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कौन थे स्वामी विवेकानंद, जानिए सम्पूर्ण जीवन परिचय, शिक्षा Read More……

SWAMI VIVEKANANDA: आध्यात्मिक जागरण, राष्ट्रनिर्माण और विश्वबंधुत्व का प्रखर स्वर
मुख्य बिंदु
SWAMI VIVEKANANDA का जीवन केवल एक संन्यासी की जीवनी नहीं है, बल्कि ये आधुनिक भारत के बौद्धिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की कहानी भी है। उन्होंने भारतीय दर्शन को नए रूप में दुनिया के सामने रखा, वहीं दूसरी ओर उन्होंने युवाओं के अंदर आत्मविश्वास और राष्ट्रभक्ति की ज्वाला भी प्रज्वलित की। इसलिए, आज भी उन्हें केवल एक आध्यात्मिक गुरु नहीं बल्कि विचारों के महान क्रांतिकारी के रूप में माना जाता है।
उनका व्यक्तित्व विविध रंगों से भरा रहा – वो अपने जीवन काल के दौरान कुशल वक्ता, चिंतक, संन्यासी, समाज सुधारक, राष्ट्र प्रेरक और मानवतावादी सोच वाले महान पुरुष रहे हैं। इसीलिए, जैसे-जैसे उनका जीवन गहराई से समझा जाता है, वैसे-वैसे ये स्पष्ट होता जाता है कि विवेकानंद सिर्फ अतीत के नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के भी पथप्रदर्शक हैं।
VIVEKANANDA BIOGRAPHY : जन्म और शुरूआती जीवन
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ। उनका बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। पिता विश्वनाथ दत्त एक प्रतिष्ठित वकील थे, जिनका स्वभाव आधुनिक और व्यवहारिक था। इसके विपरीत, उनकी माँ भुवनेश्वरी देवी धार्मिक और आध्यात्मिक प्रवृत्ति की थीं। जिससे, नरेन्द्रनाथ के व्यक्तित्व में तर्क और आस्था दोनों का अद्भुत संयोजन देखने को मिला।
बचपन से ही वो जिज्ञासु, तेजस्वी और ऊर्जा से भरपूर थे। वो अक्सर ईश्वर के अस्तित्व और जीवन के उद्देश्य जैसे गहरे प्रश्न पूछते। यहीं से उनके चिंतनशील स्वभाव की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे ये जिज्ञासा उन्हें आध्यात्मिक खोज की दिशा में ले गई।
VIVEKANANDA EDUCATION : शिक्षा और व्यक्तित्व गठन
NARENDRANATH की शिक्षा कोलकाता के प्रतिष्ठित संस्थानों में हुई। वे पढ़ाई में काफी तेज़ थे और संगीत, खेल और व्यायाम में भी रुचि रखते थे। दर्शन, इतिहास, पश्चिमी विचारधाराओं और भारतीय शास्त्रों का गहन अध्ययन उन्होंने युवावस्था में ही कर लिया था।
इसके अलावा, वो तर्कशीलता के समर्थक थे। वे केवल मान लेने के पक्षधर नहीं थे, बल्कि हर बात का कारण जानना चाहते थे। इसलिए, आगे चलकर जब वेदांत और उपनिषदों से उनका साक्षात्कार हुआ, तो उन्होंने इन विचारों को अंधविश्वास की तरह नहीं अपनाया, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ समझा।
RAMKRISHN PARAMHANS से मुलाकात – जीवन का निर्णायक मोड़
NARENDRANATH के जीवन की वास्तविक दिशा तब बदली, जब वे श्री रामकृष्ण परमहंस से मिले। वे दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में पूजारी थे। NARENDRANATH के प्रश्नों का जिस सरलता और प्रेम से रामकृष्ण परमहंस ने उत्तर दिया, उसने उनका जीवन परिवर्तित कर दिया।
यहीं से उन्होंने जाना कि—
“प्रत्येक मनुष्य के भीतर ईश्वर है और मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है।”
धीरे-धीरे उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और अपना जीवन गुरु की शिक्षाओं के अनुसार समाज सेवा और आध्यात्मिक उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। रामकृष्ण के महाप्रयाण के बाद विवेकानंद ने उनके मिशन को संगठित रूप दिया। जिसे रामकृष्ण परमहंस मिशन के नाम से भी जाना जाता है।
संन्यास और अखिल भारतीय यात्रा
संन्यास ग्रहण करने के बाद विवेकानंद ने पूरे भारत का भ्रमण किया। उन्होंने राजाओं के महलों से लेकर गरीब झोपड़ियों तक का जीवन बहुत करीब से देखा। इसके बाद, उन्हें महसूस हुआ कि भारत की वास्तविक समस्या गरीबी, अशिक्षा और आत्मविश्वास की कमी है।
इसलिए उन्होंने कहा—
पहले मनुष्य बनो
अपने भीतर की शक्ति पहचानो
राष्ट्र के लिए जियो
यहीं से उनका सामाजिक और राष्ट्रीय चिंतन और अधिक प्रखर हुआ।
शिकागो की विश्व धर्म संसद – वैश्विक मंच पर भारत की गूंज
सन् 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद आयोजित हुई। SWAMI VIVEKANANDA ने इसमें भारत का प्रतिनिधित्व किया। प्रारंभ में उन्हें भाषण का मौका आसानी से नहीं मिला, लेकिन जब वो मंच पर पहुंचे, तो उनका पहला वाक्य—
“Sisters and Brothers of America”
सुनते ही पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। उनके उद्बोधन ने विश्व को यह सिखाया कि धर्म आपसी द्वेष नहीं, बल्कि मानवता और प्रेम का मार्ग है। इसके बाद वे अनेक देशों में गए, व्याख्यान दिए और भारतीय दर्शन का संदेश फैलाया।
