के जीवन में गर्माहट, खुशी और नई उम्मीदों की लौ जलाने का काम करती है।

HAPPY LOHRI WISHES 2026

अगर आप भी अपने दोस्तों और परिवार को लोहड़ी की शुभकामनाएं देना चाहते हैं, तो इन प्यारे मैसेज और फोटो के जरिए अपनी बधाइयाँ ज़रूर भेजें। लोहड़ी का यह खुशनुमा त्योहार रिश्तों में मिठास घोलता है और अपनों के चेहरों पर मुस्कान ले आता है। जलती अग्नि की तरह आपकी जिंदगी भी रोशनी और गर्माहट से भर जाए, इसी कामना के साथ लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाएं अपने प्रियजनों तक पहुँचाएँ और इस त्योहार को और भी यादगार बना दें।

HAPPY LOHRI PHOTOS

लोहड़ी की अग्नि आपकी जिंदगी से अंधकार मिटाए और खुशियों की रोशनी लाए।

“तिल की मिठास, रेवड़ी की बहार—लोहड़ी का त्यौहार लाए खुशियों की बौछार।”

“ढोल की थाप और आग की गर्माहट के साथ, लोहड़ी लाए खुशियों की सौगात।”

सी-खुशी, प्यार-दुलार—लोहड़ी का त्यौहार करे सबका उद्धार।”

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क्या आप जानते हैं कैसे हुई थी लोहड़ी मनाने की शुरूआत ?, इतिहास जानकर चौंक जाएंगे आप

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क्या आप जानते हैं कैसे हुई थी लोहड़ी मनाने की शुरूआत ?, इतिहास जानकर चौंक जाएंगे आप

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lohri 2026

Lohri 2026 : कड़कड़ाती ठंड में उत्तर भारत में रात को अगर आपको ढोल नगाड़ों के साथ गीतों की धुन सुनाई दे तो समझ जाइए लोहड़ी का त्यौहार मनाया जा रहा है। पंजाब में जब सर्द रात में आग की लपटों के साथ लोकगीतों की धुनों के साथ लोहड़ी का त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे क्यों मनाया जाता है और इसे मनाने की शुरूआत कैसे हुई थी ?

कैसे हुई थी Lohri मनाने की शुरूआत ?

मकर सक्रांति से ठीक एक दिन पहले लोहड़ी का त्यौहार मनाया जाता है। यूं तो पूरे उत्तर भारत में इसकी धूम देखने को मिलती है। लेकिन खासकर पंजाब में इस त्यौहार को धूमधाम से मनाया जाता है। पंजाब में इस त्यौहार को जिन लोगों की नई-नई शादी हुई हो या बच्चा हुआ हो उनके लिए बेहद ही खास माना जाता है। बात करें इस त्यौहार को मनाने की शुरूआत की तो इस त्यौहार को मुगलशासकों के विरुद्ध न्याय की लड़ाई लड़ने वाले लोकप्रिय नायक हिन्दू गुर्जर दुल्ला भट्टी की याद में मनाया जाता है।

Lohri 2026

ऐसा कहा जाता है कि दुल्ला भट्टी हर किसी की मदद किया करते थे। एक बार उन्होंने एक ब्राह्मण की कन्या जिसका नाम सुंदर मुंदरिए था, उसे मुगलों से बचाया। मुगलों से बचाने के लिए उसका विवाह सुयोग्य हिन्दू वर से करवाया था। दुल्ला भाटी पंडित तो था नहीं इसलिए दोनों के विवाह के लिए उन्होंने आस-पास पड़ी लकड़ियों और गोबर के उपले इकटेठे किए और उन्हें जला दिया। इस दौरान उनके पास मूंगफली, रेवड़ी जैसी कुछ खाने की चीज़ें थी जिन्हें भी उसने आग में डाला और दोनों की शादी करवा दी।

दुल्ला भाटी की याद में मनाया जाता है लोहड़ी का त्यौहार

सुन्दर मुंदरिए की शादी के दौरान दुल्ला भाटी ने एक गीत गाया था जो कि कुछ इस प्रकार था – सुंदर मुंदरिए तेरा कौन विचारा, दुल्ला भट्टीवाला। दुल्ले दी धी व्याही, सेर शक्कर पायी, कुड़ी दा लाल पता। शादी तो हो गई लेकिन मुगलों ने दुल्ला भट्टी पर हमला कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। तभी से दुल्ला भाटी की याद में हर साल 13 जनवरी को Lohri का त्यौहार मनाया जाता है।

