Nainital
बाबा नीम करौरी के भक्तों में अब विराट कोहली के बाद सुरेश रैना का नाम, कैंची धाम में किया ध्यान….

नैनीताल : क्रिकेट की दुनिया के चर्चित नाम सुरेश रैना अब बाबा नीम करौरी के भक्तों की लिस्ट में शामिल हो गए हैं। मंगलवार को सुरेश रैना ने उत्तराखंड स्थित कैंची धाम पहुंचकर बाबा के दर पर शीश नवाया। इस दौरान उन्होंने हनुमान चालीसा का पाठ किया और ध्यान लगाया। मंदिर प्रबंधन से बाबा की लीलाओं के बारे में जानकारी प्राप्त की, जो उनके लिए एक गहरी आध्यात्मिक अनुभव साबित हुआ।
कैंची धाम के शांत वातावरण में रैना प्रसन्न नजर आए और उन्होंने कहा, “यहां आकर मुझे एक अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति का अहसास हुआ है।” मंदिर प्रबंधन ने उन्हें बाबा की जीवन गाथा पर आधारित एक पुस्तक भेंट की, जिसे उन्होंने श्रद्धापूर्वक स्वीकार किया। रैना के कैंची धाम पहुंचने की खबर सुनते ही उनके प्रशंसकों की भीड़ मंदिर में जमा हो गई। रैना ने प्रशंसकों के साथ सेल्फी ली और आटोग्राफ भी दिए। करीब एक घंटे तक रुकने के बाद वे वापस लौट गए।
सुरेश रैना का यह दौरा बाबा नीम करौरी के भक्तों के बीच एक नई चर्चा का विषय बन गया है। इससे पहले, अगस्त महीने में क्रिकेटर रिंकू सिंह ने भी बाबा के आश्रम में दर्शन किए थे और ध्यान लगाया था। रिंकू सिंह के साथ कोलकाता नाइट राइडर्स के खिलाड़ी शिवम वर्मा और उदीयमान क्रिकेटर आर्यन जुयाल भी मौजूद थे। रिंकू सिंह ने बाबा के धाम में आध्यात्मिक शांति का अनुभव करने की बात की थी।
कैंची धाम के साथ ही बाबा नीम करौरी के भक्तों में भारतीय क्रिकेट जगत के दिग्गज विराट कोहली का नाम भी शामिल है। कुछ वर्ष पहले विराट कोहली अपनी पत्नी अनुष्का शर्मा के साथ बाबा के आश्रम में दर्शन करने पहुंचे थे।
दुनिया के दिग्गजों का बाबा नीम करौरी से जुड़ाव
बाबा नीम करौरी का आश्रम केवल भारतीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय हस्तियों के बीच भी प्रसिद्ध है। साल 1974 में, मशहूर एप्पल कंपनी के संस्थापक स्टीव जॉब्स अपने दोस्त डैन कोट्टके के साथ कैंची धाम पहुंचे थे। वह हिंदू धर्म और भारतीय आध्यात्मिकता का अध्ययन करने के लिए भारत आए थे। स्टीव जॉब्स से प्रेरित होकर फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग भी 2015 में बाबा के आश्रम पहुंचे थे। उस समय फेसबुक का कारोबार मुश्किल दौर से गुजर रहा था, लेकिन बाबा के आश्रम में कुछ समय बिताने के बाद उन्होंने व्यवसाय में नई दिशा पाई। इसके अलावा, हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया रॉबर्ट्स भी बाबा के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर चुकी हैं।
नीम करौरी बाबा का जीवन
नीम करौरी बाबा, जिन्हें ‘कंबल वाले बाबा’ और ‘कैंची धाम वाले बाबा’ के नाम से भी जाना जाता है, का जन्म 1900 में उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में हुआ था। बाबा भगवान हनुमान के असीम भक्त थे और उनके अनुयायी उन्हें ‘महाराज-जी’ के रूप में पुकारते थे। उनका जीवन अध्यात्म और भक्ति का प्रतीक रहा है।
बाबा का विवाह उनके परिवार ने मात्र 11 वर्ष की आयु में करा दिया था, लेकिन उन्होंने बार-बार गृहस्थ जीवन को त्यागने की कोशिश की। इसके बावजूद, परिवार के दबाव के कारण उन्हें घर छोड़ने का अवसर नहीं मिला। बाबा के दो बेटे और एक बेटी थीं। 11 सितंबर 1973 को वृंदावन के एक अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई, जब वे डायबिटीज की वजह से कोमा में चले गए थे।
बाबा नीम करौरी के आश्रम और उनके संदेश आज भी लाखों लोगों के दिलों में जीवित हैं, और अब क्रिकेट की दुनिया के सितारे भी उनके भक्तों की लिस्ट में शामिल होते जा रहे हैं।
Ramnagar
होली के रंगों से स्किन नहीं होगी खराब, उत्तराखंड में यहां बनाया जा रहा सब्जियों-फूलों से सुरक्षित हर्बल गुलाल