रामकृष्ण मिशन की स्थापना (RAMKRISHN MISSION)
भारत लौटने के बाद उन्होंने 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। यह केवल धार्मिक संस्था नहीं, बल्कि सेवा और करुणा का संगठन था। मिशन ने शिक्षा, स्वास्थ्य, राहत कार्यों और सामाजिक सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज भी यह संस्था देश-विदेश में मानव सेवा का बड़ा केंद्र है। यही स्वामी विवेकानंद के विचारों की जीवंत विरासत है।
नारी सम्मान और मानवतावादी सोच
SWAMI VIVEKANANDA के विचारों में स्त्री सम्मान का विशेष स्थान था। वे मानते थे कि समाज तभी प्रगति कर सकता है जब महिला शिक्षित और सम्मानित हो। विदेश में घटी एक घटना इसका सुंदर उदाहरण है। एक महिला उनके विचारों से प्रभावित होकर विवाह प्रस्ताव लेकर आई। विवेकानंद ने शांत स्वर में कहा—
“मैं संन्यासी हूँ, विवाह नहीं कर सकता। यदि चाहो तो मुझे पुत्र मान लो।”
इस जवाब के पीछे यह संदेश छिपा था कि नारी कोई वस्तु नहीं, बल्कि सम्मान योग्य व्यक्तित्व है। इसलिए वे हर परिस्थिति में मर्यादा और सम्मान की बात करते रहे।
SWAMI VIVEKANANDA- NATIONAL YOUTH DAY
स्वामी विवेकानंद मानते थे कि भारत का भविष्य युवाओं के हाथ में है। इसलिए उन्होंने युवाओं से आह्वान किया—
उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको नहीं
अपने भीतर की शक्ति पहचानो
निर्भीक बनो, आत्मविश्वासी बनो
इसी कारण भारत सरकार ने 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस (NATIONAL YOUTH DAY) के रूप में मनाने का निर्णय लिया। उनका जीवन आज भी करोड़ों युवाओं को संघर्ष, परिश्रम और राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा देता है।
आध्यात्मिक विचारधारा और वेदांत का संदेश
स्वामी विवेकानंद की सोच का मूल आधार वेदांत था। वे कहते थे कि ईश्वर किसी मंदिर या मूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि हर जीव के भीतर व्याप्त है। इसलिए उन्होंने जाति, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठकर मानवता का संदेश दिया।
इसके साथ ही वे अंधविश्वास के विरोधी थे। उनका मानना था कि धर्म का उद्देश्य मनुष्य को मजबूत बनाना है, कमजोर नहीं। इसलिए वे विज्ञान और अध्यात्म के संतुलित समन्वय के पक्षधर थे।
राष्ट्रवाद और सामाजिक सुधार
स्वामी विवेकानंद ने भारतीय समाज को आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा—
हम किसी से कम नहीं
भारत आध्यात्मिक गुरु है
गरीबी और भिक्षा मानसिक कमजोरी के प्रतीक हैं
उनके विचारों से प्रेरित होकर अनगिनत लोगों में राष्ट्रभक्ति जागी। यही कारण है कि स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक नेता स्वयं को विवेकानंद का शिष्य मानते थे।
अंतिम समय और अमर विरासत
4 जुलाई 1902 को मात्र 39 वर्ष की आयु में SWAMI VIVEKANANDA महाप्रयाण कर गए। लेकिन, उनके विचार आज भी उतने ही जीवित हैं जितने उस समय थे। उन्होंने कहा था—
“मुझे विश्वास है कि मेरा देश पुनः उत्थान करेगा।”
आज जब भारत विश्व मंच पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है, तब विवेकानंद के शब्द और भी प्रासंगिक प्रतीत होते हैं।
VIVEKANANDA – एक युगपुरुष का संदेश
स्वामी विवेकानंद का जीवन हमें यह सिखाता है कि—
आत्मविश्वास सबसे बड़ी शक्ति है
मानव सेवा ही सच्चा धर्म है
और राष्ट्रप्रेम ही प्रगति की कुंजी है
वास्तव में, वे केवल संन्यासी नहीं, बल्कि युग निर्माता थे। उन्होंने भारतीयता को नया आत्मविश्वास दिया और विश्व को यह बताया कि भारत केवल परंपराओं का देश नहीं, बल्कि ज्ञान, करुणा और सार्वभौमिक बंधुत्व का प्रवक्ता है।
इसीलिए, समय बदलता रहता है, विवेकानंद के विचार कभी पुराने नहीं पड़ते। वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने सौ वर्ष पहले थे—और संभवतः आने वाले समय में भी रहेंगे।
स्वामी विवेकानंद कौन थे?
स्वामी विवेकानंद वेदान्त के महान दार्शनिक, आध्यात्मिक गुरु और रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे।
स्वामी विवेकानंद किस भाषण के लिए प्रसिद्ध हैं?
वे 1893 के शिकागो धर्म संसद के भाषण के लिए प्रसिद्ध हैं।
स्वामी विवेकानंद का जन्म कब हुआ था?
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था।
NATIONAL YOUTH DAY कब मनाया जाता है?
12 JANUARY
स्वामी विवेकानंद का प्रसिद्ध नारा क्या है?
“तुम महान हो, अपने अंदर की शक्ति को पहचानो।”
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अष्टमी और नवमी की तारीख को लेकर कंफ्यूजन, जानें कब करें कन्या पूजन, क्या है शुभ मुहूर्त ?