रबी की फसल के स्वागत का प्रतीक भी है लोहड़ी

दुल्ला भट्टी के अलावा ही इस त्यौहार को शीत ऋतु के विदा होने और रबी की फसल के स्वागत का प्रतीक भी माना जाता है। लोहड़ी हर साल मकर संक्रांति से एक दिन पहले आती है। इसे सूर्य, अग्नि और फसल से जुड़ा हुआ त्यौहार भी माना जाता है।

Lohri 2026

ये दिन सूर्य के उत्तरायण होने से पहले की अंतिम रात का संकेत माना जाता है। किसान समाज के लिए इसका विशेष महत्व है, क्योंकि इसी दौर में गेहूं की फसल पकने की ओर बढ़ती है। इस दिन आग की परिक्रमा की जाती है और रेवड़ी, मूंगफली चढ़ाने के साथ खाई भी जाती है। अलाव के चारों ओर घूमकर तिल, गुड़, मूंगफली और रेवड़ी अर्पित करना प्रकृति के प्रति आभार और धन्यवाद व्यक्त करने की परंपरा को दर्शाता है।

Lohri का ऐतिहासिक और सांस्कृति महत्व

लोहड़ी की परंपरा का संबंध लोकनायक दुल्ला भट्टी से है। जिन्हें पंजाब का रॉबिनहुड कहा जाता है। उन्होंने अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया और गरीब व असहाय बेटियों के विवाह में सहयोग देकर समाज में मिसाल कायम की। इसी लिए आज भी उन्हें याद किया जाता है। पंजाब के लोकगीतों में आज भी उनका जिक्र जरूर होता है।

Lohri 2026

Lohri नवविवाहित दंपतियों और नवजात शिशु वाले परिवारों के लिए बेहद खास है। इस दिन भांगड़ा, गिद्धा, ढोल की गूंज और सामूहिक नृत्य इस पर्व में उल्लास भर देते हैं। यो त्योहार सामूहिक खुशियों का महत्व समझाता है बल्कि ये भी याद दिलाता है कि यही परंपराएं समाज और पीढ़ियों को एक सूत्र में बांधती हैं।

FAQs: Lohri 2026 – लोहड़ी का इतिहास

Q1. लोहड़ी कब मनाई जाती है?
लोहड़ी हर साल 13 जनवरी को मनाई जाती है। यह मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले आती है।

Q2. लोहड़ी का सबसे ज्यादा महत्व किस राज्य में है?
लोहड़ी का विशेष महत्व पंजाब में है, हालांकि उत्तर भारत के कई हिस्सों में भी यह पर्व उत्साह के साथ मनाया जाता है।

Q3. लोहड़ी का संबंध दुल्ला भाटी से क्यों जोड़ा जाता है?
लोहड़ी का इतिहास लोकनायक दुल्ला भाटी से जुड़ा है, जिन्होंने मुगल अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष किया और गरीब बेटियों की मदद की। उनकी याद में ही लोहड़ी के गीत गाए जाते हैं।

Q4. लोहड़ी पर आग जलाने की परंपरा क्यों है?
अलाव जलाना अग्नि देव को समर्पण, ठंड के अंत और नई फसल के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। यह प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का भी तरीका है।

Q5. लोहड़ी पर क्या-क्या चढ़ाया जाता है?
लोहड़ी के दिन तिल, गुड़, मूंगफली, रेवड़ी और पॉपकॉर्न अग्नि में अर्पित किए जाते हैं और इन्हें प्रसाद के रूप में खाया भी जाता है।

Q6. किसानों के लिए लोहड़ी क्यों खास है?
यह पर्व रबी की फसल, खासकर गेहूं की अच्छी पैदावार की उम्मीद और उसके स्वागत का प्रतीक है।

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शिक्षक दिवस के अवसर पर इस शराबी शिक्षक का वीडियो सोशल मिडिया पर जमकर हो रहा वायरल !

