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पिता IAS अब बेटी तेंजिन यांग्की बनी इस प्रदेश की पहली राज्य महिला IPS

Tenzin Yangki IPS Success Story: भारतीय महिलाएं आज हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं…फिर चाहे वह विज्ञान हो, सेना या सिविल सर्विसेज। इसी नए भारत की कहानी लिखी है अरुणाचल प्रदेश की तेंजिन यांग्की ने, जिन्होंने राज्य की पहली महिला आईपीएस अधिकारी बनकर इतिहास रच दिया। यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2022 में 545वीं रैंक हासिल करने वाली तेंजिन की यह उपलब्धि सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि समाजिक बदलाव की मिसाल बन गई है।
तेंजिन यांग्की का यह सफर उस सोच को तोड़ता है जो कहती थी कि पूर्वोत्तर की लड़कियां बड़े सपने नहीं देख सकतीं। उन्होंने साबित किया कि इरादे मजबूत हों तो पहाड़ भी झुक जाते हैं। उनकी सफलता ने न केवल उनके राज्य, बल्कि पूरे देश की हजारों बेटियों को प्रेरणा दी है।
देशभर में तेंजिन की सफलता की गूंज सुनाई दी। मशहूर उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने सोशल मीडिया पर उनकी तारीफ करते हुए लिखा है कि पहला होना कभी आसान नहीं होता। इसका मतलब है कि आप अकेले आगे बढ़ते हैं ताकि बाकी लोग आपके पीछे चल सकें।
महिंद्रा ने तेंजिन को “मंडे मोटिवेशन” बताते हुए कहा कि वह आने वाली पीढ़ी के लिए एक रोल मॉडल हैं।
तेंजिन ऐसे परिवार से आती हैं जहां राष्ट्र सेवा एक परंपरा रही है। उनके पिता थुप्टेन टेंपा IAS अधिकारी और मंत्री रहे हैं…जबकि उनकी मां एक सेवानिवृत्त सरकारी सचिव हैं। प्रशासनिक माहौल में पली-बढ़ी तेंजिन ने वर्दी का रास्ता चुना…एक ऐसा रास्ता जो कठिन तो था लेकिन देश की सेवा की भावना से भरा हुआ था।
उन्होंने पहले APPSC परीक्षा (2017) पास की थी…जिससे यह साबित हुआ कि सार्वजनिक सेवा के प्रति उनका जुनून गहरा था। लेकिन IPS बनकर उन्होंने उस जुनून को एक नई ऊंचाई दी।
हैदराबाद की पुलिस एकेडमी में जब तेंजिन यांग्की ने 36% महिला अधिकारियों के साथ प्रशिक्षण शुरू किया, तो वह क्षण सिर्फ एक औपचारिकता नहीं बल्कि एक क्रांति का संकेत था…यह भारत की बेटियों के देश सेवा के नए युग की शुरुआत थी।
तेंजिन यांग्की की कहानी यह बताती है कि अगर दृढ़ निश्चय, अनुशासन और साहस हो…तो कोई भी दीवार बहुत ऊंची नहीं होती। उन्होंने न सिर्फ अपने राज्य…बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत की महिलाओं के लिए एक नई उम्मीद जलाई है।
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सपनों की उड़ान भरनी है, लेकिन डर, लोभ और आलस ज़ंजीर बन गए हैं? तो जानिए उपाय

Geeta Updesh Saar: हर व्यक्ति अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता है…सफलता, सम्मान और पहचान पाने की इच्छा हर इंसान के भीतर होती है। हम सब सोचते हैं कि हमारे पास भी वो सब कुछ हो जो एक कामयाब इंसान के पास होता है। लेकिन जैसे ही हमारी आत्मा हमसे कहती है कि इसके लिए कठिन परिश्रम करना होगा, त्याग करना होगा, तब हम अक्सर उस सोच से खुद ही पीछे हट जाते हैं।
हमारा मन सोचता है “काश मैं भी सफल होता”, लेकिन कर्म के रास्ते पर कदम रखने से पहले ही हम हार मान लेते हैं। यही सबसे बड़ी समस्या है…और इसी का समाधान भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद गीता में दिया है।
महाभारत के युद्ध में अर्जुन की लड़ाई अपने परिजनों से थी…लेकिन आज की पीढ़ी की लड़ाई अपने डर, आलस, मोह, लोभ और नकारात्मक सोच से है। आज हमारी लड़ाई बाहरी नहीं, बल्कि अंदरूनी है। हम चाहते हैं कि सफल हों, लेकिन प्रयास से पहले ही थक जाते हैं। हमारी इच्छाएं तो ऊँची होती हैं…लेकिन मन की दुर्बलता हमें रोक लेती है।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था ….”डर छोड़, खड़ा हो जा”
महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन ने अपने शस्त्र छोड़ दिए और युद्ध से पीछे हटने लगे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें भगवद गीता के दूसरे अध्याय के तीसरे श्लोक में चेताया….
“क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ, नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप॥”
अर्थ:
हे अर्जुन! यह कायरता तुझ पर शोभा नहीं देती। यह तुच्छ हृदय दुर्बलता त्याग दे और युद्ध के लिए उठ खड़ा हो।
यह उपदेश सिर्फ अर्जुन के लिए नहीं हमारे लिए भी है आज जब हम अपने ही विचारों से हार मान जाते हैं…गीता का यही श्लोक हमें फिर से खड़ा होने की प्रेरणा देता है। अगर हम सफलता चाहते हैं…तो डर, आलस, मोह और लोभ को त्याग कर कर्म के रास्ते पर बढ़ना होगा।
अगर आप भी जीवन में बार-बार पीछे हट जाते हैं…अगर सोचते हैं लेकिन कर नहीं पाते….तो गीता का यह उपदेश पढ़िए, समझिए और इसे अपने जीवन में उतारिए। सफलता उन्हीं को मिलती है जो खुद से लड़ना सीख जाते हैं।
#BhagavadGitaLifeLessons #SelfDisciplineandInnerStrength #OvercomingMentalWeakness
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