Ashtami or Navami 2026 : शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। इस दौरान भक्त उपवास रखकर माता रानी की पूजा-अर्चना करते हैं। नवरात्रि के अंतिम दिनों में अष्टमी और नवमी के अवसर पर कन्या पूजन की विशेष परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है और उन्हें भोजन कराकर सुख-समृद्धि तथा खुशहाली की कामना की जाती है। कई भक्त अष्टमी पर कन्या पूजन करते हैं, जबकि कुछ लोग नवमी तिथि को यह अनुष्ठान पूरा करते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि वर्ष 2026 में अष्टमी और नवमी की तिथियां क्या हैं और कन्या पूजन के लिए कौन-से शुभ मुहूर्त बताए गए हैं।
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शारदीय नवरात्रि 2026 में कब है अष्टमी?
पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर 2026 को सुबह 8 बजकर 27 मिनट पर शुरू होगी। ये तिथि 19 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 51 मिनट पर समाप्त होगी। उदयातिथि के आधार पर 19 अक्टूबर को अष्टमी मनाई जाएगी। इस दिन भक्त मां दुर्गा की पूजा-अर्चना के साथ कन्या पूजन कर सकते हैं। परंपरा के अनुसार, कन्याओं को घर आमंत्रित कर उनके चरण धोए जाते हैं, तिलक लगाया जाता है और भोजन कराकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।
अष्टमी पर कन्या पूजन का शुभ मुहूर्त
अष्टमी के दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 43 मिनट से दोपहर 12 बजकर 28 मिनट तक बताया गया है। इस अवधि में मां दुर्गा की पूजा और कन्या पूजन करना शुभ माना जाता है।