Ramnagar News : होली का त्योहार नजदीक है और रंगों की बाजार में भरमार है, लेकिन अगर आप केमिकल वाले रंगों से त्वचा को होने वाले नुकसान से परेशान हैं तो ये खबर आपके लिए है। उत्तराखंड के रामनगर में महिलाएं सब्जियों-फूलों से सुरक्षित गुलाल बना रही हैं।
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होली के रंगों से आपकी स्किन नहीं होगी डैमेज
होली का त्यौहार रंगों का त्यौहार है। जिसमें हर कोई एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। लेकिन बाजार में आजकल कैमिकल वाले रंग भी आ रहे हैं। जिस कारण स्किन खराब हो जाती है। कई बार इसके गंभीर परिणाम भी देखने को मिलते हैं। इसी को देखते हुए नैनीताल जिले के रामनगर के पास स्थित कानियां ग्रामसभा की महिलाओं ने इसका बेहतरीन विकल्प तैयार किया है। यहां महिलाएं पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से हर्बल गुलाल बना रही हैं।
बनाया जा रहा सब्जियों-फूलों से बन रहा सुरक्षित हर्बल गुलाल
महिलाएं फलों, फूलों और सब्जियों से हर्बल गुलाल तैयार कर रहीं हैं। जिसकी मांग स्थानीय स्तर से लेकर महानगरों तक पहुंच चुकी है। बता दें कि पिछले कुछ वर्षों में बाजार में मिलने वाले केमिकल युक्त रंगों ने कई लोगों को परेशानी में डाला है, त्वचा पर एलर्जी, आंखों में जलन और बालों को नुकसान जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। ऐसे में लोग अब सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्प तलाश रहे हैं।

इसी मांग को समझते हुए रामनगर की कानियां ग्रामसभा में वुमेन रिसोर्सेज सेंटर (WRC) समूह की महिलाओं ने हर्बल गुलाल तैयार करने की अनोखी पहल शुरू की है।
ये समूह देहरादून से संचालित पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद् डॉ. अनिल जोशी के संस्थान हिमालयन एनवायरनमेंटल स्टडीज़ एंड कंजरवेशन ऑर्गनाइजेशन (HESCO) के अंतर्गत कार्य कर रहा है। इस पहल का उद्देश्य महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराना और पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद तैयार करना है।
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नैनीताल में बाघ का आतंक, फतेहपुर रेंज में घास लेने गई महिला को बाघ ने बनाया निवाला
Nainital News : नैनीताल जिले के रामनगर वन प्रभाग के फतेहपुर रेंज में बाघ का आतंक देखने को मिला है। फतेहपुर रेंज में घास लेने गई महिला को बाघ ने अपना निवाला बना लिया। घटना के बाद ग्रामीणों का आक्रोश झलक और उन्होंने वन विभाग के अधिकारियों को जमकर लताड़ा और महिला का शव एंबुलेंस से नहीं ले जाने दिया।
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फतेहपुर रेंज में घास लेने गई महिला को बाघ ने बनाया निवाला
नैनीताल जिले के रामनगर वन प्रभाग के फतेहपुर रेंज के पनियाली इलाके में एक महिला को आज बाघ ने अपना निवाला बना लिया। मिली जानकारी के मुताबिक महिला जानवरों के लिए चार पत्ती लेने सुबह जंगल गई थी। जब महिला दोपहर बाद तक भी घर नहीं लौटी तो ग्रामीणों ने उनकी तलाश शुरू की। उन्होंने इसकी सूचना वन विभाग को दी और खुद जंगल की ओर निकल पड़े।
जंगल में करीब 3 किलोमीटर अंदर से बरामद हुआ शव
काफी देर तक चल सर्च ऑपरेशन के बाद महिला के कपड़े जंगल से बरामद हुए। इसके बाद वन विभाग और ग्रामीण जंगल की काफी अंदर तक सर्च ऑपरेशन में जुटे रहे। घने जंगल में करीब 3 किलोमीटर अंदर जाकर कमला का शव बरामद किया जा सका।
घटना के बाद ग्रामीणों का आक्रोश भड़क गया और उन्होंने महिला के शव को पंचनामें के लिए नहीं ले जाने दिया, काफी देर तक अधिकारियों के द्वारा समझे जाने के बावजूद भी ग्रामीण नहीं माने

मौके पर पहुंचे एसडीएस हल्द्वानी
घटना से आक्रोशित ग्रामीणों को मौके पर समझने के लिए एसडीएम हल्द्वानी भी पहुंचे। एसडीएम ने वन विभाग के अधिकारियों को तुरंत जंगल में कैमरा ट्रैप लगाने और जंगल में गश्त बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि वन्य जीव को आदमखोर घोषित करने के लिए भी विभाग से बातचीत की जा रही है।
ग्रामीणों से जंगल में अकेले ना जाने की अपील
एसडीएम हल्द्वानी ने ग्रामीणों से जंगल में अकेले ना जाने की अपील की है। मौके पर पहुंची वन विभाग की SDO ने कहा की 12 फरवरी को हुई घटना के बाद 26 कैमरा ट्रैप जंगल में लगाए गए थे। लेकिन किसी में टाइगर का मूवमेंट कैप्चर नहीं हुआ है, फिलहाल ग्रामीणों से जंगल में न जाने की अपील की जा रही है।
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नैनीताल में तिब्बती समुदाय ने धूमधाम से मनाया लोसर, लोगों ने मठ में की पूजा अर्चना

