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Dehradun AQI : देहरादून बना गैस चैंबर !, AQI पहुंचा 329 के पार, हवा हुई ‘बहुत खराब’

Dehradun AQI 1 JAN 2026 : देहरादून की हवा दिन पर दिन खराब होती जा रही है। अब देहरादून की हवा भी सांस लेने लायक नहीं रह गई है। 31 दिसंबर को जहां एक ओर लोग नए साल का जश्न मना रहे थे। तो वहीं दूसरी ओर ऐसी खबर आई जिसने सभी को चौंका दिया। 31 दिंसबर को देहरादून का एक्यूआई 300 के पार पहुंच गया।
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राजधानी देहरादून का AQI पहुंचा 329 के पार
पहाड़ों की रानी मसूरी का द्वार कहलाने वाला, कभी अपनी शुद्ध और सुकून देने वाली आबोहवा के लिए मशहूर देहरादून, आज दम घोंटती हवा के साए में कराह रहा है। जिस शहर में सांस लेना राहत हुआ करता था, वहीं अब हर सांस के साथ खतरा बढ़ता जा रहा है। देहरादून में दिन पर दिन एक्यूआई बढ़ता जा रहा है और देहरादून भी दिल्ली बनता जा रहा है। देहरादून का एक्यूआई ऋषिकेश (Rishikesh AQI) से

देहरादून की हवा की गुणवत्ता पहुंची बहुत खराब श्रेणी में
देहरादून की हवा की गुणवत्ता बहुत से बहुत खराब स्थित में पहुंच गई है। बीते दो दिनों से देहरादून का एक्यूआई 300 के पार पहुंच रहा है। 31 दिसंबर की रात तो देहरादून का एक्यूआई 329 के पार दर्ज किया गया। देहरादून में एक्यूआई लगातार दूसरे दिन बहुत खराब श्रेणी में दर्ज किया गया गया।

देश के सबसे ज्यादा खराब हवा वाले 15 शहरों में दून भी शामिल
हैरानी की बात तो ये है कि देहरादून अब देश के सबसे ज्यादा खराब हवा वाले शहरों में से एक है। शहरों में एक्यूआई को लेकर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड रिपोर्ट जारी करता है। जिसके मुताबिक 242 शहरों के एक्यूआई में 15 शहर ऐसे हैं जहां हवा की गुणवत्ता बहुत खराब है।
देश के 15 ऐसे शहर जहां पर हवा बहुत खराबश्रेणी में है उनमें अब देहरादून भी शुमार है। बता दें कि देहरादून में बुधवार को भी वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 318 दर्ज किया गया था। जबकि इससे पहले 28 दिसंबर को AQI 301 तक पहुंच गया था।

ऋषिकेश की हवा देहरादून से बेहतर
बता करें उत्तराखंड के अन्य शहरों की तो देहरादून जिले का ही ऋषिकेश अच्छी स्थिति में है। ऋषिकेश की स्थिति तुलनात्मक देहरादून से ठीक है। बता दें कि बुधवार को ऋषिकेश का एक्यूआई (Rishikesh AQI) 136 दर्ज किया गया। जो कि देहरादून से लगभग आधा है।

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सरकारी नौकरी तो मिली, लेकिन छूट रहा खेल !, दुविधा में ‘आउट ऑफ टर्न’ जॉब वाले खिलाड़ी…

Uttarakhand News : उत्तराखंड सरकार राज्य को खेलों के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। इसी उद्देश्य से उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को आउट ऑफ टर्न सरकारी नौकरी देने की व्यवस्था लागू की गई है, ताकि उन्हें आर्थिक सुरक्षा के साथ बेहतर भविष्य मिल सके। लेकिन अब इस व्यवस्था से जुड़े कुछ व्यावहारिक मुद्दे सामने आने लगे हैं। जिस कारण खिलाड़ी परेशान हैं।
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दुविधा में ‘आउट ऑफ टर्न’ जॉब वाले खिलाड़ी
सरकारी विभागों में नियुक्ति मिलने के बाद कई खिलाड़ियों को अपने कार्यालयी दायित्वों और खेल अभ्यास के बीच तालमेल बैठाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। खिलाड़ियों का कहना है कि नियमित सरकारी कार्यों के कारण उन्हें अभ्यास और प्रतियोगिताओं की तैयारी के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता, जिससे उनके प्रदर्शन और खेल करियर पर असर पड़ने की आशंका बढ़ रही है।

अभ्यास और प्रतियोगिताओं के लिए नहीं मिल रहा समय
कई खिलाड़ियों के अभ्यास उस शहर में नहीं है जहां उन्हें नियुक्ति दी मिली है। जिस कारण उन्हें अभ्यास पर जाने के लिए भी विभाग या फिर खेल विभाग की अनुमति का इंतजार करना पड़ रहा है। खिलाड़ियों का कहना है कि इस कारण उन्हें भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। जिस कारण ना तो वो अपने खेल पर ध्यान दे पा रहे हैं ना ही नौकरी पर ही ध्यान दे पा रहे हैं।
राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों ने रखी अपनी बात
राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर चुके एथलीट सूरज पंवार और अंकित रावत ने भी इस विषय पर चिंता जताई है। सूरज पंवार वर्तमान में युवा कल्याण विभाग में कार्यरत हैं, जबकि अंकित रावत वन विभाग में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दोनों खिलाड़ियों का कहना है कि सरकारी जिम्मेदारियों के साथ-साथ खेल की तैयारी करना बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो जाता है।
सरकार कर रही समाधान पर मंथन
खिलाड़ियों की इन समस्याओं को देखते हुए खेल विभाग और राज्य सरकार ऐसी नीति तैयार करने पर विचार कर रहे हैं, जिससे सरकारी नौकरी कर रहे खिलाड़ियों को अभ्यास, प्रशिक्षण और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए आवश्यक समय और सुविधाएं मिल सकें। माना जा रहा है कि नई व्यवस्था खिलाड़ियों के करियर को सुरक्षित रखने के साथ-साथ राज्य में खेल संस्कृति को भी मजबूती दे सकती है।
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BJP में बवाल ! प्रदेश अध्यक्ष के सामने लगे ‘मुर्दाबाद’ के नारे, टिहरी विधायक के खिलाफ बगावत !