नवमी पर कब करें कन्या पूजन?
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 19 अक्टूबर 2026 को सुबह 10 बजकर 51 मिनट पर आरंभ होगी और 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर समाप्त होगी। तिथि के समय के कारण कुछ परंपराओं में 19 अक्टूबर को नवमी के अनुष्ठान किए जा सकते हैं, जबकि उदयातिथि के आधार पर पूजा करने वाले श्रद्धालु 20 अक्टूबर को नवमी मनाकर कन्या पूजन कर सकते हैं।
नवमी पर कन्या पूजन का शुभ मुहूर्त
नवमी के अवसर पर 19 अक्टूबर को अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 43 मिनट से दोपहर 12 बजकर 28 मिनट तक बताया गया है। वहीं, 20 अक्टूबर को भी अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 43 मिनट से दोपहर 12 बजकर 28 मिनट तक रहेगा। भक्त इस दौरान मां दुर्गा की आराधना और कन्या पूजन कर सकते हैं।
अष्टमी हो या नवमी, दोनों ही तिथियों पर कन्या पूजन को नवरात्रि की महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा माना जाता है। श्रद्धालु अपनी पारिवारिक मान्यताओं और स्थानीय पंचांग के अनुसार तिथि चुनकर पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
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नवरात्रि पर मां के 9 रूप बदल सकते हैं किस्मत! जानें किसकी पूजा से दूर होंगे कष्ट

Navratri 2026 : शारदीय नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के लिए विशेष माने जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन नौ दिनों में देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा करने से भक्तों को सुख, समृद्धि, साहस, शांति और सकारात्मकता का आशीर्वाद मिलता है। हर दिन मां के एक विशेष स्वरूप की पूजा की जाती है और उनसे जीवन की परेशानियां दूर करने की प्रार्थना की जाती है।
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मां शैलपुत्री की पूजा से मिलेगी दृढ़ता
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है। देवी का यह स्वरूप धैर्य, स्थिरता और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री की आराधना से जीवन में आत्मविश्वास और मानसिक मजबूती की कामना की जाती है। जो लोग जीवन में अस्थिरता या निर्णय लेने में कठिनाई महसूस करते हैं, वे माता की पूजा कर मनोबल प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं।
भोग: मां शैलपुत्री को गाय के शुद्ध घी का भोग अर्पित करने की परंपरा है।

दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से बढ़ेगा आत्मबल
नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना होती है। देवी का यह स्वरूप तपस्या, त्याग, संयम और संकल्प शक्ति का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से मन को एकाग्र रखने, कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने और लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा मिलती है। विद्यार्थी और अपने लक्ष्य के लिए मेहनत कर रहे लोग भी माता से एकाग्रता और आत्मबल की कामना करते हैं।
भोग: माता को शक्कर, सफेद मिठाई या पंचामृत अर्पित किया जाता है।

मां चंद्रघंटा की आराधना से दूर होगा भय
तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है। देवी का यह स्वरूप साहस, शौर्य और शांति का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा की आराधना से भय और मानसिक अशांति से मुक्ति तथा विपरीत परिस्थितियों का सामना करने का साहस प्राप्त करने की कामना की जाती है।
भोग: मां चंद्रघंटा को दूध, खीर या दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाया जाता है।

मां कूष्मांडा की पूजा से मिलेगी सकारात्मकता
नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होती है। मान्यता है कि देवी ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। उन्हें सृष्टि की ऊर्जा और प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। मां कूष्मांडा की आराधना से जीवन में ऊर्जा, उत्साह, स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना की जाती है। देवी का यह स्वरूप भक्तों को कठिन परिस्थितियों में भी सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
भोग: मां कूष्मांडा को मालपुए का भोग अर्पित करने की परंपरा है।

मां स्कंदमाता की पूजा से मिलेगा सुख-शांति का आशीर्वाद
पांचवें दिन मां स्कंदमाता की आराधना की जाती है। भगवान कार्तिकेय को स्कंद भी कहा जाता है और उनकी माता होने के कारण देवी का नाम स्कंदमाता पड़ा। मां का यह स्वरूप ममता, वात्सल्य और करुणा का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनकी पूजा से परिवार में सुख-शांति, प्रेम और खुशहाली की कामना की जाती है।
भोग: इस दिन माता को केले का भोग अर्पित किया जाता है।

मां कात्यायनी की पूजा से मिलेगी बाधाओं से लड़ने की शक्ति
नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। देवी का यह स्वरूप शक्ति, साहस और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी की आराधना से जीवन की बाधाओं का सामना करने की शक्ति और सफलता प्राप्त करने की कामना की जाती है। देवी को महिषासुर का वध करने वाली मां के रूप में भी पूजा जाता है।
भोग: मां कात्यायनी को शहद अर्पित करने की परंपरा है।