Nainital News : तिब्बती समुदाय विश्वभर में अपने नये साल यानी लोसर (Losar Festival) का जश्न मना रहा है। नैनीताल में भी तिब्बती समुदाय ने सुख निवास स्थिति बौद्ध मठ में लोसर का जश्न मनाया।
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नैनीताल में तिब्बती समुदाय ने धूमधाम से मनाया Losar Festival
तिब्बती समुदाय विश्वभर में नये साल यानी लोसर का जश्न मना रहा है। इसी क्रम में नैनीताल में भी तिब्बती समुदाय के लोगों ने धूमधाम से लोसर पर्व मनाया। इस दौरान समुदाय के लोगों ने मठ में पूजा अर्चना की। तीन दिन तक चले लोसर के जश्न में लोगों ने एक दूसरे को नए वर्ष की शुभकामनाएं दी।
लोगों ने मठ में की पूजा अर्चना कर की शांति की कामना
तिब्बती समुदाय ने पूजा अर्चना कर विश्व शांति और दलाई लामा की दीर्घायु की कामना की। Losar Festival के मौके पर तिब्बती समुदाय की महिलाओं और पुरूषों ने पारंपरिक परिधानों में मंगल गीत गाये। आपको बता दें कि आज ही के दिन तिब्बती समुदाय द्वारा रंग बिरंगे झंडे लगाए जाते हैं जो 5 रंग के होते है।

तिब्बती समुदाय द्वारा इस दिन लगाए जाते हैं झंडे
आज के दिन लगाए जाने वाले रंगे बिरंगे झंडे में हरा जो हरियाली का लाल अग्नी सफेद जो शांति का नीला जो जल का और पीला जमीन का प्रतीक होते हैं। इन झंडों में मंत्र लिखे होते हैं और माना जाता है कि हवा के बहाव से जितनी बार यह झंडे हवा में लहराते हैं उतनी ही ज्यादा विश्व में शांति आएगी।
तीन दिन तक मनाया जाता है लोसर पर्व
लोसर का पर्व 3 दिन तक मनाया जाता है। जिसमें सामूहिक पूजा की जाती है विश्व और नगर की शांति के लिए नगर में देवी आपदा ना आये तिब्बतियों में लोसर का उत्साह देखा जाता है तिब्बती समुदाय के लोग लोसर को नए साल के रूप में मानते है। महिलाएं व बच्चों पर खासा उत्साह देखने को मिलता है महिलाएं अपने घरों दुल्हन की तरह को सजाते हैं।

Losar Festival FAQs (लोसर पर्व से जुड़े सवाल-जवाब)
Q1. लोसर क्या है?
Ans: लोसर तिब्बती समुदाय का नववर्ष (New Year) होता है। इसे तिब्बती लोग नए साल की शुरुआत के रूप में बड़े उत्साह और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मनाते हैं।
Q2. लोसर कितने दिन तक मनाया जाता है?
Ans: लोसर का पर्व आमतौर पर तीन दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान पूजा-पाठ, सजावट और सामूहिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
Q3. लोसर पर रंग-बिरंगे झंडे क्यों लगाए जाते हैं?
Ans: लोसर के दिन तिब्बती समुदाय पांच रंगों के झंडे लगाता है। इन झंडों पर मंत्र लिखे होते हैं और माना जाता है कि हवा के साथ लहराने पर ये मंत्र विश्व में शांति का संदेश फैलाते हैं।
Q4. लोसर के झंडों के रंग क्या दर्शाते हैं?
Ans:हरा – हरियाली का प्रतीक
- लाल – अग्नि का प्रतीक
- सफेद – शांति का प्रतीक
- नीला – जल का प्रतीक
- पीला – धरती (जमीन) का प्रतीक
Q5. लोसर पर क्या विशेष किया जाता है?
Ans: इस पर्व पर सामूहिक पूजा की जाती है, नगर और विश्व की शांति की कामना की जाती है, और घरों को दुल्हन की तरह सजाया जाता है।
Q6. लोसर किसका नया साल माना जाता है?
Ans: लोसर तिब्बती समुदाय का पारंपरिक नया साल होता है, जिसे बहुत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
Q7. लोसर पर सबसे ज्यादा उत्साह किनमें देखा जाता है?
Ans: लोसर पर खासतौर पर महिलाओं और बच्चों में काफी उत्साह देखने को मिलता है। महिलाएं घरों को सजाती हैं और पारंपरिक रीति-रिवाज निभाती हैं।
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