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VIDEO: महिला की शिकायत पर हुआ नैनीताल दुग्ध संघ के अध्यक्ष पर मुकदमा दर्ज, दुष्कर्म का आरोप।

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रामनगर: क़ब्रिस्तान की ज़मीन को लेकर विवाद, दफनाने से पहले उठा बवाल |

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हरिद्वार: गंगा घाट किनारे पेड़ पर लिपटा मिला अजगर, वन विभाग ने किया सुरक्षित रेस्क्यू

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हरिद्वार में बीजेपी नेता की दबंगई कैमरे में कैद, अफसर पर बरसे अपशब्द, चुप्पी पर उठे सवाल

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“सासाराम की मुस्लिम महिलाओं ने रचाया मेहंदी से ‘ऑपरेशन सिन्दूर’, पीएम मोदी के स्वागत में गूंजा एकता का संदेश|

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भदोही में खाकी शर्मसार: रिश्वत लेते पकड़े गए पुलिसकर्मी, वीडियो वायरल |

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“चकराता के टाइगर फॉल में प्रकृति का कहर — भारी पेड़ और पत्थरों के गिरने से 2 की मौके पर मौत, कई घायल |

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मेरठ में महिला के साथ सड़क पर अश्लील हरकत करने वाला युवक वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस की गिरफ्त में |

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वायरल-होने-का-शौक-पड़ा-भारी-—-देहरादून-पुलिस-ने-स्टंटबाज़-युवती-पर-की-चालानी-कार्रवाई |

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ब्रेकिंग न्यूज़ | चमोली जिले के पोखरी ब्लॉक के हापला बाजार में उद्यान विभाग के कर्मचारी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई।

Nainital8 months ago

नैनीताल: राज्यपाल गुरमीत सिंह ने किए मां नैना देवी के दर्शन, प्रदेश की सुख-शांति की कामना की….

Crime1 year ago

खेत की मेढ़ काटने को लेकर दो पक्षों के बीच खूनी संघर्ष का वीडियो सोशल मिडिया पर वायरल….

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उत्तराखंड: पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत और डीजीपी अभिनव कुमार आमने-सामने, त्रिवेंद्र ने आखिर क्यों DGP को दी हद में रहने की सलाह ?

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देहरादून: मुख्यमंत्री धामी ने भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े का किया भव्य स्वागत…

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ब्रेकिंग न्यूज़ देहरादून: आईपीएस रचिता जुयाल ने निजी कारणों से दिया इस्तीफा…

Crime8 months ago

हल्द्वानी: बनभूलपुरा क्षेत्र में युवक की पत्थर से कुचलकर हत्या, एक हिरासत में…

Dehradun8 months ago

देहरादून में स्मार्ट ऑटोमेटेड पार्किंग का कार्य अंतिम चरण में, ट्रैफिक जाम से मिलेगी राहत…

Chamoli8 months ago

श्रद्धालुओं को ठगने बद्रीनाथ पहुंचा मोबाइल माफिया गैंग , पुलिस ने 6 को रंगे हाथों पकड़ा…

Crime8 months ago

कारोबारी को सेल्समैन ने लगाया 9 लाख से ज्यादा का चूना, फर्जी पेमेंट बुक से की ठगी, मुकदमा दर्ज…

Rudraprayag8 months ago

रुद्रप्रयाग: जखोली में फिर गुलदार का कहर, महिला की मौत से दहशत, वन विभाग के खिलाफ ग्रामीणों में आक्रोश….

Dehradun8 months ago

देहरादून समेत उत्तराखंड के कई जिलों में आज भी बारिश, मौसम विभाग ने येलो अलर्ट किया जारी….

Dehradun8 months ago

अंकिता भंडारी हत्याकांड में इंसाफ की जीत, धामी सरकार की सख्ती से टूटा रसूखदारों का गुरूर…

Dehradun8 months ago

ऋषिकेश रेंज के जंगल में पत्ते लेने गए युवकों पर बाघ का हमला, एक की मौत, दूसरा घायल….

Dehradun8 months ago

राजभवन नैनीताल में मनाया गया गोवा स्थापना दिवस, राज्यपाल गुरमीत सिंह ने एक भारत, श्रेष्ठ भारत का दिया संदेश….

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उत्तराखंड में पूर्व सैनिकों के लिए बनेगा विशेष ट्रेनिंग सेंटर: मुख्यमंत्री धामी

Rudraprayag8 months ago

केदारनाथ धाम यात्रा: सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद केदारनाथ यात्रा मार्ग पर नहीं होगा घोड़े-खच्चरों का संचालन….

Nainital8 months ago

20वें गवर्नर्स कप गोल्फ टूर्नामेंट का राज्यपाल गुरमीत सिंह ने किया उद्घाटन, पहले दिन 70 गोल्फरों ने लिया भाग…

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अंकिता भंडारी हत्याकांड: तीनों दोषियों को उम्रकैद की सजा, कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला…

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