मां कालरात्रि की पूजा से दूर होगा भय और संकट
सातवें दिन मां कालरात्रि की आराधना होती है। देवी का यह स्वरूप उग्र और शक्तिशाली माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कालरात्रि अपने भक्तों को भय से मुक्ति और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा प्रदान करती हैं। उनकी पूजा करके भक्त जीवन की परेशानियों, अनिश्चितताओं और संकटों का सामना करने के लिए शक्ति और साहस की कामना करते हैं।
भोग: मां कालरात्रि को गुड़ या गुड़ से बनी मिठाइयों का भोग लगाया जाता है।

मां महागौरी की पूजा से मिलती है शांति
नवरात्रि के आठवें दिन महाअष्टमी मनाई जाती है और मां महागौरी की पूजा की जाती है। देवी का यह स्वरूप पवित्रता, शांति और सौम्यता का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां महागौरी की आराधना से जीवन में सुख, शांति और सकारात्मकता की कामना की जाती है। अष्टमी पर कई परिवारों में कन्या पूजन भी किया जाता है।
भोग: मां महागौरी को नारियल अर्पित करने की परंपरा है।

मां सिद्धिदात्री की पूजा से पूरी होंगी मनोकामनाएं
नवरात्रि के नौवें और अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं में देवी को सिद्धियां प्रदान करने वाली और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली माना जाता है। उनकी आराधना से ज्ञान, सफलता, आध्यात्मिक उन्नति और जीवन में संतुलन की कामना की जाती है। नवमी के दिन कई घरों में कन्या पूजन और हवन के साथ नवरात्रि का समापन होता है।

भोग: मां सिद्धिदात्री को हलवा, पूरी और काले चने का प्रसाद अर्पित किया जाता है।
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1 अक्टूबर से बदलेंगे कई जरूरी नियम, आपकी जेब और दस्तावेजों पर पड़ेगा असर

New Rules : हर महीने की पहली तारीख अपने साथ कुछ नए नियम और बदलाव लेकर आती है। अब अक्टूबर की शुरुआत होने वाली है और 1 अक्टूबर 2026 से LPG सब्सिडी, बैंक एफडी और जन्म-मृत्यु पंजीकरण से जुड़े नियमों में बदलाव होने जा रहा है।
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1 अक्टूबर से बदलेंगे कई जरूरी नियम
कल यानी एक अक्टूबर से होने वाले बदलावों का सीधा असर आम ग्राहकों और जरूरी दस्तावेजों से जुड़े कामकाज पर पड़ सकता है। ऐसे में अगर आप LPG सिलिंडर लेते हैं, बैंक में FD है या जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र से जुड़ा काम है, तो इन बदलावों को जानना आपके लिए जरूरी है।
LPG सब्सिडी को लेकर देखने को मिलेगा बदलाव
सब्सिडी वाले सिलिंडर के लिए बायोमेट्रिक आधार ऑथेंटिकेशन जरूरी होगा। हालांकि, BAA नहीं कराने पर LPG सिलिंडर की सप्लाई बंद नहीं होगी, लेकिन ग्राहक को सब्सिडी का लाभ नहीं मिल सकता है और सिलिंडर बाजार दर पर लेना पड़ सकता है।

आरबीआई ने बल्क डिपॉजिट को लेकर नए नियम किए जारी
RBI के नए नियम के तहत अब 3 करोड़ रुपये या उससे अधिक की एफडी को बल्क डिपॉजिट माना जाएगा। पहले यह सीमा 2 करोड़ रुपये थी। बैंक अपनी जरूरत के अनुसार ऐसी एफडी पर ब्याज दर तय कर सकेंगे।
बैंकों को हर कार्यदिवस सुबह 10 बजे तक अपनी नई ब्याज दरें वेबसाइट पर अपडेट करनी होंगी। 10 मिनट के ग्रेस पीरियड के बाद यानी 10:10 बजे तक दरें वेबसाइट पर उपलब्ध होनी जरूरी होंगी।
जन्म-मृत्यु पंजीकरण के लिए भी बदले नियम
1 अक्टूबर से जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण से जुड़े संशोधित प्रावधान लागू होंगे। दो साल से अधिक देरी से पंजीकरण कराने के लिए प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश जरूरी होगा। वहीं, एक से दो साल की देरी पर जिलाधिकारी, उप-जिलाधिकारी या अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट की मंजूरी आवश्यक होगी।
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