Uttarakhand Politics : उत्तराखंड की राजनीति में गुटबाजी केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है। जिस भाजपा ने हमेशा कांग्रेस पर आंतरिक कलह और धड़ो में बंटी पार्टी का आरोप लगाय और खुद को अनुशासित संगठन बताया, अब उसी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। हैरानी की बात यह है कि यह तस्वीर तब सामने आ रही है, जब विधानसभा चुनाव नजदीक हैं।
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BJP प्रदेश अध्यक्ष के सामने लगे ‘मुर्दाबाद’ के नारे
दरअसल भाजपा प्रदेश अध्यक्ष टिहरी दौरे पर थे इस दौरान उन्हें पार्टी कार्यकर्ताओं के विरोध का सामना करना पड़ा। कार्यकर्ताओं ने महेंद्र भट्ट के सामने ही विधायक किशोर उपाध्याय मुर्दाबाद के नारे लगाए। इस दौरान महेंद्र भट्ट कार्यकर्ताओं को समझाते हुए भी नजर आए लेकिन कार्यकर्ताओं ने उनकी एक नहीं सुनी।
टिहरी विधायक किशोर उपाध्याय के खिलाफ बड़ी बगावत
कार्यकर्ताओं ने स्थानीय विधायक पर तुष्टिकरण की राजनीति के आरोप लगाए। ये आरोप किसी गैर दल के कार्यकर्ता लगाते तो समझ आता लेकिन पार्टी के अध्यक्ष के सामने ही अपने ही पार्टी के विधायक के खिलाफ इस तरीके की नारेबाजी साफ-साफ इशारा करती है कि टिहरी में बीजेपी के भीतर घमासान मचा हुआ है।

बीजेपी को 2027 में भुगतना पड़ सकता है खामियाजा
इस विरोध से साफ है कि ये गुस्सा आगामी विधानसभा चुनाव से पहले ज्वाला बनकर फूट सकता है। जिसका खामियाजा बीजेपी को 2027 के चुनावों में भुगतना पड़ सकता है। इसकी वजह ये है कि सारे मौजूदा और पूर्व विधायक एक ही पार्टी भाजपा की शरण में आ गए हैं। ऐसे में भाजपा के भीतर सिर फुट्टवल की स्थिति थमेगी या फिर और रायता फैलाएगी ये तो आने वाला समय ही बताएगा।
पार्टी नेतृत्व पर टिकी सभी की निगाहें
अब सवाल ये है कि क्या पार्टी नेतृत्व समय रहते इन नाराजगी की आवाज़ों को शांत कर पाएगा, या फिर यह अंदरूनी कलह आने वाले दिनों में और गहराएगी? क्योंकि चुनाव से पहले अगर संगठन में ही असंतोष बढ़ता है, तो उसका असर चुनावी नतीजों पर भी पड़ सकता है।
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उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड का आखिरी दिन आज, कल से अस्तित्व में आएगा अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण

Uttarakhand News : उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा बदलाव 1 जुलाई 2026 से लागू होने जा रहा है। राज्य सरकार ने उत्तराखंड मदरसा बोर्ड को समाप्त करने का निर्णय लागू कर दिया है। इसके साथ ही प्रदेश के सभी मदरसों को अब नई व्यवस्था के तहत उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से मान्यता लेनी होगी और उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से संबद्धता प्राप्त करनी होगी।
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उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड का आखिरी दिन आज
मंगलवार, 30 जून यानी कि आज उत्तराखंड मदरसा बोर्ड का अंतिम कार्य दिवस है। इसके बाद 1 जुलाई से उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण आधिकारिक रूप से कार्यभार संभालेगा। प्रदेश के सभी 452 मदरसों को नई व्यवस्था के तहत पंजीकरण और मान्यता की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
कल से अस्तित्व में आएगा अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण
नई नियमावली के अनुसार किसी भी मदरसे को मिलने वाली मान्यता तीन शैक्षणिक वर्षों के लिए वैध रहेगी। इसके अलावा संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से विधिवत संबद्धता भी प्राप्त करनी होगी। प्राधिकरण समय-समय पर मदरसों का भौतिक निरीक्षण करेगा और निर्धारित मानकों के पालन की समीक्षा करेगा।

सरकार द्वारा जारी नियमों के अनुसार मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों के अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान भी प्राधिकरण के दायरे में आएंगे। संस्थानों को निर्धारित सरकारी पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करना होगा तथा आवश्यक दस्तावेज और निर्धारित शुल्क जमा करना होगा।
1 जुलाई 2026 से नई व्यवस्था होगी लागू
मान्यता प्रक्रिया के दौरान संस्थान की अल्पसंख्यक पहचान, भूमि संबंधी दस्तावेज, वित्तीय स्थिति, शिक्षकों की योग्यता और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की प्रतिबद्धता जैसे पहलुओं की जांच की जाएगी। अगर कोई संस्थान नियमों का उल्लंघन करता है तो उसकी मान्यता निरस्त की जा सकती है।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में 14 मई 2026 को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान संबंधी मान्यता नियमावली-2026 को मंजूरी दी गई थी। इसी निर्णय के आधार पर 1 जुलाई 2026 से मदरसा बोर्ड को समाप्त कर नई व्यवस्था लागू की जा रही है।
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